इंडिया गठबंधन की रामलीला मैदान में हुई 'वोट बचाओ देश बचाओ' रैली की कामयाबी को लेकर विवाद हो रहा है. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर की प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग को लेकर हुई रैली को जहां विपक्षी गठबंधन सुपरहिट बता रहा है वहीं बीजेपी 'खाली वीडियो' के जरिए इसे फ्लॉप साबित करने में जुटी है.
रैली के एक हफ्ते पहले से इसकी तारीख एक नवंबर को लेकर बीजेपी कांग्रेस को 'सिख विरोधी' बता रही थी और व्यापारी संगठन दिवाली तक रैली टालने की मांग कर रहे थे. रैली के बाद अब बीजेपी और कांग्रेस के बीच अलग-अलग वीडियो के जरिए मनोवैज्ञानिक मुकाबला जारी है.
10 लाख लोग जुटे?
बहस का सबसे बड़ा मुद्दा भीड़ को लेकर है. रैली से एक हफ्ते पहले ही कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने दस लाख लोगों के जुटने का ऐलान किया. रामलीला मैदान के लिहाज से ये आंकड़ा दस गुना से भी ज्यादा था. ऐसे में एक नवंबर को आई भीड़ को इसी दस लाख के पैमाने से तौला गया.
रविवार को कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, वाम दलों के कार्यकर्ता सैंकड़ों की संख्या रामलीला मैदान पहुंचे. भीड़ की तादाद अच्छी खासी थी और उन्हें जोश भी नजर आ रहा था. लेकिन कुल संख्या शुरुआती दावे के दस प्रतिशत यानी एक लाख से भी कम थी. हालांकि रैली के बाद भी वेणुगोपाल ने दस लाख की भीड़ जुटने का दावा किया.
वहीं, बीजेपी की ओर से जारी किए गए वीडियो में राहुल गांधी के भाषण के दौरान रामलीला मैदान के पीछे का बड़ा हिस्सा खाली नजर आ रहा है. असल में इसकी दो बड़ी वजह रहीं. राहुल गांधी ने रैली से पहले कनॉट प्लेस से रामलीला मैदान तक करीब दो किलोमीटर के मार्च का एलान किया था. उन्होंने लोगों से मार्च में शामिल होने की अपील भी की थी. इस वजह से बड़ी संख्या में लोग उनके मार्च में शामिल होने मिंटो रोड पहुंच गए.
भीड़ इतनी थी कि खुद राहुल गांधी मार्च नहीं कर पाए और गठबंधन के बाकी बड़े नेताओं के साथ खुली बस में बैठे-बैठे ही रामलीला मैदान पहुंचे. नेता तो वीआईपी गेट से मंच तक पहुंच गए लेकिन उनके साथ चल रही भीड़ बाहर ही रह गई. इस वजह से जब विपक्ष के प्रमुख नेताओं का भाषण शुरू हुआ तो रामलीला मैदान के पीछे का बड़ा हिस्सा खाली रहा.
इसके अलावा गुरुवार और शुक्रवार को हुई बारिश के कारण रामलीला मैदान में जगह-जगह कीचड़ और पानी जमा था. कीचड़ के बीच रखी कुर्सियों पर बैठने से लोगों ने परहेज किया और कुर्सियां भी खाली पड़ी रहीं. रैली के बाद में कई कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने माना कि मार्च का असर रैली पर पड़ा. हालंकि पार्टी के एक वर्ग का मानना है मार्च से कार्यकर्ताओं में 'ऊर्जा' का संचार हुआ. मार्च की तस्वीरें सोशल मीडिया रील पर खूब वायरल भी हुईं.
बड़े नेताओं को बोलने का मौका नहीं मिला
रामलीला मैदान से भीड़ के मार्च की तरफ शिफ्ट होने की एक बड़ी वजह मंच की आधी-अधूरी रणनीति भी थी. रैली में शामिल होने के लिए लोग सुबह दस बजे से जुटने लगे थे. लेकिन मंच खामोश पड़ा रहा. बीच-बीच में देशभक्ति गाने बजते रहे. करीब एक बजे मंच से भाषण शुरू करवाया गया. वकील और सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और प्रशांत भूषण से भाषण की शुरुआत करवाई गई. इसके बाद उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों के भाषण हुए. ये वक्ता भीड़ को बांधने में नाकाम रहे.
