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स्नान पूर्णिमा: 108 कलशों से हुआ महाप्रभु जगन्नाथ का महास्नान; श्रीमंदिर के मुख्य पुजारी ने बताया महत्व

स्नान पूर्णिमा 2026 पर पुरी में भगवान जगन्नाथ का 108 कलशों से भव्य महास्नान किया. यह पवित्र अनुष्ठान रथ यात्रा की शुरुआत का संकेत माना जाता है. श्रीमंदिर के मुख्य पुजारी ने बताया कि यह दिन महाप्रभु के प्राकट्य का प्रतीक है.

स्नान पूर्णिमा पर महाप्रभु जगन्नाथ ने किया महास्नान.
  • स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ का महास्नान 108 पवित्र कलशों से बड़े श्रद्धा और भव्यता के साथ किया जाता है.
  • यह पर्व भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य का प्रतीक है और रथ यात्रा की औपचारिक शुरुआत का संकेत देता है.
  • महास्नान में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र का अलग-अलग संख्या में कलशों से अभिषेक होता है.

स्नान पूर्णिमा 2026 के पावन पर्व पर भगवान जगन्नाथ का महास्नान बेहद श्रद्धा और भव्यता के साथ किया गया. 108 पवित्र कलशों से होने वाला यह अनुष्ठान न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि रथ यात्रा की औपचारिक शुरुआत का संकेत भी देता है. श्रीमंदिर के मुख्य पुजारी के अनुसार, यह दिन महाप्रभु के प्राकट्य का प्रतीक है, जिसे हर साल भक्त अपार श्रद्धा से मनाते हैं.

क्या है स्नान पूर्णिमा का महत्व?

मंदिर के मुख्य पुजारी श्री सूर्यनारायण रथशर्मा ने NDTV से बातचीत में बताया कि स्नान पूर्णिमा को जगन्नाथ संस्कृति का एक बेहद खास और पवित्र पर्व माना जाता है. यह ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और इसे भगवान जगन्नाथ के प्रकट होने के दिन के रूप में देखा जाता है. इस दिन भगवान को विशेष रूप से स्नान कराया जाता है, जिसे देखना भक्तों के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है.

108 कलशों से होता है महास्नान

उन्होंने कहा कि इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन चक्र का 108 पवित्र कलशों से अभिषेक किया जाता है. यह जल मंदिर के ‘सुन कुएं' से लाया जाता है, जिसमें औषधियां, चंदन और सुगंधित पदार्थ मिलाए जाते हैं. कलशों का बंटवारा भी तय होता है. भगवान जगन्नाथ को 35, बलभद्र को 33, सुभद्रा को 22 और सुदर्शन चक्र को 18 कलश समर्पित किए जाते हैं.

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महास्नान के बाद गजानन वेश

पुजारी रथशर्मा के अनुसार, महास्नान के बाद भगवान को गजानन यानी हाथी स्वरूप में सजाया जाता है. यह रूप साल में सिर्फ एक बार ही देखने को मिलता है, इसलिए भक्त बड़ी संख्या में इस दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं. इस खास वेश में भगवान का रूप बेहद आकर्षक और अलौकिक दिखाई देता है.

अनवसर काल: 15 दिन का विराम

मान्यता है कि स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं. इसके चलते वे 15 दिनों के लिए ‘अनवसर' यानी एकांतवास में चले जाते हैं. इस दौरान मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और भगवान विश्राम करते हैं.

अनवसर काल के बाद भगवान नए और युवा रूप में दर्शन देते हैं, जिसे ‘नवयौवन दर्शन' कहा जाता है. इसके तुरंत बाद भव्य रथ यात्रा का आयोजन होता है, जिसमें भगवान नगर भ्रमण पर निकलते हैं और लाखों श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं.

आस्था और परंपरा का अनोखा संगम

स्नान पूर्णिमा सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, संस्कृति और अटूट विश्वास का प्रतीक है. यह पर्व भक्तों को आध्यात्मिक रूप से जोड़ता है और भगवान जगन्नाथ की भक्ति में डूबने का एक खास अवसर देता है.

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