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सोमनाथ से शुरू रथयात्रा में जब मोदी ने फूंकी जान, महाजन कह उठे- मैं ये नहीं कर सकता... और बदल गई BJP की कहानी

वेरावल की खामोशी से जनसैलाब तक. आडवाणी की राममंदिर रथयात्रा में नरेंद्र मोदी के संगठनात्मक कौशल से बीजेपी के उभार की पूरी कहानी.

सोमनाथ से शुरू रथयात्रा में जब मोदी ने फूंकी जान, महाजन कह उठे- मैं ये नहीं कर सकता... और बदल गई BJP की कहानी
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  • 1990 में सोमनाथ से शुरू हुई आडवाणी की रथयात्रा BJP के जन-संगठन और बूथ आधारित राजनीति की पहली बड़ी परीक्षा बनी.
  • तब संघ के कार्यकर्ता रहे नरेंद्र मोदी का संगठनात्मक कौशल इसी यात्रा में राष्ट्रीय स्तर पर पहचाना गया.
  • वेरावल की खामोशी से जनसैलाब की वो कहानी जो आज भी भारतीय राजनीति की दिशा समझाती है.
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25 सितंबर 1990 से ठीक एक दिन पहले वेरावल की गलियों में असहज करने वाली खामोशी पसरी थी. सोमनाथ मंदिर से सटे इस तटीय शहर में ऐसा कोई संकेत नहीं दिख रहा था, जिससे लगे कि अगले दिन यहां से एक ऐसी ऐतिहासिक राजनीतिक यात्रा शुरू होने वाली है, जो आने वाले दशकों में न केवल भारतीय जनता पार्टी बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगी. अगले दिन सोमनाथ से आडवाणी की राममंदिर रथयात्रा शुरू होनी थी. न दीवारों पर पोस्टर थे, न झंडे, न बैनर और न ही किसी बड़े आयोजन की चहल-पहल. जब बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी और उनके साथ प्रमोद महाजन यहां पहुंचे, तो उनके मन में स्वाभाविक संदेह पैदा हुआ.

आडवाणी के अनुसार, पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व रथयात्रा की सफलता को लेकर पहले से ही सशंकित था क्योंकि यह पहली बार था जब राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा जनजागरण कार्यक्रम किया जा रहा था.  शहर में रथयात्रा के कोई संकेत मौजूद नहीं थे तो इन शीर्ष नेताओं को यह संदेह हुआ कि क्या इसके लिए पर्याप्त तैयारी की गई है या नहीं. तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के युवा प्रचारक नरेंद्र मोदी को इस रथयात्रा के गुजरात चरण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

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अगली सुबह (25 सितंबर 1990 को) जब रथयात्रा सोमनाथ से आगे बढ़ी तो दृश्य एकदम बदल चुका था. जिन सड़कों पर एक दिन पहले सन्नाटा पसरा था, वहां लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा. उस भीड़ में केवल एक वर्ग या एक तबके के लोग शामिल नहीं थे. शहरी मध्यमवर्ग के साथ-साथ ओबीसी, दलित और आदिवासी समुदाय के लोग भी बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे. यह बीजेपी के लिए एक नया अनुभव था और साथ ही थी एक नए दौर की शुरुआत भी. यह केवल धार्मिक भावनाओं का उभार नहीं था, बल्कि उस बीजेपी मॉडल की पहली झलक थी, जिसकी नींव सोमनाथ की उसी सुबह रखी गई थी.

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प्रमोद महाजन की चिंता बढ़ी और आडवाणी से ये बोले...

गुजरात चरण की इस अप्रत्याशित प्रतिक्रिया ने न केवल आडवाणी को चौंकाया बल्कि मीडिया भी हैरान रह गया और इसने प्रमोद महाजन को भी चिंता में डाल दिया. प्रमोद महाजन इस लिए खास तौर पर चिंतित हो गए क्योंकि रथयात्रा का अगला चरण उनके ही राज्य महाराष्ट्र में होना था और वहां की जिम्मेदारी उनके ही कंधों पर थी. गुजरात ने उम्मीदों की नई और ऊंची लकीर जो खींच दी थी. रथ पर सवार महाजन ने आडवाणी से कहा, "महाराष्ट्र में इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद न रखें." उनका तर्क था कि गुजरात की सामाजिक संरचना और गहरी धार्मिक आस्था की वजह से लोगों की ऐसी प्रतिक्रिया मिली. लेकिन तब वो यह नहीं समझ पाए कि इसके पीछे एक मजबूत और प्रभावशाली संगठनात्मक ढांचा पहले ही तैयार किया जा चुका था.

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वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह अपनी किताब ‘द आर्किटेक्ट ऑफ द न्यू बीजेपीः हाउ नरेंद्र मोदी ट्रांसफॉर्म्ड द पार्टी' (The Architect of the New BJP: How Narendra Modi Transformed the Party) में लिखते हैं, "रथयात्रा से ठीक एक दिन पहले ही नरेंद्र मोदी भी वेरावल लौटे थे. वो आडवाणी की रथयात्रा के रूट की पूरी मैपिंग कर आए थे. उनसे जुड़े लोग बताते हैं कि उन्होंने यात्रा के दौरान होने वाले हर कार्यक्रम की बारीकियों में खुद को शामिल कर लिया था. रथयात्रा के रूट में किसी भी प्रकार की अड़चन आने की स्थिति में वैकल्पिक मार्ग क्या अपनाना है, इसकी भी तैयारी कर ली थी."

अजय सिंह लिखते हैं कि ये पहली बार था जब भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर के सामाजिक वर्गों तक अपनी पहुंच बनाई थी.

