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कौन होते हैं निहंग? नीली पोशाक, बड़ी पगड़ी, तलवार... सिख धर्म के योद्धा जिनसे मुगल भी थर्राते थे

निहंग सिख, सिख इतिहास के वे जीवंत निशानी हैं, जिन्होंने समय की कसौटी पर अपनी परंपराओं, युद्ध कला और संतों जैसी जीवनशैली को आज भी हूबहू जिंदा रखा है. वो सिख धर्म की लाडली फौज के रूप में जाने जाते हैं.

कौन होते हैं निहंग? नीली पोशाक, बड़ी पगड़ी, तलवार... सिख धर्म के योद्धा जिनसे मुगल भी थर्राते थे
Nihang Sikh
NDTV
नई दिल्ली:

निहंग सिख या निहंग सिंह सिख धर्म के भीतर सम्मानित और पारंपरिक योद्धा होते हैं. नीले रंग के वस्त्रों, बड़ी पगड़ी और पारंपरिक हथियार से उनकी उनकी अलग पहचान दिखती. सिख धर्म के इतिहास में उनकी जगह एक रक्षक और जांबाज योद्धा की रही है.निहंग शब्द फारसी भाषा से आया है, जिसका अर्थ निष्कलंक या बिना किसी भय के होता है. सिख परंपरा में इसका अर्थ निडर या मौत के भय से मुक्त योद्धा के तौर पर है.निहंग संप्रदाय की शुरुआत सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह के समय सन 1699 में खालसा पंथ की स्थापना के साथ मानी जाती है.कुछ इतिहासकार इनकी पोशाक का संबंध गुरु गोविंद सिंह के छोटे बेटे साहिबजादा फतेह सिंह द्वारा नीली पोशाक पहनने की घटना से भी जोड़ते हैं.

मुगल और अफगानों से युद्ध

18वीं शताब्दी में जब सिख समुदाय मुगल शासकों और विदेशी हमलावरों जैसे अहमद शाह अब्दाली के हमलों का सामना कर रहा था, तब निहंग सिखों ने सिख समाज की हिफाजत में अहम भूमिका निभाई. वो गुरिल्ला युद्ध (छापामार युद्ध) में माहिर थे.महाराजा रणजीत सिंह के शासन (19वीं सदी की शुरुआत) में निहंग सिखों की सेना (अकाली) ने कई बड़ी जंग जीतीं. निहंग योद्धा अकाली फूलो सिंह की अगुवाई में निहंग सिखों ने बड़ा योगदान दिया.

सिख पंथ की प्राचीन योद्धा परंपरा के प्रतिनिधि

पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार रविंदर सिंह रॉबिन का कहना है कि निहंग सिख पंथ की प्राचीन योद्धा परंपरा के प्रतिनिधि माने जाते हैं. उन्हें गुरु की लाडली फौज भी कहा जाता है. उनकी पहचान नीले वस्त्र, ऊंची दस्तार, लोहे के चक्र और पारंपरिक शस्त्रों से होती है। उनका प्रशिक्षण गुरबाणी, सिख इतिहास, रहित-मर्यादा, घुड़सवारी, गतका, युद्ध-कौशल, शस्त्र-विद्या, अनुशासन और सेवा में होता है. ऐतिहासिक रूप से उनकी जिम्मेदारी धर्मस्थलों, संगत, कमजोर लोगों और सिख पंथ की रक्षा करना रही है.

आज निहंग सिखों की सैन्य विरासत, शस्त्र-विद्या और परंपराओं को जीवित रखते हैं. होला मोहल्ला, नगर कीर्तन और धार्मिक आयोजनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. उनकी अहमियत ऐतिहासिक और धार्मिक दोनों हैं.

रविंदर सिंह रॉबिन

सीनियर जर्नलिस्ट, पंजाब

निहंग कैसे बनते हैं? 

सवाल उठता है कि निहंग सिख कैसे बनते हैं और उनकी दीक्षा कैसे होती है. कोई भी सिख जन्म से निहंग नहीं होता. कठोर अनुशासन और धार्मिक नियमों का पालन करके ही कोई निहंग बनना पड़ता है.

1. अमृत छकना (दीक्षा)

निहंग बनने की पहली शर्त यह है कि व्यक्ति को पूरी मर्यादा के साथ 'अमृत' पान करना होता है. सिख आचार संहिता (रहती मर्यादा) का कठोरता से पालन करना होता है.

2. सेवादार के तौर पर शुरुआत

शुरुआत में निहंग बनने की प्रक्रिया में व्यक्ति को भुजंगी कहा जाता है. उसे डेरे या छावनी में रहकर गुरुद्वारे की सेवा, लंगर बनाना, घोड़ों की देखरेख और साफ-सफाई जैसे काम करते हैं.

3. कठोर प्रशिक्षण

सेवा के साथ-साथ उन्हें शस्त्र विद्या जैसे सिख युद्ध कला गतका में पारंगत करना होता है.घुड़सवारी और पवित्र गुरुग्रंथ साहिब, दसम ग्रंथ की बाणी (गुरबाणी) का पाठ करना और समझना सिखाया जाता है.जब जत्थेदार (प्रमुख) को लगता है कि शिष्य शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से पूरी तरह तैयार हो चुका है, तब उसे औपचारिक तौर पर निहंग स्वीकार किया जाता है. तब वह नीले वस्त्र और हथियार धारण करता है.

4. निहंग सिखों की जिम्मेदारी

निहंग सिख सिख समुदाय का समर्पित सैनिक और संत (संत, सिपाही) का मिश्रण होता है. निहंगों का मूल कर्तव्य सिख धर्म के सिद्धांतों की रक्षा करना, गुरुद्वारों की सुरक्षा करना और किसी भी गरीब, असहाय या महिला पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ खड़े होना है. 

5. सिख मर्यादा का पालन 

सिख धर्म की मर्यादा का पालन करना उनकी जिम्मेदारी होती है. सिखों के 'पंच ककार' (केश, कंगा, कड़ा, कछैरा और कृपाण) को वो हमेशा धारण करते हैं. वो 24 घंटे हथियारों से लैस रहते , ताकि किसी भी आपात स्थिति का तुरंत सामना कर सकें.

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खानाबदोश जीवन और छावनी में जीवनयापन

निहंग सामान्यतया किसी एक जगह में बंधकर नहीं रहते. वो शिविर में दलों या जत्थों (जैसे बुड्ढा दल, तरना दल) में रहते हैं. उनकी अपनी छावनी, डेरे या शिविर होते हैं. निहंग आज भी बड़े त्योहारों जैसे होला मोहल्ला, बैसाखी पर अपनी युद्ध कला और घुड़सवारी का जौहर दिखाते हैं.

निहंग सिखों की कूट भाषा

निहंग सिखों की अपनी एक अनोखी और कोड लैंग्वेज होती है. इसे गार्गोआ या खालसाई बोले कहते हैं. इसमें वो बहुत ऊंचे और वीर रस के शब्दों में भरे होते हैं. जैसे वो दूध को समुद्र, अकेले व्यक्ति को सवा लाख और मिर्च को लड़ाकू विमान या अक्कल दाढ़ कहते हैं.
 

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