एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में पीड़ितों को मिलने वाली राहत राशि को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एफआईआर और उसके आधार पर पेश की गई चार्जशीट बाद में अदालत द्वारा रद्द कर दी जाती है, तो उसी मामले में पीड़ित मुआवजे या राहत राशि का दावा नहीं कर सकता. कोर्ट ने माना कि जब मूल आपराधिक मामला ही समाप्त हो चुका है, तब उससे जुड़ी राहत राशि का अधिकार भी स्वतः खत्म हो जाता है.
हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज
ग्वालियर खंडपीठ के न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने भिंड निवासी मुन्ना बाबू शाक्य द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया. याचिकाकर्ता ने 8.50 लाख रुपये की राहत राशि दिए जाने की मांग की थी. अदालत ने सुनवाई के बाद कहा कि जिस आपराधिक प्रकरण के आधार पर राहत राशि मांगी जा रही थी, वह पहले ही समाप्त हो चुका है, इसलिए मुआवजे का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता.
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता ने अपने भाई की मौत से जुड़े मामले में राहत राशि की मांग की थी. यह मांग सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखी गई, लेकिन प्राधिकारी ने आवेदन अस्वीकार कर दिया. इसके बाद इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि राहत राशि का पूरा दावा उसी आपराधिक मामले पर आधारित था, जिसे अदालत पहले ही समाप्त कर चुकी है. कोर्ट ने इस तर्क को सही माना और याचिका खारिज कर दी.
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि एससी-एसटी एक्ट के तहत आर्थिक सहायता या राहत राशि स्वतः देय नहीं होती. यदि मामले का कानूनी आधार ही खत्म हो जाए, तो उससे जुड़े लाभ या मुआवजे का दावा भी नहीं किया जा सकता. कोर्ट का मानना था कि जब एफआईआर और चार्जशीट को अदालत द्वारा रद्द कर दिया गया है, तब राहत राशि देने का आधार भी समाप्त हो जाता है.
फैसले पर उठे सवाल
इस फैसले के बाद ओबीसी महासभा ने नाराजगी जताई है. संगठन के राष्ट्रीय महासचिव और अधिवक्ता धर्मेंद्र कुशवाह ने कहा कि यदि पुलिस जांच सही तरीके से नहीं करती है तो उसका नुकसान पीड़ित पक्ष को क्यों उठाना पड़े. उन्होंने कहा कि संगठन इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा. उनका दावा है कि यह फैसला एससी-एसटी एक्ट की मूल भावना को कमजोर करने वाला है.
सवर्ण समाज ने किया स्वागत
वहीं दूसरी ओर सवर्ण समाज से जुड़े लोगों ने हाईकोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है. ब्राह्मण समाज के राष्ट्रीय नेता और सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी केडी सोनकिया ने कहा कि इस आदेश से कानून के संभावित दुरुपयोग पर रोक लगाने में मदद मिलेगी. उनका मानना है कि राहत राशि उन्हीं मामलों में मिलनी चाहिए, जहां आरोपों का कानूनी आधार कायम हो.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं