दुनिया कर्ज के जाल में किस हद तक फंसती जा रही है? इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया के विकासशील देशों के लिए शिक्षा का बजट सिर्फ 'बचा हुआ पैसा' होता है. शिक्षा की बजाय ये देश कर्ज चुकाने पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं और जो बच रहा है, उसे शिक्षा पर लगा रहे हैं.
ये सारी बातें संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में सामने आई है. इसे संयुक्त राष्ट्र की एजुकेशन, साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन (UNESCO) ने जारी किया है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल ज्यादातर विकासशील देशों ने शिक्षा पर जितना खर्च किया, उससे कहीं ज्यादा कर्ज चुकाने पर खर्च किया.
UNESCO की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में 113 विकासशील देशों ने शिक्षा के मुकाबले विदेशी कर्ज की किस्त भरने पर ज्यादा खर्च किया. सब-सहारा अफ्रीका में देशों ने शिक्षा की तुलना में कर्ज पर 3.6 गुना ज्यादा खर्च किया.
शिक्षा से पहले कर्ज
दुनिया का हर मुल्क विदेशी कर्ज लेता है. लेकिन यही कर्ज अब शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत पर भारी पड़ रहा है.
UNESCO ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जब कर्ज की किस्त भरनी पड़ती है तो सरकारें शिक्षा पर खर्च नहीं कर पातीं. इसे 'Crowding Out' कहते हैं, यानी कर्ज के कारण शिक्षा पर सिर्फ बचा-खुचा पैसा ही खर्च होता है.
रिपोर्ट बताती है कि लो और मिडिल इनकम वाले देशों में कर्ज की किस्त ज्यादा है. 2025 में जिन 113 देशों में कर्ज की किस्त, शिक्षा के बजट से भी ज्यादा है, उनमें 6.1 अरब आबादी रहती है.
रिपोर्ट कहती है कि अगर सरकारों पर 1 रुपये का कर्ज बढ़ता है तो शिक्षा पर खर्च 28 पैसे तक कम हो जाता है. इसकी वजह यह है कि शिक्षा और बाकी खर्चों की बजाय कर्ज की किस्त भरना 'जरूरी' है. अगर कर्ज नहीं चुकाएंगे तो देश के दिवालिया होने का खतरा है. यही कारण है कि सरकारें शिक्षा का बजट काटती हैं और उस पैसे से कर्ज चुकाती हैं.
यह भी पढ़ेंः हर रोज बंद हुए 22 सरकारी स्कूल, प्राइवेट की संख्या बढ़ी…ऐसा रहा पिछले एक साल में शिक्षा का रिपोर्ट कार्ड!
भारत को लेकर क्या कहती है रिपोर्ट?
UNESCO ने अपनी रिपोर्ट में भारत को भी शामिल किया है, जहां शिक्षा से ज्यादा कर्ज पर खर्च हो रहा है. इसमें कहा गया है कि भारत शिक्षा की तुलना में कर्ज पर 5 गुना ज्यादा खर्च कर रहा है.

भारत की हालात बहुत से देशों से काफी अच्छी है. एशिया में श्रीलंका और पाकिस्तान ऐसे मुल्क हैं, जो शिक्षा से ज्यादा कर्ज पर खर्च कर रहे हैं. श्रीलंका 16 गुना तो पाकिस्तान 15 गुना ज्यादा खर्च कर्ज चुकाने पर कर रहा है. इसे ऐसे समझिए कि अगर श्रीलंका 1 रुपया शिक्षा पर खर्च कर रहा है तो 16 रुपये कर्ज की किस्त चुकाने पर कर रहा है.
यह भी पढ़ेंः अमीर देश कितना कमाते हैं? 'विकसित' बनने के लिए भारत को कितना कमाना होगा?
कितनी चिंता की बात?
UNESCO ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि सरकारें वैसे ही शिक्षा की बजाय कर्ज पर खर्च कर रही हैं और शिक्षा के लिए विदेशी फंडिंग में भी कटौती हो रही है, जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, लो और लोअर-मिडिल इनकम वाले देशों को 2023 से शिक्षा के लिए मिल रही फंडिंग में पहले ही 21% की कमी आ चुकी है और 2027 तक यह कमी 30% तक हो सकती है. अफगानिस्तान, माली, नाइजर और लाइबेरिया जैसे देशों में तीन सालों में 40% से ज्यादा की कमी आई है.
UNESCO में एजुकेशन डिपार्टमेंट के डायरेक्ट मिन जियोंग किम का कहना है कि सरकार अभी जो तरीके आजमा रही है, उस कारण वे असल में बजट में कटौती, कम निवेश और रुके हुए विकास के चक्र में फंसे रहते हैं. इससे आर्थिक विकास पर देशों की स्थिति कमजोर हो रही है, रेवेन्यू आ नहीं रहा है और आखिरकार समय के साथ कर्ज चुकाने की क्षमता भी कम हो जाएगी. उनका कहना है कि कमजोर शिक्षा व्यवस्था उन देशों की अर्थव्यवस्था को विकसित करने और भविष्य में कर्ज के बोझ से निपटने की क्षमता पर असर डालती है, जिन पर कर्ज है.
UNESCO का कहना है कि कर्ज माफी को लेकर ऐसे इंतजाम करने की जरूरत है, जिनसे शॉर्ट टर्म में नहीं, बल्कि लॉन्ग टर्म में फायदा मिले, ताकि देश शिक्षा जैसी बुनियादी चीजों पर खर्च कर सकें.
यह भी पढ़ेंः कभी सबसे बड़ा इम्पोर्टर था, आज 80 देशों में बेच रहा हथियार... भारत कैसे बना डिफेंस की दुनिया का 'बाजीगर'?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं