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मणि शंकर अय्यर को शशि थरूर ने खुली चिट्ठी में याद दिलाया- तब भारत ने सोवियत संघ की निंदा करने से परहेज किया था

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मणि शंकर अय्यर को लिखे खुले खत में याद दिलाया कि कैसे बहुत पहले भारत ने सोवियत संघ की आलोचना करने से परहेज किया था. विदेश नीति पर थरूर के इस तीखे जवाब ने राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी है.

मणि शंकर अय्यर को शशि थरूर ने खुली चिट्ठी में याद दिलाया- तब भारत ने सोवियत संघ की निंदा करने से परहेज किया था
  • शशि थरूर ने मणि शंकर अय्यर को खुला पत्र लिखकर उनके आरोपों का कड़ा जवाब दिया.
  • थरूर ने कहा कि विदेश नीति में राष्ट्रहित, व्यवहारिकता और रणनीतिक संतुलन जरूरी है.
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि मतभेद लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन देशभक्ति पर सवाल उठाना गलत है.
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कांग्रेस के लोकसभा सांसद शशि थरूर ने अपने ही दल के वरिष्ठ नेता मणि शंकर अय्यर को एक खुला पत्र लिखकर उनके आरोपों और टिप्पणियों का कड़ा जवाब दिया है. यह पत्र न सिर्फ दोनों नेताओं के बीच बढ़े मतभेद को सामने लाता है, बल्कि भारत की विदेश नीति, राष्ट्रहित और लोकतांत्रिक बहस के स्वरूप पर भी बड़ी बहस छेड़ देता है. थरूर ने अपने इस पत्र के माध्यम से यह स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतंत्र में असहमति का होना उसकी ताकत है, लेकिन किसी सहयोगी की देशभक्ति या मंशा पर सवाल उठाना सार्वजनिक बहस को कमजोर करता है. इसी पत्र के माध्यम से थरूर ने याद दिलाया कि कैसे पहले सोवियत संघ की आलोचना करने से भारत ने परहेज किया था.

मतभेद लोकतंत्र की पहचान

थरूर ने अपने पत्र में लिखा कि एक मजबूत लोकतंत्र की पहचान यह है कि वहां अलग-अलग राय रखने की आजादी है. लेकिन अगर कोई सिर्फ इसलिए किसी की नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाए क्योंकि उसकी विदेश नीति पर अलग राय है, तो इससे स्वस्थ बहस को नुकसान होता है. उन्होंने कहा कि अय्यर को अपने विचार रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन हाल ही में उनकी सार्वजनिक रूप से की गई आलोचना का स्पष्ट जवाब देना जरूरी हो गया था.

विदेश नीति की सोच राष्ट्रहित पर आधारित

थरूर ने कहा कि उन्होंने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मामलों को स्पष्ट राष्ट्रवादी नजरिए से देखा है. हर चर्चा में भारत के हित, सुरक्षा और वैश्विक प्रतिष्ठा को केंद्र में रखा है. उन्होंने लिखा कि जियो-पॉलिटिकल सच्चाइयों को समझना और भारत की अर्थव्यवस्था तथा रणनीतिक स्थिति पर उसके असर को तौलना नैतिक रूप से कोई समर्पण नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी का अहसास है.

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सिद्धांत और व्यवहार का संतुलन

थरूर ने याद दिलाया कि भारत की कूटनीति हमेशा सिद्धांत और व्यवहारिकता के बीच संतुलन बनाकर चली है. उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति से लेकर आज के बहुध्रुवीय विश्व में विभिन्न मंचों से सक्रिय रूप से जुड़कर राष्ट्रीय हितों को साधना- भारत का हमेशा एक ही लक्ष्य रहा है और वो है अपने देश की संप्रभुता की रक्षा करने के साथ-साथ विश्व स्तर पर न्याय के लिए आवाज उठाना. उन्होंने कहा कि देशभक्ति पर किसी एक पीढ़ी का एकाधिकार नहीं है. इसी तरह महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू को लेकर व्याख्या पर भी किसी का एकाधिकार नहीं है.

