- उत्तर प्रदेश में होने वाले राज्यसभा चुनाव में भाजपा सात सीटें और सपा दो सीटें आसानी से जीत सकती है
- सपा तीसरे कैंडिडेट को जिताने के लिए दस विधायक कम होने के कारण वरीयता वोटों पर निर्भर रहेगी
- बसपा के पास इस बार कोई विधायक नहीं है इसलिए वह राज्यसभा में शून्य सीटों पर आ जाएगी
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों पर चुनाव होने वाला है और इसमें रस्साकशी देखने को मिल सकती है. भाजपा अपने दम पर 7 सीटें जीतने की स्थिति में है तो वहीं अखिलेश यादव की सपा भी दो सीटें आसानी से जीत सकती है. अब तक मिली जानकारी के अनुसार इन दो सीटों पर प्रोफेसर रामगोपाल यादव और आलोक रंजन को उतारा जा सकता है. लेकिन वह यह नहीं रुकने वाली और एक तीसरा कैंडिडेट भी अखिलेश यादव उतार सकते हैं. यदि ऐसा हुआ तो फिर हॉर्स ट्रेडिंग, क्रॉस वोटिंग समेत कई आरोपों का दौर चल सकता है. सपा के पास तीसरे कैंडिडेट को जिताने के लिए 10 विधायक कम होंगे.
ऐसे में तीसरे कैंडिडेट के लिए विधायक कैसे जुटाए जाएंगे, यह देखना अहम होगा. बसपा के पास अब कोई विधायक नहीं है, इसलिए बसपा इस बार राज्यसभा में शून्य पर आ जाएगी. ऐसे में बची हुई एक सीट पर संभव है कि वरीयता के मतदान से तय हो कि कौन राज्यसभा जाएगा. इसके लिए भाजपा और सपा के बीच कड़ी खींचतान हो सकती है. राज्यसभा में एक सीट जीतने के लिए 37 विधायकों की ज़रूरत होगी. उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में छह सदस्यों के निधन की वजह से वर्तमान में सदस्यों की संख्या 397 है. राज्यसभा की एक सीट का फार्मूला- कुल विधायक 397÷ (रिक्त सीटें 10 + 1)+1 के आधार पर तय होता है.
इस आधार पर प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट के लिए 37 वोटों की जरूरत होगी. दलों के हिसाब से आंकड़े की बात की जाए तो 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के कुल 111 विधायक चुनाव जीते थे. सपा से जीतने वाले कुछ पाला बदलकर भाजपा के साथ चले गए थे और कुछ का निधन हो गया. वर्तमान में सपा के कुल 101 विधायक हैं. सपा को तीसरे सदस्य को जिताने के लिए वरीयता के वोटों की ज़रूरत होगी. ये तभी संभव है जब कुछ विधायक अपने द्वितीय वरीयता के वोट सपा के प्रत्याशी को दें. अगर ऐसा हुआ तो भाजपा के लिए ये बड़ा झटका हो सकता है, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो भाजपा इसका मनोवैज्ञानिक लाभ लेने से पीछे नहीं हटेगी.
अब बात भाजपा की करें तो 2022 में उसके कुल 255 विधायक चुनाव जीते थे. वर्तमान में भाजपा की संख्या 256 है. भाजपा अपने विधायकों के अलावा सहयोगी दलों के विधायकों का वोट लेगी. अपना दल (एस) के पास कुल 13, आरएलडी के पास कुल 9, सुभासपा के पास कुल 6 और निषाद पार्टी के कुल 5 विधायक हैं. राजा भइया की पार्टी का अगर भाजपा को समर्थन मिला तो दो विधायक उसके भी इसमें जुड़ सकते हैं. ऐसे में भाजपा को समर्थन देने वाले विधायकों की संख्या 291 हो जाएगी. इनके अलावा तीन निर्दलीय सदस्य हैं, जिनका समर्थन भी भाजपा को मिल सकता है.
ऐसे में अगर 294 वोटों को 37 से डिवाइड करें तो ये आंकड़ा 7.94 आता है. यानी आठवां संसद जिताने के लिए भाजपा के पास थोड़े से वोट कम पड़ेंगे. आठ सांसद जिताने के लिए कुल 296 वोट चाहिए. यानी बीजेपी के पास दो वोट कम हैं. अब अगर भाजपा ने वरीयता के आधार पर सपा के विधायकों को कन्विंस कर लिया तो यूपी विधानसभा चुनाव से पहले ये सपा को झटका होगा. इस तरह यह राज्यसभा चुनाव अखिलेश यादव और भाजपा दोनों के लिए ही अहम है और खींचतान वाला होगा. जो जितेगा, वह अपना शक्ति प्रदर्शन कर देगा और हारने वाले के लिए सीधा झटका होगा.
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