शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का दो दिन का वार्षिक शिखर सम्मेलन सोमवार से किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शुरू हुआ. इसका आयोजन संगठन की स्थापना के 25 साल पूरे होने के अवसर पर किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस सम्मेलन में शामिल होंगे. एससीओ का यह सम्मेलन दो युद्धों के साए में हो रहा है, जिसने दुनिया की अर्थव्यवस्था और तेल बाजार को बुरी तरह से प्रभावित किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बेतुके फैसलों ने भी दुनिया पर प्रभाव डाला है. ऐसे में इस सम्मेलन का महत्व और बढ़ जाता है.
बिश्केक में एससीओ सम्मेलन की थीम 'सतत शांति, विकास और समृद्धि के लिए साथ मिलकर काम करना'है. मोदी, जिनपिंग और पुतिन के अलावा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन, पाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, बेलारूस और कजाकिस्तान समेत कई देशों के नेता इसमें शामिल होंगे.उम्मीद की जा रही है कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस और आशियान के महासचिव काओ किम हर्न भी इस सम्मेलन में शामिल हों.
सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब युद्धों और अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है. ऐसे समय में यह सम्मेलन भारत-चीन जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अपने वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने और ग्लोबल साउथ के देशों से संबंध और सहयोग मजबूत करने का महत्वपूर्ण मौका साबित हो सकता है. मध्य पूर्व और यूरोप में चल रहे युद्धों को देखते हुए चीन सम्मेलन का इस्तेमाल अपने आप को एक ऐसी बड़ी शक्ति के रूप में पेश कर सकता है, जो युद्धों का शांतिपूर्ण समाधान चाहता है. इसमें चीन और अमेरिका की नीतियों में अंतर भी दिखाने की भी कोशिश होगी.
कब और क्यों बना था एससीओ
एससीओ की शुरुआत 1996 में एक सुरक्षा संगठन के रूप में हुई थी. उस समय इसे 'शंघाई फाइव' के नाम से जाना जाता था. इसमें चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल थे. इसका मुख्य उद्देश्य शीत युद्ध खत्म होने और सोवियत संघ के टूटने के बाद इन देशों के बीच सीमा विवादों को सुलझाना था.साल 2001 में 'शंघाई फाइव' का नाम बदलकर शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) कर दिया गया. इसमें उज्बेकिस्तान को भी शामिल किया गया. भारत और पाकिस्तान 2017 में इसके पूर्ण सदस्य बने. ईरान इसमें 2023 और बेलारूस 2024 में शामिल हुआ था. इसका मुख्यालय चीन की राजधानी बीजिंग में है. इनके अलावा एससीओ के 14 साझेदार देश भी हैं. इनमें सऊदी अरब, कतर, मिस्र, तुर्की, म्यांमा, श्रीलंका और कंबोडिया जैसे देश शामिल हैं.

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एससीओ के सदस्य देशों में दुनिया की करीब 43 फीसद आबादी रहती है. ये देश मिलकर दुनिया की अर्थव्यवस्था का करीब 23 फीसद हिस्सा रखते हैं. शुरुआत में एससीओ का मुख्य ध्यान सुरक्षा पर था. लेकिन अब इसने व्यापार और ग्लोबल साउथ के दूसरे मुद्दों तक विस्तार किया है.
बिश्केक सम्मेलन में कौन से मुद्दे उठ सकते हैं
एससीओ के बिश्केक सम्मेलन में रूस-यूक्रेन युद्ध के अलावा ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध और अमेरिकी टैरिफ और पाबंदियां प्रमुख मुद्दे हो सकते हैं. इनके अलावा भारत-चीन संबंध, भारत-पाकिस्तान का सीमा तनाव, व्यापार और आर्थिक सहयोग, नए परिवहन और व्यापार मार्ग और वित्तीय सहयोग पर भी चर्चा हो सकती है.
अगले महीने दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स के शिखर सम्मेलन से पहले भारत-रूस और चीन नेताओं की द्विपक्षीय बातचीत इस सम्मेलन से इतर हो सकती है. भारत-चीन संबंध भी महत्वपूर्ण मुद्दा हो सकता है. दरअसल 2020 में सीमा पर हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में काफी तनाव आ गया था. करीब पांच साल बाद पिछले साल दोनों देशों ने संबंध सुधारने की दिशा में कदम उठाए. साल 2018 के बाद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2025 में एससीओ सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीन गए थे.इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारतीय सामान पर टैरिफ नीति के बीच चीन के साथ संबंध सुधारने की भारत की कोशिश के तौर पर देखा गया था.
क्या बन पाएगा एससीओ डेवलपमेंट बैंक
एससीओ डेवलपमेंट बैंक का गठन भी इस सम्मेलन का एक मुद्दा हो सकता है.दरअसल पिछले साल चीन के तियानजिन में आयोजित सम्मेलन में एससीओ विकास बैंक बनाने पर सहमति बनी थी. उस दौरान किर्गिस्तान ने कहा था कि उसकी प्राथमिकता एससीओ विकास बैंक, एससीओ डवलेपमेंट फंड और एससीओ इनवेस्टमेंट फंड को आगे बढ़ाने की है.लेकिन अभी यह साफ नहीं हो पाया है कि हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि बिश्केक सम्मेलन में इसको लेकर समझौते की घोषणा होगी या नहीं.
एससीओ के सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं. इसलिए संगठन अक्सर अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दों पर आमराय नहीं बना पाता है. जैसे यूक्रेन युद्ध को लेकर एससीओ के अधिकांश देशों का समर्थन रूस को हासिल है. लेकिन भारत का रुख संतुलित है. भारत एक तरफ शांति की अपील करते हुए यूक्रेन से संबंध भी बनाए हुए है और रूस से तेल भी खरीदता है. इसी तरह इस साल मार्च में एससीओ ने अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध की निंदा की. संगठन का कहना था कि विवादों का समाधान बातचीत, आपसी सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर शांतिपूर्ण रूप से होना चाहिए. लेकिन भारत ने जून 2025 में ईरान पर इजरायल के हमले की निंदा करने वाले एससीओ के संयुक्त बयान का समर्थन नहीं किया.
एससीओ में भारत का क्या हित है
सम्मेलन में भारत के लिए क्या है. पीएम मोदी का एससीओ में शामिल होना यह नहीं दिखाता कि भारत चीन और रूस के साथ किसी एक गठबंधन में शामिल हो रहा है.एससीओ में भारत की प्राथमिकता सुरक्षा, संपर्क और अवसर है. यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के मुताबिक है. भारत मध्य एशिया में अपना प्रभाव और पहुंच बनाए रखना चाहता है.वहीं रूस से संबंध भी जारी रखना चाहता है और चीन के साथ भी अपने संबंधों को धीरे-धीरे सुधारना चाहता है. इसके साथ ही भारत अमेरिका से मजबूत संबंध बनाए हुए है. वह अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड में शामिल है. ऐसे में चीन और रूस के लिए एससीओ अमेरिकी प्रभाव को कम करने का एक साधन है तो भारत के लिए एससीओ कई अंतरराष्ट्रीय मंचों में से एक है.इसके जरिए भारत अपने हित साधना चाहता है.
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