मुंबई में गोरेगांव स्थित NESCO सेंटर और सायन के षणमुखानंद हॉल के बीच की भौगोलिक दूरी केवल 15 किलोमीटर है. लेकिन राजनीतिक रूप से दोनों के बीच जमीन-आसमान का फर्क है. शुक्रवार शाम को इन दोनों जगहों पर शिवसेना का स्थापना दिवस मनाया जाएगा. ये दोनों कार्यक्रम उन दो गुटों द्वारा आयोजित किए जा रहे हैं, जो बाला साहेब ठाकरे की विरासत का असली वारिस होने का दावा करते हैं.
बाला साहेब ठाकरे ने 1966 में इसी दिन शिवसेना की स्थापना की थी.दोनों गुट पार्टी का 60वां स्थापना दिवस मना रहे हैं. दोनों ही बाला साहेब की विरासत पर अपना दावा जता रहे हैं. इनमें से एक गुट की अगुवाई ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे के हाथ में है तो दूसरे गुट की कमान महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के हाथ में. शिंदे ने उद्धव से बगावत कर पार्टी पर कब्जा कर लिया था.
महाराष्ट्र के दो नेताओं की कहानी
उद्धव ठाकरे एक घायल बाघ की तरह षणमुखानंद हॉल में कदम रखेंगे.उनकी पार्टी के स्थापना दिवस कार्यक्रम पर शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों की बगावत की छाया होगी. यह 2022 में हुई फूट जैसा ही है, जिसे एकनाथ शिंदे ने बहुत सूझ-बूझ से अंजाम दिया था.उद्धव की राजनीतिक साख बिखर चुकी है.
दूसरी ओर, एकनाथ शिंदे NESCO सेंटर में ठीक उसी आत्मविश्वास के साथ पहुंचेंगे, जैसे कोई बाघ शिकार के बाद आता है. उद्धव ठाकरे की पार्टी में एक और टूट-फूट कराते हुए. शिंदे ने ठाकरे के नौ में से छह सांसदों को अपने पाले में कर लिया है. यह 2022 में शिंदे की बगावत के बाद ठाकरे की पार्टी में सबसे बड़ी टूट है. वे इस अवसर का इस्तेमाल अपनी ताकत दिखाने और यह साबित करने के मौके के तौर पर करेंगे कि वही असली शिवसेना हैं, नाम और भावना दोनों ही लिहाज से. ऐसे जैसे कि बाला साहेब की विरासत के असली वारिस वही हैं.

उद्धव ठाकरे को 2022 के बाद से कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, इससे उनके राजनीतिक कौशल पर सवाल उठ रहे हैं.
उद्धव ठाकरे के लिए यह राजनीतिक और व्यक्तिगत, दोनों ही स्तर पर सबसे मुश्किल समय है. बगावत के इस ताजा झटके ने पार्टी को एकजुट रखने की उनकी काबिलियत पर सवाल खड़े किए हैं.
उद्धव के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है
अगर 'सलामी स्लाइसिंग' (धीरे-धीरे ताकत कम करना) कोई राजनीतिक काम है, तो उद्धव ठाकरे से बढ़िया इसे और कोई नहीं समझ सकता है. साल 2022 में उद्धव ठाकरे को शिंदे की बगावत का सामना करना पड़ा. इससे उनकी सरकार गिर गई. मुख्यमंत्री के तौर पर, उनका अधिकांश कार्यकाल कोविड के दौर में बीता. महामारी से निपटने की आपाधापी में उन्हें असल नीतिगत मुद्दों पर काम करने का समय बहुत कम मिला. सरकार गिरने के एक साल बाद उन्हें अपनी पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न से भी हाथ धोना पड़ा.
2024 के लोकसभा चुनाव में उद्धव को उम्मीद की एक किरण नजर आई. नए नाम और चुनाव चिह्न के साथ लड़ते हुए, उनके गुट ने उन 13 सीटों में से आठ पर शिंदे की अगुवाई वाली सेना को हराया, जिन पर दोनों गुटों में सीधा मुकाबला था. इस प्रदर्शन ने उद्धव और उनके कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाया कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. उन्हें लगा कि लोगों की सहानुभूति उनके साथ है और पार्टी को फिर से खड़ा किया जा सकता है. लेकिन उनकी यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी. कुछ ही महीनों बाद हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें करारा झटका लगा. बीजेपी की अगुआई वाली महायुति की जबरदस्त लहर के सामने उद्धव की सेना बुरी तरह पिछड़ गई. वह केवल 20 सीटें ही जीत पाई.
इस बीच जनवरी 2026 में कराए गए बृहन्मुंबई नगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव ने मुश्किलों से घिरे उद्धव गुट के लिए फिर से कुछ उम्मीदें जगाईं. बीएमसी चुनाव में मिली सफलता ने उनके आलोचकों को गलत साबित किया. उद्धव ने उस जगह पर अपनी पकड़ बनाए रखी जो हमेशा से शिवसेना का गढ़ रहीं थीं. हालांकि बीजेपी गठबंधन ने इस चुनाव में जीत दर्ज की. लेकिन उद्धव गुट ने 227 में 65 सीटें जीतकर सबको प्रभावित किया. खासकर तब, जब शिंदे गुट केवल 29 सीटों पर सिमट गया. आज उद्धव भले ही सत्ता में न हों. लेकिन वह अभी भी मैदान में डटे हुए हैं.
इससे पहले के संकटों ने जहां ठाकरे की सरकार, पार्टी, चुनावी संभावनाओं और राजनीतिक साख को चुनौती दी थी, वहीं मौजूदा संकट इन सभी चुनौतियों का मिला-जुला रूप है. यह ठाकरे नाम और उद्धव की उस क्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा है, जिसके जरिए वे इसे राजनीतिक मंजिल तक ले जा सकें.

उद्धव ठाकरे की शिवसेना में दो बगावत कराने के बाद से एकनाथ शिंदे का कद एनडीए में बढ़ गया है.
एनडीए में शिंदे का बढ़ता कद
वहीं उद्धव की पार्टी के छह सांसदों को अपने खेमे में शामिल करने के बाद एकनाथ शिंदे की स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है. बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन में उनका कद आज निश्चित रूप से किसी भी ग्रीन एनर्जी कंपनी से भी तेजी से बढ़ेगा. वे शिवसेना के स्थापना दिवस समारोह को अपनी ताकत दिखाने के एक बड़े मंच में बदल देंगे. उम्मीद है कि शिंदे एक बार फिर दिवंगत शिवसेना संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की विरासत पर अपना दावा पेश करेंगे. सांसदों का पाला बदलना शिंदे के उस हमले को और मजबूती देगा कि उद्धव बाला साहेब के रास्ते से भटक गए हैं.
महायुति में एकनाथ शिंदे, जिनके बीजेपी से संबंध विधानसभा चुनाव के बाद, खासकर बीएमसी चुनाव के बाद से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. शिंदे अब अपनी ताकत दिखाने के लिए ठोस आंकड़े पेश कर सकेंगे. उनकी संसदीय ताकत सात से बढ़कर 13 हो गई है. यह एनडीए के लिए एक अहम बढ़त है, क्योंकि सरकार कई अहम बिल पास कराने की तैयारी में है. इससे शिंदे का असली 'सेनापति' होने का दावा और मजबूत होगा.
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