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This Article is From May 19, 2022

नवजोत सिद्धू के खिलाफ फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संस्कृत के श्लोक का किया खास जिक्र, जानें इसके मायने..

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि वर्तमान मामला ऐसा नहीं है जहां दो विचार संभव हैं जैसे कि पुनर्विचार  का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए.

प्रतीकात्‍मक फोटो
नई दिल्‍ली:

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu)मामले में  24 पेज के अपने फैसले में संस्कृत के श्लोक का जिक्र किया है. SC ने इसके साथ ही कहा कि उसका सिर्फ जुर्माना लेकर छोड़ना और सजा में रहम दिखाने का फैसला सही नहीं था.  क्रिकेटर से राजनीति के 'फील्‍ड' में कदम रखने वाले सिद्धू को 34 साल पुराने रोड रेज मामले में एक साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संस्‍कृत के एक श्‍लोक का भी जिक्र किया..

“यथावयो यथाकालं यथा प्राणंच ब्राह्मणे।
प्रायश्चितं प्रदातव्यंब्राह्मणैर्धर्धपाठकैः।
येन शुध्ददर्वाप्नोश्चत न च प्राणैश्चवधयुज्यते।
आश्चतिंवा र्हतीं यश्चत न चैतद् व्रतराश्चदशेत ।।“

इसका अर्थ है कि प्राचीन धर्मशास्त्र भी कहते रहे हैं कि पापी को उसकी उम्र, समय और शारीरिक क्षमता के मुताबिक दंड देना चाहिए. दंड ऐसा भी नहीं हो कि वो मर ही जाए बल्कि दंड तो उसे सुधारने और उसकी सोच को शुद्ध करने वाला हो. पापी या अपराधी के प्राणों को संकट में डालने वाला दंड नहीं देना उचित है 

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि वर्तमान मामला ऐसा नहीं है जहां दो विचार संभव हैं जैसे कि पुनर्विचार  का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए. यह एक ऐसा मामला है जहां सिद्धू  पर केवल जुर्माना लगाते समय सजा के लिए कुछ जरूरी तथ्य खो गए हैं और इसलिए दो संभावित विचारों के बीच चयन करने का कोई सवाल ही नहीं उठता है. हम इस बारे में बहुत कुछ नहीं बता रहे हैं कि जांच शुरू में कैसे आगे बढ़ी. अदालत को यह देखने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा कि संबंधित लोगों पर कैसे आरोप लगाए गए हैं जैसे-सबूतों के तरीके, डॉक्टरों की झिझक, जो सभी इस न्यायालय में तौले गए थे कि उचित संदेह से परे मामला  है और ये IPC की धारा 323 के तहत केवल एक का हो सकता है. 

SC ने कहा, 'हम मानते हैं कि केवल जुर्माना लगाने और सिद्धू को बिना किसी सजा के जाने देने के द्वारा रहम दिखाने की आवश्यकता नहीं थी.एक असमान रूप से हल्की सजा अपराध के पीड़ित को अपमानित और निराश करती है.जब अपराधी को दंडित नहीं किया जाता है या अपेक्षाकृत मामूली सजा के साथ छोड़ दिया जाता है क्योंकि सिस्टम घायल की भावनाओं पर ध्यान नहीं देता है.अपराध के शिकार लोगों के अधिकारों के प्रति उदासीनता सामान्य रूप से समाज और विशेष रूप से अपराध के शिकार व्यक्ति के आपराधिक न्याय प्रणाली में विश्वास को तेजी से नष्ट कर रही है.' 

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Navjot Singh Sidhu, Supreme Court, Road Rage Case
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