शायद ही आपने कहीं ऐसा देखा या सुना हो कि किसी पूजन स्थल पर आराध्य देव की प्रतिमा को जंजीरों में बांधकर पूजा की जाती हो. लेकिन, मध्य प्रदेश के आगर मालवा में एक ऐसा मंदिर है, जहां भैरव महाराज की प्रतिमा बीते करीब 700 वर्षों से जंजीरों में जकड़ी हुई है. हैरानी की बात यह है कि इन्हीं जंजीरों में बंधे भैरव महाराज के दर्शन के लिए श्रद्धालु सैकड़ों किलोमीटर दूर से यहां पहुंचते हैं. यह रहस्यमयी मंदिर आगर मालवा की लाइफलाइन कहे जाने वाले रत्नसागर तालाब (बड़ा तालाब) के किनारे स्थित है, जिसे केवड़ा स्वामी मंदिर के नाम से जाना जाता है. यह मंदिर न सिर्फ अपनी मान्यताओं, बल्कि अपने इतिहास और अनोखी परंपराओं के कारण देशभर में प्रसिद्ध है.
गुजरात के झाला राजपूत राजा कैसे पहुंचे मालवा?
मंदिर से जुड़ी कथा करीब 600–700 साल पुरानी मानी जाती है. मान्यता है कि गुजरात के झाला राजपूत वंश के राजा राघव देव को युद्ध में पराजय के बाद अपने परिवार और कुलदेव भैरव महाराज के साथ गुजरात छोड़ना पड़ा. निर्वासन के दौरान राजा राघव देव को स्वप्न आया कि जहां उनकी बैलगाड़ी का पहिया टूट जाए, वहीं अपने इष्ट देव की स्थापना कर दें. सन् 1424 में, जब राजा राघव देव अपने परिवार और भैरव महाराज की प्रतिमा के साथ इस क्षेत्र में पहुंचे और रात्रि विश्राम किया, तो सुबह आगे बढ़ने पर बैलगाड़ी का पहिया टूट गया. इसे दैवी संकेत मानते हुए उन्होंने इसी स्थान पर भैरव महाराज की स्थापना कर दी. यही प्रतिमा आज केवड़ा स्वामी मंदिर में विराजमान है. भैरव महाराज को झाला राजपूत समाज का कुलदेव माना जाता है.
आखिर क्यों जंजीरों में बांधे गए भैरव महाराज?
मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक और रहस्यमयी कथा भैरव महाराज की जंजीरों में बंधी प्रतिमा को लेकर है. लोककथाओं के अनुसार, भैरव महाराज अक्सर मंदिर छोड़कर आसपास के बच्चों के साथ खेलने चले जाते थे. कहा जाता है कि जब उनका मन खेलने से भर जाता, तो वे बच्चों के साथ मारपीट करने लगते या उन्हें शारीरिक कष्ट पहुंचाते थे. इन घटनाओं से परेशान होकर स्थानीय पंचायत ने फैसला लिया कि भैरव महाराज को मंदिर परिसर में खजूर की मोटी मियाल से जंजीरों द्वारा बांध दिया जाए और सामने एक खंभा भी लगाया जाए, ताकि वे मंदिर से बाहर न जा सकें और किसी को नुकसान न पहुंचे. मंदिर के पुजारी सूरज ने बताया कि यह कथा उन्होंने अपने पूर्वजों से सुनी है और यही मान्यता पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है.

केवड़े की खुशबू और आस्था का केंद्र
स्थानीय समाजसेवी और इतिहास में रुचि रखने वाले तेज सिंह चौहान बताते हैं कि मंदिर आगर मालवा के सबसे बड़े तालाब मोती सागर के समीप स्थित है. तालाब के पास होने से मंदिर का वातावरण बेहद मनोहारी हो जाता है. मंदिर के आसपास केवड़े के फूलों के बगीचे हैं, जिनकी खुशबू पूरे परिसर में फैली रहती है. इसी कारण इस मंदिर का नाम केवड़ा स्वामी मंदिर पड़ा. हर वर्ष भैरव पूर्णिमा और अष्टमी के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. भक्त मंदिर परिसर में ही दाल-बाटी बनाकर भोग लगाते हैं. इसके अलावा भैरव महाराज को मदिरा का भोग चढ़ाने की परंपरा भी है. यह मंदिर नवविवाहित जोड़ों के लिए भी विशेष महत्व रखता है. जिन परिवारों के कुलदेव भैरव हैं, वे अपने नवविवाहित बच्चों को यहां आशीर्वाद दिलाने लाते हैं.
ऐतिहासिक और चमत्कारी स्थल
मंदिर परिसर में भैरव महाराज के साथ-साथ हनुमान जी का मंदिर और करीब हजार साल पुराना शिव मंदिर भी स्थित है, जो इस धार्मिक स्थल के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को और मजबूत करता है. एक मान्यता यह भी है कि जिन महिलाओं को बच्चे को जन्म देने के बाद दूध नहीं उतरता, उन्हें मंदिर परिसर के कुंड का पानी दिया जाता है. कहा जाता है कि इससे मां को दूध आने लगता है और वह अपने शिशु को दूध पिला पाती है.
भैरव अष्टमी पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
भैरव अष्टमी के अवसर पर सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है. काल भैरव को भगवान शिव का उग्र रूप माना जाता है. मान्यता है कि इसी दिन काल भैरव का प्राकट्य हुआ था. विधि-विधान से की गई पूजा से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और भक्तों को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. जंजीरों में जकड़े भैरव महाराज का यह मंदिर आस्था, रहस्य और इतिहास का ऐसा संगम है, जो हर भक्त को एक अनोखा अनुभव देता है.
इनपुट: जाफर मुल्तानी, आगर मालवा
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं