आगामी 1 दिसंबर से शुरू होने वाला संसद का शीतकालीन सत्र इस बार बेहद गर्म रहने वाला है. सत्र शुरू होने से पहले ही सरकार और विपक्ष के बीच मौहाल इतना तल्ख हो चुका है कि पहले दिन से ही जोरदार हंगामे के आसार हैं. विपक्ष SIR (मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण) मुद्दे पर हर हाल में बहस चाहता है, जबकि सरकार साफ कह चुकी है कि इस विषय पर सदन में चर्चा का सवाल ही नहीं उठता. सरकार का तर्क है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, ऊपर से चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है. इसलिए आयोग की जवाबदेही संसद के अंदर तय नहीं की जा सकती. हालांकि, सरकार यह भी संकेत देती रही है कि यदि विपक्ष चुनाव सुधार पर व्यापक बहस का प्रस्ताव लाता है, तो वह विचार कर सकती है.
शीतकालीन सत्र की सुचारू शुरुआत सुनिश्चित करने के लिए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने रविवार सुबह 11 बजे सर्वदलीय बैठक बुलाई है. यह सत्र 19 दिसंबर तक चलेगा. सरकार इस दौरान 10 महत्त्वपूर्ण विधेयक रखने जा रही है, जिनमें परमाणु ऊर्जा क्षेत्र, उच्च शिक्षा ढांचा सुधार और कॉरपोरेट/शेयर बाजार विनियम से जुड़े विधेयक शामिल हैं. दूसरी ओर, बंगाल, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और केरल जैसे चुनावी राज्यों में SIR का मामला बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. विपक्ष संसद के मंच पर इसी मुद्दे को उठाकर सरकार को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है.
SIR के अलावा, दिल्ली ब्लास्ट, बढ़ते प्रदूषण, वोट चोरी और बीएलओ की आत्महत्या जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी विपक्ष सरकार को कटघरे में खड़ा करने की तैयारी में है. वहीं सरकार विपक्ष की धार कम करने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा लेने की रणनीति पर है. चर्चा है कि “वंदे मातरम” पर एक विशेष बहस कराई जा सकती है, जिसके जरिए कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर दबाव बनाने की कोशिश होगी.
पिछले सत्र की तर्ज पर इस बार भी लगभग पूरा विपक्ष SIR के मुद्दे पर एकजुट दिखाई दे रहा है. कारण साफ है—अगले वर्ष बंगाल, केरल, तमिलनाडु और असम जैसे बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. विपक्ष को आशंका है कि यदि वह संसद में चुनाव आयोग पर मजबूत दबाव नहीं बनाता, तो परिणाम बिहार चुनाव की तरह उसके लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. इस बार तो राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि स्थिति ज्यादा बिगड़ी तो विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर भी विचार कर सकता है.
सरकार भले ही यह दावा कर रही है कि वह हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार है, लेकिन हालात बताते हैं कि शीतकालीन सत्र एक बार फिर भारी शोर-शराबे, पैना राजनीतिक टकराव और तीखी नोकझोंक से भरा रहने वाला है. संसद के भीतर कौन किसकी रणनीति पर भारी पड़ता है—यह आने वाले दिनों में देखने वाली बात होगी.
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