बीजेपी के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी पश्चिम बंगाल के अगले मुख्यमंत्री होंगे. शुक्रवार को बीजेपी विधायक दल की बैठक में उनके नाम पर मुहर लगा दी गई. सूत्र बताते हैं कि बंगाल में बीजेपी दो डिप्टी सीएम बना सकती है. संभावित नामों में शंकर घोष भी शामिल हैं. दूसरा नाम अग्निमित्रा पॉल का बताया जा रहा है. अमित शाह ने भी दोनों से अलग से मुलाकात की है. इससे ये चर्चाएं जोर पकड़ गई हैं कि सिलीगुड़ी से जीतकर आए शंकर घोष को उपमुख्यमंत्री पद दिया जा सकता है. आइए बताते हैं कि शंकर घोष के बारे में और ये भी कि क्यों उन्हें उत्तर बंगाल में बीजेपी का 'चाणक्य' कहा जाता है.
शुरुआती जीवन
पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले के विष्णुपुर में 12 जून 1974 को शंकर घोष का जन्म हुआ. उन्होंने 2013 में उत्तर बंगाल यूनिवर्सिटी से माइक्रोबायलॉजी में पीएचडी की. वह टीचर भी रहे हैं. उनकी पत्नी आईटी प्रोफेशनल हैं.

वाम राजनीति में एंट्री
- 1991 में उन्होंने सीपीएम की छात्र शाखा स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) में शामिल होकर राजनीतिक जीवन की शुरुआत की.
- 1995 में वह सीपीएम की यूथ विंग डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) के मेंबर बने.
- 2015 में सिलीगुड़ी नगर निगम के वार्ड नंबर 24 से पार्षद चुने गए और मेयर-इन-काउंसिल के रूप में शिक्षा, स्वास्थ्य और खेल जैसे विभाग संभाले.
पहले चुनाव में 'गुरु' को मात दे पहुंचे विधानसभा
बीजेपी ने 2021 के बंगाल चुनाव में शंकर घोष को सिलीगुड़ी से उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारा. इस चुनाव में शंकर घोष ने अपने ही राजनीतिक गुरु और दिग्गज वामपंथी नेता अशोक भट्टाचार्य को मात दी और पहली बार विधानसभा की सीढ़ी चढ़ गए.

शुभेंदु के करीबी, सदन में चीफ व्हिप
विधानसभा में अपनी पहली पारी से ही शंकर घोष ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी थी. अनोखे अंदाज और तीखी शैली से धाक जमा ली. धीरे-धीरे वह उस वक्त के नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के विश्वासपात्र बन गए. धोती पहनकर विधानसभा में उन्होंने ममता सरकार के खिलाफ खूब मोर्चा संभाला. 2024 में उन्हें सदन में बीजेपी का मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बना दिया गया. इस दौरान उन्होंने ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ मुद्दों को जोरशोर से उठाया.
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मार्शलों से बाहर निकलवा दिया था
पिछले साल सितंबर में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी ने बीजेपी शासित राज्यों में बंगाली प्रवासी श्रमिकों के उत्पीड़न का आरोप लगाकर सदन में प्रस्ताव पेश किया था. इस पर ममता जैसे ही बोलने के लिए खड़ी हुईं, बीजेपी विधायकों ने जोरदार हंगामा कर दिया. इस पर शंकर घोष, अग्निमित्रा पॉल समेत 5 बीजेपी विधायकों को सदन से निलंबित कर दिया गया था. लेकिन शंकर घोष ने सदन छोड़ने से इनकार कर दिया. इसके बाद मार्शलों के जरिए उन्हें बाहर ले जाया गया था.
इस बार सिलीगुड़ी के मेयर को दी मात
2026 के विधानसभा चुनाव में शंकर घोष फिर से उत्तर बंगाल के सबसे बड़े शहर सिलीगुड़ी से मैदान में उतरे. टीएमसी ने उनके खिलाफ सिलीगुड़ी के मेयर गौतम देब को मैदान में उतारा, लेकिन घोष ने 73,192 वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल कर ली. घोष को कुल 1,20,760 वोट मिले थे. तीसरे नंबर पर सीपीएम के शारदेंदु चक्रवर्ती रहे, जिन्हें महज 9,168 वोट मिले.
शंकर घोष की छवि उत्तर बंगाल में बीजेपी के 'चाणक्य' की तरह है. वह बंगाल के इस इलाके में बीजेपी के सबसे बड़े चेहरा हैं. क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में उन्हें माहिर माना जाता है. उनकी साफ सुथरी छवि और शहरी मतदाताओं में लोकप्रियता ने दार्जिलिंग-सिलीगुड़ी में पार्टी का जनाधार खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है. माना जा रहा है कि इन्हीं खूबियों को देखते हुए पार्टी उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने पर विचार कर रही है.
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