कांग्रेस एक सांसद ने एनडीटीवी से बात करते हुए हैरानी जताई कि प्रियंका गांधी, सचिन पायलट और कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बोलने का मौका नहीं दिया गया. उनका मानना था कि अगर मंच से इन नेताओं के भाषण कराए जाते तो लोग रामलीला मैदान में जमे रहते. बहरहाल प्रियंका, पायलट, वीडी सतीशन, रेवंत रेड्डी तो मार्च में ही फंसे थे. लेकिन दीपेन्द्र हुड्डा और इमरान प्रतापगढ़ी जैसे कांग्रेस के बड़े चेहरों को भी बोलने का मौका नहीं मिला जबकि इन लोगों ने भीड़ जुटाने में भी अहम भूमिका निभाई थी. इन जैसे कांग्रेस के तमाम बड़े नेता मुख्य मंच के बगल में बने दूसरे मंच पर चुपचाप दोपहर बारह बजे से तीन बजे तक बड़े नेताओं के आने का इंतजार करते रहे.
नेहा बोरा को मिलती अहमियत से सब ठीक हुआ?
प्रमुख नेताओं के मंच पर आने से ठीक पहले वामपंथी छात्र संगठन आईसा की अध्यक्ष नेहा बोरा ने अपने भाषण से सबका ध्यान खींचा. लेकिन उन्हें कांग्रेस के कार्यक्रमों में लगातार मिल रही अहमियत कांग्रेस के पुराने और युवा कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रही.
यूथ कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने कहा, "इस रैली के लिए हम सबने दिन-रात एक की हुई थी. समझ नहीं आता कि कांग्रेस नेतृत्व लेफ्ट छात्र नेताओं का बोझ क्यों ढोता है." अब तो हमें फर्क पड़ना भी बंद हो गया है."
इससे पहले पिछले महीने नेहा बोरा को 'प्रोमोट' करने के खिलाफ एनएसयूआई के पदाधिकारियों ने अपने व्हाट्सएप ग्रुप का नाम बदल कर 'we the छोटू' रख दिया था. इसके बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस के युवा और छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं से मुलाकात की थी.
वापस रैली पर लौटते हैं. करीब डेढ़ घंटे में दो किलोमीटर का सफ़र पूरा कर तीन बजे इंडिया गठबंधन के सभी प्रमुख नेता मंच पर पहुंचे और फिर भाषणों का सिलसिला शुरू हुआ. अगले एक घंटे में दीपांकर भट्टाचार्य, एमए बेबी, तेजस्वी यादव, मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, फ़ारूख़ अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के भाषण हुए. अंत में चार बजे राहुल गांधी ने बोलना शुरू किया. अपने बीस मिनट के भाषण में राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और पीएम मोदी पर तीखे हमले किए और दावा किया कि ज्ञानेश कुमार को ना केवल पद से हटाया जाएगा बल्कि उन्हें जेल भी जाना होगा. SIR प्रक्रिया में देश भर में 13 करोड़ वोटर बाहर किए जाने को लेकर भी राहुल गांधी ने सवाल उठाए. राहुल गांधी का अंदाज आक्रमक था लेकिन भाषण में कोई नई बात नहीं थी.
प्रियंका के भाषण नहीं सुनने पर कार्यकर्ता निराश
प्रियंका गांधी का भाषण नहीं सुन पाने से उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक जिला अध्यक्ष काफी निराश नज़र आए. उनका यह भी कहना था राहुल गांधी का भाषण प्रभावशाली तो था लेकिन उन्हें और लंबा बोलना चाहिए था.
कुल मिलाकर जहां एक तरफ रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन ने एकजुटता और ताकत का प्रदर्शन किया. वहीं दूसरी तरफ बड़े दावों और रणनीतिक चूक के कारण कोई बड़ा संदेश देने में नाकाम रहे.
बहरहाल ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर साल के अंत से पहले विपक्षी गठबंधन की तरफ़ से देश के अलग-अलग हिस्सों में चार और बड़ी रैलियां आयोजित की जाएंगी. 26 नवंबर को संविधान दिवस के मौके पर दिल्ली में एक और बड़ा प्रदर्शन होगा. संसद के शीतकालीन सत्र में भी विपक्ष हमलवार रहेगा.
रामलीला मैदान की रैली से पहले विपक्ष सितंबर के पूरे महीने सड़क पर प्रदर्शन से लेकर राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर नजर आया. इंडिया गठबंधन के तेवरों से साफ़ है कि वो ज्ञानेश कुमार वाले मुद्दे को छोड़ने वाला नहीं है.
इस मुद्दे पर राहुल गांधी की आक्रमक निरंतरता और बीजेपी के जवाबी हमलों ने लोगों का ध्यान खींचा है. लेकिन राहुल गांधी के सामने चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी से जुड़े अपने आरोपों को आम लोगों को समझाने की चुनौती अभी भी बरकरार है.
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