- सबसे पहली और सबसे दिखने वाली वजह थी तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ मजबूत सत्ता विरोधी लहर.
- दूसरी वजह लगभग हर जिले में स्थानीय दबंगों का उभरना.
- तीसरी बड़ी वजह थी सिविल सोसायटी के कुछ हिस्सों में निराशा का बढ़ना.
किसी भी चुनाव में जनता के वोट देने के पीछे कभी केवल एक वजह नहीं होती. चुनावी नतीजे कई ताकतों के लंबे समय तक एक साथ काम करने से सकारात्मक बनते हैं. पश्चिम बंगाल की आबादी करीब दस करोड़ है और वोटर लगभग छह करोड़. ये आंकड़े तो चेक किए जा सकते हैं, पर असल बात तो ये है कि इतने बड़े राजनीतिक परिवर्तन को कोई एक वजह नहीं समझा सकती. पिछले दो साल में मैं राज्य के लगभग हर जिले में गया हूं. उन अनुभवों के आधार पर एक साफ तस्वीर उभरती है.
पहली वजह
सबसे पहली और सबसे दिखने वाली वजह थी तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ मजबूत सत्ता विरोधी लहर. पंद्रह साल सत्ता में रहने से थकावट का आना तय था. सत्ता विरोधी लहर आखिर प्रकृति के नियम के मुताबिक ही है- जो ऊपर जाता है, वो कभी न कभी नीचे भी आता है.
दूसरी वजह
दूसरी वजह भी थी, जो लगभग हर जिले में लगातार दिखी. यह था स्थानीय दबंगों का उभरना. कई जगह ‘गुंडों' के समूह राजनीतिक संरक्षण पाने वाले एनफोर्सर बन गए. कई लोगों के लिए यह रोजी-रोटी का हिस्सा बन गया. डर और दबाव के जरिए उनका कंट्रोल बढ़ा और धीरे-धीरे उगाही की एक पूरी संस्कृति बन गई. खासकर रियल एस्टेट जैसे सेक्टर में ये साफ दिखा. रेत से लेकर सीमेंट तक, सब एक नेटवर्क का हिस्सा बन गया. बहुतों के लिए ये रोजी-रोटी का जरिया बन गया, लेकिन इसके साथ एक दबाव वाला ढांचा भी बना, वहां आम लोगों को ‘कट' देना पड़ता था- ये सिर्फ स्थानीय नेताओं तक सीमित नहीं था, कुछ मामलों में 'कट' पुलिस को भी देना पड़ता था.

छोटे-छोटे पार्टी दफ्तर स्थानीय सत्ता के केंद्र बन गए, जहां लोग पावर ब्रोकर की तरह काम करने लगे. ये कोई छिपी हुई बात नहीं थी, जमीन पर साफ दिखती थी. यहां तक कि ई-रिक्शा चलाने जैसी रोजमर्रा की चीज भी अनौपचारिक भुगतान से जुड़ गई. कई ड्राइवर, जिनके पास ठीक से रजिस्ट्रेशन भी नहीं था, लोकल बिचौलियों को पैसे देकर काम करते थे. और जब ऐसे सिस्टम जड़ पकड़ लेते हैं, तो उन्हें चुनौती देना मुश्किल हो जाता है. लोग सहते रहे, लेकिन अंदर ही अंदर इससे निकलने की चाह बढ़ती गई.
तीसरी वजह
तीसरी बड़ी वजह थी सिविल सोसायटी के कुछ हिस्सों में निराशा का बढ़ना. ये हमेशा जोर से नहीं दिखता था, लेकिन मौजूद जरूर था.
इसी से जुड़ा एक बड़ा असर शिक्षा घोटाले के विवादों का रहा, जिसने लोगों की सोच को काफी प्रभावित किया. आरजी कर वाला मामला भी सामने आया, जिसने खासकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी. इसका असर इसलिए ज्यादा पड़ा क्योंकि महिलाएं ममता बनर्जी की सबसे मजबूत सपोर्ट बेस रही हैं. ये समर्थन अचानक नहीं बना था, बल्कि सालों में तैयार हुआ था. रेल मंत्री रहते हुए भी उन्होंने कामकाजी महिलाओं के लिए कई कदम उठाए थे, खासकर उन महिलाओं के लिए जो रोज काम के लिए सफर करती थीं. बाद में मुख्यमंत्री बनने के बाद महिलाओं के नाम पर हेल्थ कवर, मरीजों के लिए यात्रा भत्ता और लक्ष्मीर भंडार जैसी योजनाएं, जिसमें हर महीने 1500 रुपये मिलते हैं, ने इस सपोर्ट को मजबूत किया.
