राजस्थान के शहरी निकाय चुनावों में बीजेपी का दबदबा साफ़ है. राजस्थान के 10 बड़े नगर निगमों में से आठ में बीजेपी सत्ता में आते हुए दिख रही है. शहरी वोट बैंक बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है. ऐसे में ये संकेत मिलना की राजस्थान के शहरी मतदाताओं के रुझान में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है, इससे बीजेपी ने राहत की सांस ज़रूर ली होगी.
ये चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि ये जंतर-मंतर पर युवाओं के प्रदर्शन के बाद हुआ सबसे बड़ा चुनाव था. इस चुनाव में 18-25 साल के करीब 15 फीसदी मतदाता थे. युवाओ के इस वोट को हमेशा से गेम चंगेर माना जाता रहा है. इसके साथ ही ये चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि पहली बार पूरे राजस्थान की शहरी आबादी ने एक साथ मतदान किया. 'वन स्टेट, वन इलेक्शन' के तहत 309 शहरी निकायों में एक करोड़ 44 लाख से ज्यादा मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया.
क्या 'काकाजी' ने जितवाया चुनाव
नतीजे आने के बाद बीजेपी कार्यालय में जीत के जश्न के दौरान उत्साहित मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए एक मजबूत राजनीतिक संदेश दिया.उन्होंने कहा,''कांग्रेस वाले कहते थे कि आपके काका जी भी वन स्टेट, वन इलेक्शन नहीं करवा सकते. अब किसने सफलतापूर्वक करवा दिया? आपके काका जी ने.''
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इस चुनाव का मुख्या चेहरा रहे. राजस्थान में नेताओं का जनता के साथ जुड़ाव के लिए संबोधन का एक पुरानी परंपरा रही है, भैरों सिंह शेखावत को बाबोसा कहते थे, अशोक गेहलोत जादूगर के नाम से लोकप्रिय हैं तो वसुंधरा राजे को जनता अभी भी रानी के नाम से पुकारती है. ऐसे में मुख्यमंत्री को राजस्थान की सियासत में 'काकाजी' का दर्जा मिलता दिख रहा है, यानी परिवार का वो व्यक्ति जो परिवार की साहयता के लिए आगे आकर कमान संभालता है. इस बयान से मुख्यमंत्री ने खुद को चुनाव के केंद्र में रख कर पार्टी के भीतर 'काका जी' यानी फैसले लेने वाले व्यक्ति के तौर पर स्थापित किया है.
राजस्थान में कुल पांच करोड़ 17 लाख 32 हजार 266 मतदाता हैं. इनमें से 1 करोड़ 44 लाख 38 हजार 53 शहरी मतदाता हैं यानी राज्य के कुल मतदाताओं का 27.84 फीसद. लिहाजा बीजेपी के लिए यह अपने शहरी वोट बैंक को लेकर आत्मविश्वास जताने के लिए एक बड़ा और महत्वपूर्ण सैंपल है.

बीजेपी ने यह चुनाव मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में लड़ा. बीजेपी के लिए यह जीत बहुत बड़ी है, क्योंकि जेन जी के आंदोलन के बाद यह पहला बड़ा चुनाव था, इसमें बीजेपी विजयी हुई है.
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मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के सीधे नेतृत्व में लड़ा गया यह चुनाव और केंद्रीय पार्टी नेतृत्व की करीबी निगरानी में हुए इन चुनावों के नतीजे बताते हैं कि बीजेपी ने फिलहाल अपने शहरी वोट बैंक पर पकड़ बरकरार रखी है.
कहां कहां बनेगा बीजेपी का बोर्ड
प्रदेश के 10 नगर निगमों में से आठ में बीजेपी बोर्ड बनाएगी. जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा में बीजेपी को स्पष्ट बढ़त मिली है. अलवर में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि पाली और भरतपुर में निर्दलीयों के समर्थन से बीजेपी बोर्ड बनाने की स्थिति में है. वहीं जोधपुर में मुकाबला बेहद दिलचस्प है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों के पास 44-44 सीटें हैं. ऐसे में 10 निर्दलीय पार्षद और आरएलपी का एकमात्र पार्षद बीजेपी को बढ़त दिला सकता है, अगर बीजेपी उन्हें अपने पक्ष में लाने में कामयाब होती है.
जोधपुर में दांव पर दो दिग्गजों की प्रतिष्ठा भी है, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत. जोधपुर में कौन बाजी मारता है, यह न सिर्फ दोनों नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा बल्कि उनके संगठनात्मक कौशल और राजनीतिक रणनीति की भी परीक्षा होगी.
हाफ ईयरली एग्जाम में फर्स्ट डिवीजन से पास
शहरी विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने NDTV से कहा,''हमने इस हाफ-ईयरली एग्जाम को फर्स्ट डिवीजन से पास किया है.यह एक तरह से सेमीफाइनल था और हमारा प्रदर्शन 60 फीसदी रहा है.''
लेकिन अगर वार्डों के आंकड़ों पर करीब से नजर डालें तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखाई देती है. कांग्रेस भी बीजेपी से बहुत पीछे नहीं है. बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत भी बताती है कि यह पूरी तरह बीजेपी का एकतरफा प्रदर्शन नहीं था. कुल 10,245 वार्डों में हुए मतदान में बीजेपी ने 4,179 और कांग्रेस ने 3,613 वार्ड जीते हैं. निर्दलीय और अन्य उम्मीदवारों को 2,273 वार्डों में जीत मिली है. आम आदमी पार्टी ने भी बारां जिले में चौंकाने वाली एंट्री की है. वहां उसके 42 उम्मीदवार विजयी रहे हैं.
बीजेपी और कांग्रेस के वोटों का कम होता अंतर
वोटों के आंकड़े भी एक करीबी मुकाबले की ओर इशारा करते हैं. बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर सिर्फ 99,615 वोटों का है. 309 स्थानीय निकायों में बीजेपी को 37.35 लाख वोट, कांग्रेस को 36.35 लाख वोट मिले, जबकि निर्दलीयों को 29 लाख से ज्यादा वोट मिले हैं. इसका मतलब है कि बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का अंतर करीब 0.94 फीसदी है यानी एक फीसदी से भी कम.

साल 2023 के विधानसभा चुनाव की तुलना में इस चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर 2.16 फीसदी से घटकर एक फीसद से भी कम रह गया है.
2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर भी 99,615 वोट का था, लेकिन उस समय यह अंतर करीब 2.16 फीसदी था.
यह संकेत देता है कि दोनों प्रमुख दलों के बीच वोट शेयर का अंतर कम हो रहा है. इसके साथ ही निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़ी संख्या में वोट काट रहे हैं.
वसुंधरा राजे सरकार और अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए हुए पिछले तीन स्थानीय निकाय चुनाव की तुलना में यह पहली बार है जब वोट शेयर के लिहाज से बीजेपी और कांग्रेस के बीच इतनी करीबी टक्कर देखने को मिल रही है.
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने NDTV से कहा,''बीजेपी को जश्न मनाने दीजिए. परिसीमन बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया था. हम एक हजार से ज्यादा वार्ड और आसानी से जीत सकते थे. अब पंचायत चुनाव भी लोगों को असली तस्वीर दिखा देंगे.''
शहरी निकाय चुनावों के नतीजे चाहे जितने महत्वपूर्ण हों, राजस्थान की करीब 70 फीसदी आबादी अगले चरण में पंचायत चुनावों के जरिए अपना जनादेश देगी यानी असली अग्निपरीक्षा अब ग्रामीण राजस्थान में होगी.
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