Deva Snana Purnima 2026 Rituals and significance: सनातन परंपरा में प्रत्येक मास के शुक्लपक्ष की पंद्रहवीं तिथि पूर्णिमा का काफी ज्यादा महत्व माना गया है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व तब और भी ज्यादा बढ़ जाता है जब यह ज्येष्ठ मास में पड़ती है और इसे देव स्नान पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। देव स्नान पूर्णिमा को पुरी में 'स्नान यात्रा' के नाम से भी जाना जाता है। यह पावन स्नान यात्रा भगवान जगन्नाथ के भक्तों के लिए अत्यंत ही शुभ पर्व होती है क्योंकि इसी दिन पुरी धाम में सारे जगत के नाथ कहलाने वाले भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्र का विशेष जलाभिषेक होता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ को कराए जाने वाले इस महास्नान का क्या महत्व है.
108 सोने के जल कलश से होता है भगवान का महास्नान

Photo Credit: Facebook@जय जगन्नाथ
कई दशक से पुरी जगन्नाथ की रथयात्रा का आंखों देखा हाल बताने वाले अशोक पांडेय के अनुसार ज्येष्ठ मास की पावन पूर्णिमा तिथि पर सारे जगत के नाथ यानि भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और उनके बड़े भाई बलभद्र को गर्भगृह से स्नान मंडप तक ढोल, मृदंग, शंख ध्वनि और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ स्नान मंडप पर लाया जाता है। इसे 'पहंडी विजय' के नाम से जाना जाता है। इसके बाद सभी देवताओं का विधि-विधान से महास्नान कराया जाता है। भगवान जगन्नाथ का महास्नान कराने के लिए स्वर्णकूप से 108 सोने के घड़ों में जल लाया जाता है। भगवान जगन्नाथ को स्नान कराने से पहले पुजारियों के द्वारा पूजा-अनुष्ठान किया जाता है। घड़ों के जल में पुष्प, चंदन, कपूर, केसर, आदि सुगंधित द्रव्य डालकर विशेष मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है।
किस देवता को कितने घड़ों से कराया जाता है स्नान?

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर इस महास्नान की प्रक्रिया में प्रत्येक देवता के लिए जल से भरों घड़ों की संख्या भी सुनिश्चित होती है। महास्नान के लिए भर कर लाए गये 108 घड़ों के जल में से 35 कलशों के जल से भगवान जगन्नाथ को स्नान कराया जाता है तो वहीं बलभद्र भगवान को 33 जल कलश और सुभद्रा जी को 22 कलश से स्नान कराया जाता है। बाकी बचे 18 कलश से सुदर्शन चक्र का स्नान होता है।
स्नान के बाद होते हैं गज वेश के दर्शन

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महास्नान के बाद भगवान को पहले 'सादा बेश' फिर बाद में 'हाथी बेश' यानी भगवान गणेश के रूप में अलंकृत किया जाता है। अशोक पांडेय के अनुसार भगवान के इस गज वेश के पीछे भी एक लोक कथा है। मान्यता है कि महाराष्ट्र के गणपति उपास विनायक भट्ट स्नान यात्रा के दौरान पुरी आए। यहां पर आने के बाद उन्होंने भगवान जगन्नाथ के गणेश स्वरूप की कामना की। जिसके बाद उनकी श्रद्धा और भक्ति को देखकर भगवान जगन्नाथ ने मंदिर के पुजारी को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि उन्हें महास्नान के बाद गजानन वेश में सजाया जाए। मान्यता है कि तब से लेकर आज तक भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के गज वेश के दर्शन और पूजन की परंपरा चली आ रही है।
तब स्नान के बाद बीमार हो जाते हैं भगवान
हिंदू मान्यता के अनुसार स्नान यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं और तीनों देवता मंदिर परिसर में स्थित 'अनसार' घर में विश्राम करते हैं। इस दौरान भक्तों को भगवान के दर्शन नहीं होते हैं। भगवान को स्वास्थ्य लाभ के लिए इस दौरान उन्हें औषधि दी जाती है। इसके बाद दो सप्ताह बाद यानि रथ यात्रा के ठीक एक दिन पहले भक्तों को भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र दोबारा दर्शन होते हैं।
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