अयोध्या राम मंदिर में दान चोरी विवाद के बीच श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने उन सभी अटकलों पर हमेशा के लिए विराम लगा दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि चंपत राय और अनिल मिश्रा इस्तीफा देने के बाद भी ट्रस्ट का हिस्सा बने हुए हैं.
ट्रस्ट ने साफ कर दिया है कि सोमवार यानी 6 जुलाई 2026 को इस्तीफा मंजूर होने के बाद से ही दोनों अब आधिकारिक तौर पर ट्रस्ट के सदस्य नहीं रहे हैं.
ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि ने पीटीआई को जानकारी देते हुए बताया कि चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे सोमवार को हुई बैठक में स्वीकार कर लिए गए हैं और इसके साथ ही ट्रस्ट में उनकी सदस्यता भी खत्म हो गई है. उन्होंने उन दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया कि दोनों ने केवल अपने पद छोड़े हैं और वे अभी भी ट्रस्टी बने हुए हैं.
नए महासचिव की नियुक्ति पर 22 जुलाई को मंथन
गोविंद देव गिरि ने बताया कि इस समय भारतीय वन सेवा (IFoS) के रिटायर्ड अधिकारी कृष्ण मोहन को ट्रस्ट का अंतरिम महासचिव नियुक्त किया गया है. ट्रस्ट की अगली अहम बैठक 22 जुलाई को होने वाली है.
इस्तीफे पर क्या हैं ट्रस्ट के नियम?
चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए गिरि ने स्पष्ट किया कि इस मामले में ट्रस्ट के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था. वरिष्ठ ट्रस्टी के. पारासरन ने बैठक में बताया था कि ट्रस्ट के संविधान के अनुसार, जैसे ही कोई सदस्य अपना इस्तीफा सौंपता है, वह तत्काल प्रभाव से लागू हो जाता है. इसलिए ट्रस्ट के पास इन इस्तीफों को स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं था.
संत समाज की मिली-जुली प्रतिक्रिया
ट्रस्ट के इस बड़े फैसले पर अयोध्या के संतों की अलग-अलग राय सामने आई है. महंत शशिकांत दास ने चंपत राय को हटाए जाने पर नाखुशी जताते हुए इसे 'दुखद' करार दिया. उनका तर्क है कि जब स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने चंपत राय को दोषी नहीं पाया, तो ऐसा नहीं होना चाहिए था. वहीं, जगद्गुरु राम दिनेशाचार्य ने कहा कि आरोपों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के लिए चंपत राय का इस्तीफा देना बिल्कुल सही कदम था.
जगद्गुरु परमहंस आचार्य ने ट्रस्ट के फैसले का खुलकर स्वागत किया. उन्होंने कहा कि पूरा संत समाज ट्रस्ट के हर फैसले के साथ मजबूती से खड़ा है. साथ ही उन्होंने बिना सबूत आरोप लगाने वालों की कड़ी निंदा की और विपक्ष पर राम मंदिर के मुद्दे पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाया.
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