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जयंती विशेष: तुलसीदास के बाद हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा पढ़े जाते हैं प्रेमचंद

प्रेमचंद पर आर्य समाज और गांधीवाद का प्रभाव बहुत गहरा था और इसीलिए वे आदर्शवाद से लेकर अतियथार्थवाद तक की यात्रा पूरी कर पाए.

जयंती विशेष: तुलसीदास के बाद हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा पढ़े जाते हैं प्रेमचंद
जयंती पर याद किए गए मुंशी प्रेमचंद
(File Photo)

तुलसीदास के बाद प्रेमचंद ही हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक बहुपठित लेखक हैं. प्रेमचंद पर आर्य समाज और गांधीवाद का प्रभाव बहुत गहरा था और इसीलिए वे आदर्शवाद से लेकर अतियथार्थवाद तक की यात्रा पूरी कर पाए. ये कहना है कि मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष और वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय का.

31 जुलाई, शुक्रवार को राजधानी कॉलेज में हिन्दी साहित्य परिषद् द्वारा कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146 वीं जयंती पर एकल व्याख्यान में मुख्‍य वक्‍ता के तौर पर पहुंचे डॉ उपाध्याय ने अपने व्याख्यान में स्वतंत्रता के पूरे युग को समझने के लिए प्रेमचंद और प्रसाद को साथ रखकर पढ़ने की सलाह दी. कहा कि इसी से उस युग का सत्य अपनी सम्पूर्णता में उद्घाटित हो सकता है. 

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व्याख्यान का मुख्य विषय 'प्रेमचंद का प्रदेय' था. कार्यक्रम का शुभारंभ कॉलेज के प्राचार्य प्रो. दर्शन पांडेय जी द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और स्वागत वक्तव्य के साथ किया गया जिसमें उन्होंने कहा कि प्रेमचंद हिन्दी के एकमात्र ऐसे रचनाकार हैं जो साहित्य प्रेमियों को हमेशा अपने आसपास दिखाई देते हैं और यह निकटता ही उनसे प्रेम करने के लिए हमें अग्रसित रखती है.

इस अवसर पर उन्होंने कवि आनंद प्रकाश त्रिपाठी की प्रेमचंद को समर्पित एक कविता ' ओ प्रेमचंद ' का पाठ भी किया. उन्होंने यह भी कहा कि अगर स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित सारे कागजी दस्तावेज समाप्त भी हो जाएं तो भी प्रेमचंद के लेखन में यह सारा इतिहास जीवित रहेगा.  

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हिन्दी विभाग, राजधानी कॉलेज के प्रभारी प्रो. देव कुमार ने कहा कि प्रेमचंद को आलोचकों के माध्यम से नहीं, बल्कि उनके पात्रों के माध्यम से ही समझा जा सकता है और जिस प्रकार प्रसाद का रचनाकर्म दर्शन से आता है, वहीं प्रेमचंद की रचनाभूमि समाज पर टिकी हुई है. हिन्दी साहित्य परिषद् के संयोजक प्रो. महेंद्र सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद से घृणा और प्रेम दोनों एक साथ किया जा सकता है, लेकिन घृणा का अंत प्रेम पर ही जाकर समाप्त होता है. 

व्याख्यान के साथ-साथ प्रेमचंद के रचनाकर्म पर एक प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया जिसमें उनके  महत्त्वपूर्ण उद्धरण और विचारों को प्रस्तुत किया गया. कार्यक्रम में प्रो सुमन कुमार,प्रो.जसवीर त्यागी,प्रो.नंदकिशोर प्रसाद,प्रो.बंटी कुमार, डॉ उमेश कुमार, डॉ सस्मिता मोहन्ती, डॉ असित कुमार, डॉ राहुल कुमार, डॉ धीरज कुमार, डॉ बलराम मीना, डॉ त्रिपुरेश गोंड, डॉ गौरव त्रिपाठी, डॉ अमित, डॉ अंकित अभिषेक, डॉ श्रुति, डॉ अविनाश सिंह, डॉ विकास तिवारी,  शुभम सिंह उपस्थित रहे. कार्यक्रम का संचालन डॉ अर्चना त्रिपाठी ने किया.

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