“दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त होता है” – भले ही हिंदी की ये कहावत घिस पिट चुकी हो, महाराष्ट्र की राजनीति में अब भी प्रासंगिक है. संदर्भ है मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिव सेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे के आपसी रिश्तों का. हाल फिलहाल में ठाकरे की ओर से सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान दिये जा रहे हैं जिनसे संकेत मिलते हैं कि वे फडणवीस के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं. इसके पीछे ठाकरे की मंशा अपने सियासी दुश्मन, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री, एकनाथ शिंदे को असहज महसूस करवाना नजर आता है.
फडणवीस और शिंदे कभी एक दूसरे पर नहीं करते हमला
वैसे तो देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र की सत्ता में साझेदार हैं और दोनों ने कभी भी खुलेआम एक दूसरे के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया... लेकिन राज्य के सियासी गलियारों में ये बात किसी से छुपी नहीं कि शिंदे की नजर फडणवीस की कुर्सी पर है. साल 2022 से 2024 तक दो साल मुख्यमंत्री रहने के बाद दूसरे नंबर का पद रास नहीं आ रहा. वे फिर एक बार मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. ये बात उस वक्त भी खुलकर सामने आ गयी थी जब साल 2024 में बीजेपी की ओर से फडणवीस के नाम की बतौर मुखयमंत्री घोषणा के बाद शिंदे कुछ दिनों के लिये नाराज होकर कोप भवन में चले गये थे. उनकी पार्टी के कुछ नेता दबी जुबान से, ऑफ द रिकॉर्ड, ये कहते सुने गये हैं कि अब फडणवीस को केंद्र में चले जाना चाहिये और शिंदे साहब को फिर एक बार मुख्यमंत्री बनने का मौका मिलना चाहिये.
ऑपरेशन टाईगर, ऑपरेशन देवेंद्र था
ठाकरे ने हिंगोली में ली गयी एक सभा के दौरान कहा कि ऑपरेशन टाईगर दरअसल ऑपरेशन देवेंद्र था, जिसका मकसद देवेंद्र फडणवीस के पर कतरना था ताकि वे अगले प्रधानमंत्री की रेस से बाहर हो सकें. इसके बाद शिर्डी में ली गयी पत्रकार परिषद में जब उनसे ये पूछा गया कि अगर देवेंद्र फडणवीस प्रधानमंत्री बनते हैं तो क्या आप उनको समर्थन देंगे, तो ठाकरे ने जवाब दिया कि अगर महाराष्ट्र का व्यकित प्रधानमंत्री के पद पर बैठता है तो हमारी पार्टी उसके साथ क्यों नहीं होगी? लेकिन मैने महाराष्ट्र का आदमी कहा है, गद्दार नहीं.
जब एक तीर से दो शिकार करना चाहते थे ठाकरे
देवेंद्र फडणवीस के प्रति इस तरह के हमदर्दी भरे बयान देकर ठाकरे एक तीर से दो निशाने लगाने की कोशिश करते दिखते हैं. एक तरफ वे शिंदे को घेरने की कोशिश कर रहे हैं तो दूसरी तरफ देवेंद्र फडणवीस के साथ अपने रिश्ते को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं. वो रिश्ता जो साल 2019 में मुख्यमंत्री पद को लेकर हुए झगडे में टूट गया था. विधान सभा चुनाव में सबसे बडी पार्टी के तौर पर उभरकर और बहुमत के लिये पर्याप्त सीटें हासिल कर लेने के बाद भी फडणवीस महज ठाकरे की जिद की वजह से मुख्यमंत्री नहीं बन पाये थे. ठाकरे को इस जिद की कीमत पार्टी में बगावत झेल कर और पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह गंवा कर चुकानी पडी थी. अब जब ठाकरे को फिर एक सियासी झटका लगा है और उनका राजनीतिक अस्तित्व खतरे में पड गया है तो वे फिर एक बार फडणवीस के साथ गलबहियों की कोशिश करते नजर आ रहे हैं.
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