- भाजपा पंजाब में अब आधी विधानसभा सीटों पर दावेदारी करेगी और जूनियर पार्टनर की भूमिका नहीं अपनाएगी
- भाजपा का मानना है कि पुराने 22 सीटों के फॉर्मूले से अब काम नहीं चलेगा क्योंकि उसकी राजनीति मजबूत हुई है
- भाजपा ने कई दिग्गज सिख नेताओं को अपने पक्ष में किया है ताकि शहरी हिंदुओं के अलावा सिखों में भी पैठ बढ़ाए
पंजाब में भाजपा और अकाली दल के गठबंधन की चर्चाएं हैं. इस बीच भाजपा के नेता और केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बराबरी वाली मांग कर दी है. उनका कहना है कि पंजाब में 117 विधानसभा सीटें हैं और भाजपा आधी सीटों पर दावेदारी करेगी. उनका कहना है कि पंजाब में भाजपा के लिए पहले वाला 22 सीटों का फॉर्मूला नहीं चलेगा. अब भाजपा जूनियर पार्टनर की भूमिका में नहीं रहेगी. इससे पहले जब भाजपा का अकाली दल के साथ गठबंधन होता था तो भाजपा को शहरी क्षेत्रों वाली 22 से 23 सीटें अकाली दल से मिलती थीं. अब भाजपा ने कुछ सालों में अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश की है, जबकि अकाली दल का जनाधार सिमटा है. यही वजह है कि भाजपा के तेवर और सुर अब बदल गए हैं.
माना जा रहा है कि भाजपा अब महाराष्ट्र और बिहार की तर्ज पर ही पंजाब में भी अपनी भूमिका बदलना चाहती है. करीब ढाई दशक महाराष्ट्र में और इतने ही वक्त तक बिहार में भाजपा की भूमिका जूनियर पार्टनर की थी. लेकिन मोदी और अमित शाह वाली भाजपा का तेवर थोड़ा अलग है. कलेवर भी बदला है. यही वजह है कि आज भाजपा का महाराष्ट्र में अपना सीएम है और विधायक भी उसी के सबसे ज्यादा हैं. यही स्थिति बिहार की है, जहां पहली बार उसके दल का मुख्यमंत्री बना है और वह जूनियर पार्टनर नहीं है बल्कि सबसे बड़ा दल है. अब स्थिति भाजपा पंजाब में लागू करना चाहती है. आखिर उसे पंजाब में इसकी ताकत कैसे मिल रही है.
पंजाब की राजनीति को समझने वाले मानते हैं कि भाजपा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह, केवल सिंह ढिल्लो, एचएस फूल्का और रवनीत सिंह बिट्टू जैसे कई दिग्गज सिख चेहरों को अपने पाले में लिया है. भाजपा की राजनीति पंजाब में लंबे समय तक शहरी हिंदुओं तक सीमित रही है. ऐसे में अब उसे लगता है कि शहरी हिंदुओं के अलावा थोड़े उदार सिख पंथिकों के बीच भी वह पैठ बना सकती है. यही कारण है कि भाजपा खुद के विस्तार की तीव्र इच्छा में है. यह समय भी उसे अपने अनुकूल लग रहा है क्योंकि सिख वोटरों की खुद को सबसे बड़ा दावेदार करने वाला अकाली दल पहले के मुकाबले बेहद कमजोर है. ऐसी स्थिति भाजपा को अपने मुफीद लग रही है.
वोटों के ट्रांसफर के लिए भाजपा अकाली दल को साथ तो लेना चाहती है, लेकिन अपना शेयर कम नहीं करना चाहती. बता दें कि 2022 का चुनाव अकाली दल के लिए बेहद निराशाजनक था. तब अकाली दल को 3 ही सीट मिली थीं और भाजपा को 2 सीट मिली थी. इस तरह सीटों का अंतर भी दोनों के बीच काफी कम रह गया था. फिर लोकसभा चुनाव में भी अकाली दल कोई कमाल नहीं दिखा सका. इसलिए भाजपा चाहती है कि अकाली दल की कमजोरी के दिनों में पूरा फायदा उठा लिया जाए और पंजाब में भी बिहार और महाराष्ट्र की तरह विस्तार की कोशिश की जाए.
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