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बूथ मैनेजमेंट मॉडल की शुरुआत

यही वह दौर था, जब नरेंद्र मोदी का नाम राजनीतिक चिंतकों के बीच गंभीरता से लिया जाना शुरू हुआ था. इस रथयात्रा में जो संगठनात्मक मॉडल सामने आया, वही आगे चलकर बूथ मैनेजमेंट के नाम से लोगों की जुंबा पर चढ़ा. हर क्षेत्र में स्थानीय कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करना. हर सामाजिक समूह से संवाद करना. मतदान से पहले माहौल बनाना और मतदान के लिए अंतिम मतदाता तक पहुंच सुनिश्चित करना. आज जिस बूथ स्तर की रणनीति के लिए बीजेपी की खुले तौर पर चर्चा और प्रशंसा होती है, उसके बीज इसी रथयात्रा के दौरान बोए गए थे.

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बीजेपी के 'चाणक्य'

इसी संगठनात्मक कौशल को देखते हुए बाद में इंडिया टुडे मैगजीन ने अपनी एक चर्चित कवर स्टोरी में नरेंद्र मोदी को बीजेपी का 'चाणक्य' लिखा था. यह उपाधि सत्ता में आने के बाद नहीं, बल्कि संगठन खड़ा करने की उनकी क्षमता को पहचानकर दी गई थी. 1990 की रथयात्रा ने यह साफ कर दिया था कि बीजेपी की राजनीति अब केवल भाषणों और नारों तक सीमित नहीं रहने वाली है.

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आडवाणी की गिरफ्तारी और राजनीतिक अस्थिरता

आडवाणी की रथ यात्रा गुजरात के बाद, महाराष्ट्र,  मध्य प्रदेश होती हुए बिहार पहुंची और 22 अक्टूबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिए गए. बेशक वो रथयात्रा अयोध्या नहीं पहुंच सकी पर बीजेपी का राजनीतिक प्रभाव कई गुना बढ़ गया. आडवाणी को गिरफ्तार किए जाने के बाद बीजेपी ने केंद्र में वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया. गुजरात में असर तुरंत दिखा. बीजेपी ने चिमनभाई पटेल सरकार से समर्थन वापस लिया और राज्य सरकार अल्पमत में आ गई. पर कांग्रेस ने राज्य में चिमनभाई की सत्ता बचाई तो केंद्र में चंद्रशेखर उसके समर्थन से प्रधानमंत्री बने. लेकिन इस राजनीतिक जोड़-तोड़ ने गुजरात में कांग्रेस की साख को गहरी चोट पहुंचाई. कई विश्लेषकों ने इसे पार्टी के पतन की निर्णायक कड़ी माना.

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बीजेपी के उभरने की कहानी

अगले ही साल 1991 में लोकसभा चुनाव हुआ जो बीजेपी के लिए जनाधार बढ़ाने वाला साबित हुआ. पहली बार बीजेपी ने लोकसभा में सीटों की सेंचुरी जमाई. बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प के तौर पर उभर चुकी थी. 1992 में अयोध्या की घटना और 1996 में पहली बार केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार बनी पर केवल 13 दिन ही चल सकी. 16 मई 1996 से 1 जून 1996 तक. हालांकि 1998 में बीजेपी सत्ता में दोबारा लौटी, मगर वो सरकार भी 13 महीने चली. तीसरी बार बीजेपी के पास केंद्र की सत्ता 1999 से 2004 तक रही जो एनडीए का स्थिर शासन था. उसके हर पड़ाव पर रथयात्रा की स्मृति जीवित रही.

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Photo Credit: Gujarat Tourism

सोमनाथ से शुरू हुई रथयात्रा का कनेक्शन

बीजेपी की इस पूरी यात्रा में सोमनाथ केवल आरंभ बिंदु नहीं रहा. वह प्रतीक बना. बार-बार टूटकर फिर खड़े होने का प्रतीक. वैचारिक दृढ़ता का प्रतीक. राजनीतिक धैर्य का प्रतीक. यही कारण है कि पार्टी के भीतर यह विश्वास गहराता चला गया कि बाबा सोमनाथ का आशीर्वाद बीजेपी की इस यात्रा के साथ है. यह आस्था और राजनीति का ऐसा संगम था, जिसने कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप से बांध दिया.

2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब इस पूरी कहानी को पीछे मुड़कर देखा गया. संगठन, बूथ, कार्यकर्ता, जनआंदोलन, सामाजिक विस्तार. सबकी जड़ें उसी रथयात्रा में दिखाई दीं. 2020 में राम मंदिर का भूमिपूजन हुआ. 22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा हुई और इतिहास ने जैसे एक चक्र पूरा कर लिया.

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35 सालों की राजनीतिक यात्रा 

आज नरेंद्र मोदी एक बार फिर उसी जगह, उसी समुद्र और उसी सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में हैं, लेकिन भूमिका बदल चुकी है. 25 सितंबर 1990 की सुबह वो एक संगठन के ऐसे कार्यकर्ता थे जिनकी तैयारियों पर संदेह था. आज वह उस राजनीतिक यात्रा के केंद्र में हैं, जिसकी नींव सोमनाथ में रखी गई थी. फर्क ये है कि तब नेतृत्व संशय में था पर आज संगठन आत्मविश्वास से लबरेज है और यह आत्मविश्वास उसे मोदी के नेतृत्व ने ही दिया है. जब सोमनाथ की धरती पर भोले बाबा को मोदी प्रणाम करते हैं तो यह केवल आस्था का क्षण नहीं होता है बल्कि उस राजनीतिक यात्रा की मौन स्वीकृति होती है जिसने सोमनाथ से अयोध्या और अयोध्या से सत्ता के शिखर तक का रास्ता तय किया है.

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