UGC Rules Latest Updates: यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में जातीय भेदभाव को लेकर यूजीसी की नई गाइडलाइन पर सियासी विवाद बढ़ता जा रहा है. सब अपने नजरिये से यूजीसी के इन नियमों का समर्थन या विरोध कर रहे हैं. ऐसे में विशेषज्ञों की क्या राय है, ये जानना भी महत्वपूर्ण हो जाता है. RISU के वाइस चांसलर और मनोवैज्ञानिक डॉ. जवाहर सुरिसेट्टी का कहना है कि यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर जो आशंकाएं जाहिर की गई हैं, उसको लेकर देखना होगा कि कहीं ओवर रेगुलेशन तो नहीं हो रहा है, क्योंकि जरूरत से ज्यादा नियम-कानून जटिलता पैदा करते हैं. SC-ST और OBC छात्रों की शिकायतों के लिए जिन समानता केंद्र और अधिकारियों की नियुक्ति होनी हैं, वो कितनी कारगर हैं.
यूनिवर्सिटी-कॉलेज में पहले से ही कई समितियां
विश्वविद्यालय, कॉलेज में पहले ही अनुशासन समितियां और एथिक्स कमेटी जैसे कई उपाय हैं, जिनके जरिये शिकायतों का निपटारा किया जा सकता है. जातिगत भेदभाव को लेकर भले ही ये समानता केंद्र अच्छे इरादे से बनाए गए हैं, लेकिन ऐसा लग रहा है कि हम इस पर जरूरत से ज्यादा जोर दे रहे हैं. UGC, AICTE और नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन जैसे नियामक संस्थाओं को मिलाकर उच्च शिक्षा संस्थानों में एक सिंगल रेगुलेटर बनाने की प्रक्रिया चल रही है.
जहां ज्यादा शिकायतें, वहां ज्यादा फोकस हो
यूजीसी का अस्तित्व ही खतरे में है, उस वक्त ये नई पहल क्या अभी जरूरी है. सुरिसेट्टी का कहना है कि सभी राज्यों और सभी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए एक सामान्य गाइडलाइन की बजाय अगर उन राज्यों या संस्थानों पर फोकस किया जाता, जहां ऐसे शिकायतें ज्यादा आ रही हैं. मसलन अगर यूपी या बिहार में ज्यादा शिकायतें आ रही हैं, वहां फोकस करना बेहतर होता.
यूनिवर्सिटी-कॉलेजों पर पहले ही बोझ
आलोचकों का तर्क है कि ये गाइडलाइंस ओवरकरेक्शन (जरूरत से ज्यादा सुधार) को दिखाती है. ऐसी समस्याओं के लिए इतनी बड़ी मशीनरी हर स्तर पर तैयार करना - जिनका पैमाना अभी तय नहीं हुआ है- क्या सही है. यूनिवर्सिटी और कॉलेज पहले ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं. ऐसे में अलग से समानता सेंटर बनाना, समानता अधिकारी बनाना होगा. उन पर काफी प्रशासनिक और वित्तीय बोझ है.
यूजीसी के क्या दिशानिर्देश
- उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव विरोधी कमेटी और समानता अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य
- एससी-एसटी के साथ ओबीसी को भी इसमें शामिल किया गया है.
- साथ ही झूठी शिकायतों पर सजा का प्रावधान हटाया गया
यूजीसी इन बातों पर ध्यान दे
किन संस्थानों को सबसे ज़्यादा शिकायतें मिलती हैं?
किस तरह के भेदभाव ज्यादा होते हैं?
क्या शिकायतें किसी खास डिपार्टमेंट या जगहों तक ही सीमित हैं?
कितनी प्रतिशत शिकायतें सही पाई गईं और कितनी वापस ले ली गईं?
मॉनिटरिंग सिस्टम लागू हो
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे आंकड़ों के साथ UGC मॉनिटरिंग सिस्टम लागू कर सकता था. ज्यादा शिकायतों वाले संस्थानों के लिए कड़ी निगरानी और जिनका रिकॉर्ड साफ़ है, उनके लिए सामान्य निगरानी. जबकि हमारे पास एक ऐसा नियम है जो IIT दिल्ली और एक छोटे कॉलेज दोनों के साथ एक जैसा व्यवहार करता है.
कहीं इन नियमों से दोहराव तो नहीं
यह धारणा कि ये गाइडलाइन मौजूदा फ्रेमवर्क को दोहराती हैं, बेबुनियाद नहीं है. SC/ST (अत्याचार निवारण) कानून पहले से ही जाति आधारित भेदभाव को कड़ी सजा के साथ अपराध मानता है. शिक्षण संस्थानों में पहले से ही POSH गाइडलाइन के तहत आंतरिक शिकायत समितियां (ICC), छात्र शिकायत सेल और एंटी रैगिंग कमेटियां हैं. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग निगरानी तंत्र भी हैं.
सामान्य श्रेणी का विरोध क्यों
डॉ. सुरिसेट्टी का कहना है कि समानता लाने की ये पहल सामान्य वर्ग के छात्रों में असमानता की भावना वाली चिंता पैदा करती है. जातिगत भेदभाव खत्म करने के ये नियम एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग को विकल्प देते हैं. जबकि सामान्य श्रेणी के छात्रों की शिकायतों को दूर करने के लिए ऐसा कोई ढांचा नहीं है. फिर चाहे वह एडमिशन प्रक्रिया, वित्तीय मदद या भेदभाव के आरोपों के बारे में हो. उनमें चिंता है कि ये नियम विशेष रूप से कुछ समूहों के लिए बनाए गए हैं और दूसरों वर्गों की अनदेखी करते हैं. इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव हो सकता है. सामान्य वर्ग के छात्रों को यह महसूस हो रहा है कि उन्हें प्रभावशाली जातियां बताकर उनके शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है. जातिवाद के आरोपों के बिना निष्पक्षता की सही चिंताओं को भी जायज नहीं ठहराया जाता.
UGC के सामने ये बेहतर विकल्प
- डेटा पारदर्शिता: हर संस्थान भेदभाव की शिकायतों का सालाना डेटा पब्लिश करे, जिससे सार्वजनिक जवाबदेही और सोच-समझकर दखल देना संभव हो सके.
- जोखिम और निगरानी: शिकायत के इतिहास वाले संस्थानों की गहन निगरानी करना, साफ रिकॉर्ड वाले संस्थानों को सेल्फ-रेगुलेशन की अनुमति देना.
- शिकायत का एक जैसा ढांचा: सभी भेदभाव की शिकायतों (जाति, लिंग, धर्म, क्षेत्रीय, या आर्थिक) के लिए छात्र लोकपाल ऑफिस बनाना
- असली वजहों की पड़ताल: यह सोचना होगा कि मौजूदा कानूनों के बावजूद शैक्षिक संस्थानों में भेदभाव क्यों बना हुआ है, इस पर अध्ययन जरूरी है.
- प्रोत्साहन भी जरूरी: उल्लंघनों के लिए सजा देने के अलावा समावेशी संस्कृति वाले संस्थानों को मान्यता, फंडिंग, या स्वायत्तता के लिए सम्मान भी दिया जाए.
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