विज्ञापन
This Article is From Sep 17, 2025

पश्चिमी चम्पारण में थारू समुदाय का अनोखा पर्व ,48 घंटे का ‘ग्रीन लॉकडाउन’, 400 साल पुरानी परंपरा आज भी जिंदा

बगहा के थारू और आदिवासी समाज का बरना पर्व सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि यह एक प्रकृति के लिए प्रेम है. जहां इंसान ठहरता है और प्रकृति को जीने का मौका मिलता है.

पश्चिमी चम्पारण में थारू समुदाय का अनोखा पर्व ,48 घंटे का ‘ग्रीन लॉकडाउन’, 400 साल पुरानी परंपरा आज भी जिंदा

जरा आप  कल्पना कीजिए, एक ऐसा गांव जहां अचानक सब कुछ रुक जाए. न खेतों में हल चले, न घरों में चूल्हे जलें, न पेड़ से पत्ता टूटे, न घास की एक तिनका भी कोई छुए. लोग अपने घरों को छोड़कर जंगल की ओर निकल जाएं और पूरा गांव का एक दम 48 घंटे तक सुनसान हो जाए. गांव में एक छोटा बच्चा भी दिखाई न दे.

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि बिहार के पश्चिमी चम्पारण के बगहा इलाके में थारू और आदिवासी जनजाति द्वारा मनाया जाने वाला बरना पर्व की कहानी है. इसमें सभी लोग एक जगह जाकर अपने देवता की पूजा अर्चना करने के साथ साथ वही पर बनाते खाते है.

 400 साल पुरानी परंपरा 

बरना पर्व की परम्परा करीब चार सौ साल पुरानी मानी जाती हैं. थारू समाज और आदिवासी समाज मानता है कि प्रकृति हमारी मां है और उसे भी आराम की जरूरत है. इसलिए साल में एक बार, पूरे गांव पर 48 घंटे का ग्रीन लॉकडाउन लगा दिया जाता है. इस पर्व के दौरान गांव में हर तरह की गतिविधि बंद कर दी जाती हैं.

 ग्रीन लॉकडाउन की असली तस्वीर 

बरना पर्व के दौरान गांव के लोग पेड़-पौधों को छूते तक नहीं हैं. खेतों से फसल तोड़ना ,घास-पत्ते तक काटना मना है.इस दौरान लोग जंगल में जाकर डेरा डालते हैं, वहीं रहते हैं और प्रकृति को खुलकर सांस लेने का मौका देते हैं.

गांव में सन्नाटा और जंगल में रौनक 

बरना पर्व शुरू होते ही गांव का नजारा किसी वीराने जैसा हो जाता है. महिलाएं,पुरुष घरों को छोड़कर जंगलों की तरफ निकल जाते है.खाली घर, बंद दरवाजे और गलियां सुनसान हो जाती हैं. बच्चे,बुजुर्ग और जवान सब कोई इस ग्रीन लॉक डाउन का पालन करते हैं. लेकिन दूसरी ओर जंगल में जीवन लौट आता है. लोग सामूहिक रूप से वहां समय बिताते हैं, गीत गाते हैं. यह अनुभव बच्चों और युवाओं को भी संदेश देता है कि धरती सिर्फ हमारी नहीं, आने वाली पीढ़ियों की भी है.

पर्यावरण का अनोखा सबक 

आज जब दुनिया जलवायु संकट और पर्यावरणीय आपदा से जूझ रहा है, तब बगहा के थारू और आदिवासी समुदाय की यह परंपरा सबक देती है कि बिना किसी लालच के उन्होंने सदियों पहले प्रकृति के संरक्षण का ऐसा उपाय खोज लिया था, जो आज भी कारगर है.

संस्कृति, आस्था और विज्ञान का संगम 

थारू और आदिवासी समाज का बरना पर्व धार्मिक आस्था से जुड़ा जरूर है, लेकिन उनकी आत्मा पर्यावरण में बसती है. यह त्योहार याद दिलाता है कि त्योहार सिर्फ खुशियों के लिए नहीं, जिम्मेदारी निभाने के लिए भी होते हैं.

प्रकृति को जीने का मौका 

बगहा के थारू और आदिवासी समाज का बरना पर्व सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि यह एक प्रकृति के लिए प्रेम है. जहां इंसान ठहरता है और प्रकृति को जीने का मौका मिलता है.
 

लेखक के बारे में
img
प्रभाकर कुमार
Contributing Editor
पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Tharu Community, West Champaran District, West Champaran News, West Champaran, Green Lockdown
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com