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स्पीकर का बॉस BOSE, इसे बनाने वाले भारतीय की कहानी भी गजब

BOSE कंपनी की शुरुआत एक खराब शॉपिंग एक्सपीरियंस से हुई थी. भारतीय मूल के अमर बोस ने जब एक महंगा साउंड सिस्टम खरीदा, तो उन्हें उसकी आवाज पसंद नहीं आई. इसके बाद उन्होंने खुद रिसर्च शुरू की. कई फेलियर के बाद उन्होंने स्पीकर लॉन्च कर दुनिया बदल दी.

स्पीकर का बॉस BOSE, इसे बनाने वाले भारतीय की कहानी भी गजब
BOSE कंपनी के बनने की कहानी

क्या आपने कभी 'BOSE' के स्पीकर्स या हेडफोन इस्तेमाल किए हैं. अगर हां, तो आप जानते होंगे कि इसकी आवाज का कोई मुकाबला नहीं है. मर्सिडीज-मायबैक जैसी लग्जरी कारों से लेकर नासा (NASA) के स्पेस शटल और दुनिया के बड़े-बड़े धार्मिक जगहों तक, हर जगह बोस का ही डंका बजता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया की इस सबसे प्रीमियम साउंड कंपनी के पीछे एक भारतीय दिमाग था. और मजेदार बात यह है कि इस अरबों रुपए की कंपनी की शुरुआत किसी बिजनेस प्लान से नहीं, बल्कि एक 'खराब' शॉपिंग एक्सपीरियंस की वजह से हुई थी. आइए जानते हैं स्पीकर के बॉस 'BOSE' की कहानी.

स्वतंत्रता सेनानी पिता और बेसमेंट की वो छोटी सी दुकान

BOSE कंपनी के मालिक अमर बोस (Amar Bose) के पिता नोनी गोपाल बोस एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे, जो 1920 में अंग्रेजों से बचकर किसी तरह अमेरिका पहुंच गए थे. वहां उन्होंने एक अमेरिकी महिला से शादी की और 1929 में अमर बोस का जन्म हुआ. शुरुआती दिन बहुत तंगी में बीते. जब अमर बोस पैदा हुए, तो उनके पिता के पास अस्पताल का बिल भरने के पैसे तक नहीं थे. इसके बाद जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उनके पिता का बिजनेस बंद हो गया, तो महज 13 साल के अमर बोस ने घर की जिम्मेदारी उठाने में मदद की. उन्होंने अपने घर के बेसमेंट में पुराने रेडियो को रिपेयर करने का काम शुरू किया. यहीं से उनके दिल में इलेक्ट्रॉनिक्स और साउंड को लेकर प्यार जाग गया.

एक 'महंगे धोखे' ने कैसे बदल दी दुनिया

अमर बोस पढ़ाई में बहुत तेज थे. उन्होंने दुनिया के सबसे मशहूर इंजीनियरिंग कॉलेज MIT (मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में PhD की. अपनी इस बड़ी कामयाबी की खुशी में उन्होंने खुद को एक शानदार और महंगा साउंड सिस्टम गिफ्ट किया. उन्होंने बाजार के सारे फीचर्स और स्पेसिफिकेशन्स को देखकर सबसे बेस्ट स्पीकर चुना था, लेकिन जब वे उसे घर लाए और बजाया, तो उन्हें भारी निराशा हुई. उसकी आवाज नकली सी और खराब थी.

अमर बोस बचपन में वॉयलिन बजाते थे, इसलिए उनके कान असली संगीत और अच्छी आवाज को बहुत अच्छे से पहचानते थे. उन्होंने सोचा 'इतने सारे बड़े-बड़े दावों के बाद भी अगर ये कंपनियां इतनी बेकार आवाज दे रही हैं, तो मुझे खुद इस पर रिसर्च करनी चाहिए.' इसी एक जिद ने 'बोस कॉर्पोरेशन' की नींव रख दी.

पहली कोशिश में भयंकर फेलियर, फिर ऐसे पलटी बाजी

अमर बोस ने MIT में प्रोफेसर रहते हुए रात-रातभर जागकर साउंड पर रिसर्च करना शुरू किया। 1964 में उन्होंने अपनी कंपनी बनाई. कंपनी ने अपना पहला स्पीकर 'मॉडल 2201' लॉन्च किया. मार्केटिंग गुरुओं ने दावा किया कि यह हाथों-हाथ बिक जाएगा, लेकिन पूरे साल में सिर्फ 30 स्पीकर बिके. यह एक बहुत बड़ा फेलियर था. लेकिन अमर बोस ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी गलतियों से सीखा और 1968 में Bose 901 स्पीकर सिस्टम लॉन्च किया.

बाकी कंपनियां आवाज को सीधे यूजर के चेहरे पर फेंकती थीं, लेकिन बोस ने ऐसा सिस्टम बनाया जिससे आवाज दीवारों से टकराकर पूरे कमरे में फैलती थी. ठीक वैसे ही जैसे किसी लाइव कंसर्ट या थिएटर में होता है. इस एक प्रोडक्ट ने बाजार में तहलका मचा दिया.

पैसे के लिए नहीं, कुछ अलग करने का जुनून

अमर बोस की सोच आम बिजनेसमैन से बिल्कुल अलग थी. वे अपनी कंपनी को कभी शेयर बाजार (Stock Market) में नहीं ले गए, क्योंकि वे मुनाफे के लिए किसी बाहरी दबाव में काम नहीं करना चाहते थे. वे कहते थे कि 'अगर मैं किसी पब्लिक कंपनी का CEO होता, तो मुझे कम से कम पांच बार नौकरी से निकाल दिया गया होता, क्योंकि मैं वो काम करता हूं जिसमें रिस्क होता है, लेकिन वो दुनिया को कुछ बेहतर देता है.' शायद यही वजह थी कि जब कंपनी ने दुनिया का पहला 'नॉइज-कैंसलिंग हेडफोन' बनाने का सोचा, तो उसमें 10 साल का समय और 50 मिलियन डॉलर (करीब 400 करोड़ रुपए) खर्च हो गए. कोई और कंपनी होती तो इस प्रोजेक्ट को बीच में ही बंद कर देती, लेकिन अमर बोस डटे रहे और आज यह तकनीक पायलेट्स से लेकर आम लोगों की पहली पसंद है. अपनी मौत से पहले अमर बोस ने अपनी कंपनी के ज्यादातर शेयर्स अपने ही कॉलेज MIT को दान कर दिए, ताकि वहां से होने वाली कमाई से बच्चे आगे भी नई-नई रिसर्च करते रहें.

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