काउंटर कैंपेन
लेकिन इस बार इसमें साफ गिरावट दिखी. एक वजह नरेंद्र मोदी की काउंटर कैंपेन भी रही, जिनकी महिला वोटरों में देशभर में अच्छी पकड़ है. सुरक्षा जैसे मुद्दे और कुछ बड़े मामलों ने पहले वाली एकजुटता को कमजोर किया. मोदी ने महिलाओं की सुरक्षा पर जोर दिया और ये भी कहा कि इस बार उन्हें 3000 रुपये महीना देंगे- जो उन्होंने पहले कभी नहीं कहा था. 2021 के चुनाव में वो इन योजनाओं के खिलाफ थे और उन्हें बेरोजगारी की वजह बताते थे, लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि ये रणनीति सही नहीं थी. बीजेपी अब उसी तरह की योजनाओं को अपनाने से हिचकती नहीं है.
चौथा बड़ा मुद्दा कानून-व्यवस्था का रहा, जिसमें टीएमसी से जुड़े गुंडों की हिंसा में बढ़ोतरी की बात सामने आई. कांग्रेस के बाद जब सीपीएम सत्ता में आई, तो कांग्रेस के कई गुंडे सीपीएम में चले गए. फिर सीपीएम के बाद टीएमसी आई, तो वही पैटर्न दोहराया गया- गुंडे, माफिया और लंपट तत्व सिस्टम का हिस्सा बनते गए. इससे राज्य में, खासकर चुनाव के दौरान, हिंसा बढ़ती चली गई.
अहम बदलाव
एक और अहम बदलाव शहरी, पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग में देखने को मिला. ऐतिहासिक रूप से ये वर्ग कांग्रेस के साथ रहा. बाद में लेफ्ट के खिलाफ रहा, फिर सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों के दौरान लेफ्ट की तरफ झुका. ममता बनर्जी ने इसी असंतोष को राजनीतिक रूप दिया. लेकिन समय के साथ, खासकर टाटा प्रोजेक्ट के जाने जैसे औद्योगिक झटकों के बाद, ये भरोसा फिर से कमजोर पड़ने लगा.
ये बदलाव भवानीपुर जैसी सीटों में भी दिखा, जो कॉस्मोपॉलिटन, एलीट और राजनीतिक रूप से प्रतिष्ठित मानी जाती है. यहां कभी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सिद्धार्थ शंकर रे जैसे नेता चुनाव लड़ चुके हैं. इसके बावजूद वोटरों के मूड में बदलाव साफ नजर आया. सुवेंदु अधिकारी की भूमिका भी अहम रही. एलीट बैकग्राउंड से न होने के बावजूद उन्होंने एक मजबूत और भरोसेमंद चेहरा बनाकर, खासकर हिंदू वोटों को जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई.

अहम फैक्टर
अब आते हैं एक और अहम फैक्टर पर- धार्मिक ध्रुवीकरण. पारंपरिक रूप से मुस्लिम वोटर ममता बनर्जी के साथ मजबूती से जुड़े रहे हैं. उम्मीद थी कि ये सिलसिला जारी रहेगा, खासकर मोदी और अमित शाह की राष्ट्रीय राजनीति को लेकर समुदाय में जो चिंता है, उसे देखते हुए.
लेकिन बीजेपी की कैंपेन रणनीति ने ध्रुवीकरण को और तेज कर दिया. अलग-अलग नैरेटिव और लेबल्स का आक्रामक इस्तेमाल हुआ. इसके जवाब में ममता ने भी संतुलन बनाने की कोशिश की- मंदिरों में जाना, सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल- लेकिन इससे पूरी तरह नैरेटिव को काउंटर नहीं किया जा सका.
बीजेपी बड़ी संख्या में हिंदू वोटरों को एकजुट करने में कामयाब रही. खासकर शहरी इलाकों में ये धारणा बनी कि राज्य सरकार कुछ खास समूहों के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम है, यहां तक कि कानून-व्यवस्था के मामलों में भी. ये धारणा सही थी या नहीं, ये अलग बहस है, लेकिन चुनावी असर जरूर पड़ा. यहां तक कि मंदिर निर्माण में राज्य की भूमिका जैसे प्रतीकात्मक मुद्दे भी चर्चा का हिस्सा बने और बड़े नैरेटिव को मजबूत किया.
संरचनात्मक वजहें
आखिर में, कुछ संरचनात्मक वजहें भी थीं. जैसे वोटर लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया, जिसे राजनीतिक भाषा में SIR कहा जाता है, बीजेपी का मानना है कि खासकर बॉर्डर वाले जिलों में इसका असर पड़ा. अगर ये फैक्टर न होते, तो शायद ये बदलाव वोट में उतनी मजबूती से नहीं दिखता.
आखिरकार, ये किसी एक लहर की कहानी नहीं थी, बल्कि कई धाराओं के एक साथ मिलने की. एंटी-इनकंबेंसी, संगठन की थकान, बदलते वोटर, पहचान की राजनीति और रणनीतिक कैंपेन- सबने मिलकर चुनावी तस्वीर बदल दी.
इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि ममता बनर्जी एक ही गलती की वजह से पिछड़ गईं. असल में कई छोटे-बड़े बदलाव, कुछ धीरे-धीरे और कुछ अचानक, मिलकर इस नतीजे तक पहुंचे.
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