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क्या है उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के लिए बनने वाला ओबीसी आयोग, कैसे करेगा काम

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की घोषणा कर दी है. इसमें पांच सदस्य होंगे. इस आयोग को अपनी रिपोर्ट छह महीने में देनों को कहा गया है.

क्या है उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के लिए बनने वाला ओबीसी आयोग, कैसे करेगा काम
नई दिल्ली:

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पंचायत चुनाव की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाया है. यूपी कैबिनेट ने सोमवार को पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए समर्पित ओबीसी आयोग बनाने को मंजूरी दी. यह आयोग पंचायत स्‍तर पर ओबीसी की हिस्सेदारी का अध्ययन करेगा. इसके साथ ही योगी सरकार ने पंचायत चुनाव की एक अड़चन को दूर कर दिया है. प्रदेश के पंचायत राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर के मुताबिक आयोग को रिपोर्ट देने के लिए छह महीने का समय दिया गया है. आयोग की रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था की जाएगी. उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों में 75 जिला पंचायत, जिला पंचायतों के तीन हजार 51 सदस्य, 826 क्षेत्र पंचायत और क्षेत्र पंचायत के 75 हजार 855 सदस्य और 57 हजार 695 ग्राम पंचायतें हैं. 

क्या काम करेगा समर्पित ओबीसी आयोग

सरकार के मुताबिक यह आयोग माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में त्रिस्तरीय पंचायत निकायों में आरक्षण देने के लिए पिछड़ेपन की प्रकृति और प्रभावों की समकालीन, सतत्, अनुभव जन्य जांच और अध्ययन करेगा. सरकार की ओर से जारी नोटिस के मुताबिक प्रदेश में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए त्रिस्तरीय पंचायतों में आरक्षित पदों की संख्या का अनुपात कुल पदों की संख्या से जहां तक हो सके वहीं होगा, जो राज्य की अनुसूचित जातियों की या राज्य की अनुसूचित जनजातियों की या राज्य के पिछड़े वर्गों की जनसंख्या का अनुपात राज्य की कुल जनसंख्या से है.त्रिस्तरीय पंचायतों में ओबीसी आरक्षण पदों की कुल संख्या के 27 फीसदी से अधिक नहीं होगा. 

उत्तर प्रदेश सरकार जिस समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करेगी उसमें पांच सदस्य नियुक्त किए जाएंगे. ये सदस्य ओबीसी वर्ग के मामलों के जानकार होंगे. हाई कोर्ट का कोई रिटायर्ड जज आयोग के अध्यक्ष पद का जिम्मा संभालेगा. आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल उनकी नियुक्ति से छह महीने तक के लिए होगा. आयोग का मुख्यालय लखनऊ होगा. यह आयोग उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग से अलग होगा. इसका काम केवल ग्रामीण स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण से जुड़े अध्ययन करना ही होगा.

अपने गठन के बाद आयोग प्रदेश के सभी 75 जिलों के गांवों में जाकर ओबीसी आबादी का आनुपातिक डेटा और उनके पिछड़ेपन की स्थिति का सर्वे करेगा. इस सर्वे के आधार पर आयोग प्रदेश सरकार को सौंपेगा. आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पंचायती राज विभाग प्रदेश की ग्राम पंचायतों,ब्लॉक पंचायतों और जिला पंचायत सदस्यों की सीटों के लिए आरक्षण का रोटेशन जारी करेगा. विभाग उस पर लोगों की  आपत्तियां मांगेगा. उन आपत्तियों का निस्तारण किया जाएगा. 

क्या है ट्रिपल टेस्ट, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सुझाया है

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के मुताबिक पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण के लिए प्रदेश सरकार को एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग बनाना होता है. यह आयोग स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों की सामाजिक, राजनीतिक और प्रतिनिधित्व संबंधी स्थिति का अध्ययन करता है. आयोग यह भी पता लगाता है कि किस जिले, पंचायत में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व कितना है और वहां आरक्षण की वास्तविक जरूरत कितने की है. इसके लिए जनसंख्या, सामाजिक स्थिति और चुनावी प्रतिनिधित्व के आंकड़ों का अध्ययन किया जाता है. 

हाई कोर्ट में अवमानना की कार्यवाही

उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कदम हाई कोर्ट की ओर से अवमानना का नोटिस जारी होने के बाद उठाया है. दरअसल  अप्रैल के अंतिम हफ्ते में इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच के न्यायमूर्ति सौरभ लावणिया ने पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव को अवमानना ​​नोटिस जारी कर आगामी पंचायत चुनाव के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग के गठन की समयसीमा पर  सफाई मांगी थी. इस मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होनी है.प्रदेश सरकार ने अदालत से कहा था कि आयोग के गठन की प्रक्रिया चल रही है. इस आश्वासन पर अदालत ने चार फरवरी एक याचिका का निपटारा कर दिया था. लेकिन आयोग के गठन में देरी पर अदालत ने अवमानना का नोटिस जारी किया था. 

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