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This Article is From Jun 27, 2018

पीरियड Myths को तोड़ने के लिए IIT-Delhi ने तैयार किए गेम्‍स

पीरियड्स से जुड़ी बेसिक बातों पर फोकस करने वाले तीन गेमों का सेट शामिल है. इनमें बताया जाता है कि सैनिटरी नैप्किन कब-कब बदला जाना चाहिए और उसे कैसे निपटाया जाना चाहिए.

पीरियड Myths को तोड़ने के लिए IIT-Delhi ने तैयार किए गेम्‍स
पीरियड्स के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए आईआईटी दिल्‍ली ने प्रोजेक्‍ट तितली बनाया है
पीरियड्स से जुड़े मिथ्‍स और बंधनों को तोड़ने के लिए आईआईटी- दिल्‍ली के के स्‍टूडेंट्स ने कई गेम तैयार किए हैं.  इन गेम्‍स के जरिए मनोरंजक और आकर्षक तरीके से जागरुकता फैलाने का काम किया जाएगा. इन गेम्‍स में पहेली, रूलेट और पीरियड्स से जुड़ी बेसिक बातों पर फोकस करने वाले तीन गेमों का सेट शामिल है. इनमें बताया जाता है कि सैनिटरी नैप्किन कब-कब बदला जाना चाहिए और उसे कैसे निपटाया जाना चाहिए.

आईआईटी- दिल्‍ली में प्रोडक्शन एंड इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही रितिका के मुतबिक, 'हमने जागरुकता सेशन के बजाए जब तीन गेमों का सेट डिजाइन तैयार करने का फैसला किया तब हमने पाया कि महिलाओं में पीरियड्स के बारे में जागरुकता की कमी है.'

बायो टेक्नोलॉजी की छात्रा इशिता गुप्ता ने कहा, 'मौखिक सत्र और फिर इन गेमों को खेलने के बाद इन गेमों का असर जानने के लिए हमने एक सर्वे किया जिसमें हमने महिलाओं से पीरियड्स के बारे मे एक क्‍वेश्‍चनायर भरने को कहा.'

उन्होंने कहा, 'मौखिक सत्र के बाद, 10 में से औसतन छह सवालों के जवाब सही दिए गए, जबकि मॉड्यूल आधारित सर्वे में महिलाओं ने 8.6 फीसदी सवालोंके सही जवाब दिए.'

इशिता ने कहा, 'हम महिलाओं को अपने सामने गेम खिलाते हैं और इसे खेलने में उनकी मदद करते हैं. अगर वे गलतियां करती हैं तो हम उन्हें सही कराते हैं जिससे कि उनके दिमाग में कोई गलत अवधारणा बाकी न रहे.'

आईआईटी दिल्ली की स्‍टूडेंट तन्वी ने कहा,  'मुझे एक जागरुकता कार्यक्रम में एक लड़की से हुई बातचीत याद है जिसमें उसने बताया कि उसके लिए उसके परिवार में महिलाओं को कपड़े के टुकड़े की जगह सैनिटरी नैप्किन के इस्तेमाल के लिए समझाना कितना मुश्किल था.'

सिविल इंजीनियरिंग की 19 साल की स्‍टूडेंट ने कहा, 'इसलिए यह परियोजना सिर्फ स्कूली लड़कियों के लिए नहीं है, बल्कि महिलाओं के लिए भी है ताकि इसका पूरा फायदा पहुंचाया जा सके.'

'प्रोजेक्ट तितली' नाम की इस पहल के तहत अब तक 1,500 से ज्‍यादा महिलाओं को जागरुक किया जा चुका है.
 

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