सोवियत संघ के मामले में भारत की चुप्पी

थरूर ने लिखा कि अगर इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो भारत ने पहले भी कई बार रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए सावधानी बरती है. उन्होंने याद दिलाया कि जब सोवियत संघ ने हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया था, उस दौरान भी भारत ने खुलकर उसकी निंदा करने से परहेज किया था, क्योंकि रूस के साथ हमारे संबंध बेहद अहम थे.

खाड़ी क्षेत्र में भारत के बड़े हित

थरूर ने कहा कि आज भी भारत के सामने इसी तरह की स्थिति है. खाड़ी के अरब देशों में भारत के बहुत बड़े हित जुड़े हुए हैं. उन्होंने बताया कि इन देशों के साथ भारत का करीब 200 अरब डॉलर का सालाना व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और वहां रह रहे करीब 90 लाख भारतीयों की रोजी-रोटी दांव पर लगी है. इसलिए वास्तविकताओं को स्वीकार करना किसी के सामने झुकना नहीं है.

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अमेरिका के साथ रिश्तों पर भी संतुलन जरूरी

थरूर ने लिखा कि आज वॉशिंगटन में ऐसी सरकार है जो शायद अंतरराष्ट्रीय कानून को उतनी प्राथमिकता नहीं देती जितनी भारत चाहता है. फिर भी भारत को अपने रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित नीति अपनानी होगी. उन्होंने कहा कि हाल ही में अपने एक लेख में उन्होंने इस युद्ध को गैर-कानूनी बताया, इसके विनाशकारी परिणामों की चेतावनी दी और तुरंत युद्धविराम की अपील भी की. लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ भारत के महत्वपूर्ण रणनीतिक हितों को खतरे में डालना समझदारी नहीं होगी.

विदेश यात्राओं पर आरोप बेबुनियाद

थरूर ने अय्यर के उस आरोप को भी खारिज किया जिसमें कहा गया था कि वे प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए विदेश यात्राएं करते हैं. उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने को छोड़कर उनकी सभी विदेश यात्राएं निजी क्षमता में होती हैं. ये यात्राएं न तो सरकार की तरफ से आयोजित होती हैं और न ही सरकार उनका खर्च उठाती है.

इजरायल-फिलिस्तीन और पाकिस्तान पर पुराना रुख

थरूर ने कहा कि क्षेत्रीय मुद्दों पर उनका रुख दशकों से स्पष्ट रहा है. उन्होंने हमेशा इजरायल और फलस्तीन के बीच दो-राष्ट्र समाधान के सिद्धांत का समर्थन किया है. यही भारत की पॉलिसी भी है. साथ ही उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अक्सर ऐसा लगता है कि सेना के पास एक देश है, न कि देश के पास सेना.

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भारत शांति चाहता है, लेकिन कमजोरी नहीं

थरूर ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद उन्होंने दुनिया को साफ संदेश दिया था कि भारत बुद्ध और महात्मा गांधी की धरती है और शांति चाहता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भारत निष्क्रिय रहेगा. उन्होंने कहा कि राज्य प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत कड़ा जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा.

सबरीमाला विवाद पर भी जवाब

थरूर ने कहा कि सबरीमाला के मुद्दे पर भी अय्यर की आलोचना उन्हें थोड़ी अजीब लगी. उन्होंने कहा कि उन्होंने उस समय पार्टी की आधिकारिक लाइन का समर्थन किया था और अपने विचार विस्तार से समझाए भी थे.

गांधी-नेहरू की विरासत पर भी टिप्पणी

अय्यर की उस टिप्पणी पर जवाब देते हुए कि थरूर गांधी के समय पैदा नहीं हुए थे, उन्होंने कहा कि किसी को गांधी की गोद में खेलना जरूरी नहीं है उनकी विरासत को समझने के लिए. उन्होंने कहा कि उन्होंने गांधी और नेहरू पर विस्तार से लिखा है और उनका सम्मान गहरा और बौद्धिक है.

विदेश नीति में मतभेद स्वाभाविक

पत्र के अंत में थरूर ने कहा कि विदेश नीति के तरीकों पर मतभेद होना स्वाभाविक है. लेकिन व्यवहारिक राष्ट्रवाद को सिद्धांतहीनता समझना गलत आकलन है. उन्होंने कहा कि नैतिक विश्वास और यथार्थवादी कूटनीति का संतुलन ही भारत को दुनिया में मजबूत जगह दिला सकता है.

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