राजस्थान हाईकोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण से अहम फैसला सुनाते हुए एयरफोर्स के स्क्वाड्रन लीडर दीपक सिंधु का समय से पहले किए गए ट्रांसफर को रद्द कर दिया. जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने आदेश में स्पष्ट किया कि सशस्त्र बलों में ट्रांसफर सामान्य प्रक्रिया जरूर है, लेकिन इसे मनमाने ढंग से लागू नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब तय नीति, न्यूनतम कार्यकाल और मानवीय परिस्थितियों की अनदेखी हो. कोर्ट ने महाभारत के श्लोक का जिक्र भी किया.
अनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा च परमं बलम्।
आत्मज्ञानं परं ज्ञानं न सत्याद् विद्यते परम्॥
अर्थात- दया (करुणा) करना ही सबसे बड़ा धर्म है. क्षमा ही सबसे बड़ी शक्ति है. आत्मज्ञान ही सर्वोच्च ज्ञान है. और सत्य से बढ़कर इस संसार में कुछ भी नहीं है.
पिछले साल जोधपुर में जॉइन किया था
स्क्वाड्रन लीडर दीपक सिंधु ने 8 मार्च 2025 को जोधपुर स्थित 32 विंग में लीगल ऑफिसर के रूप में जॉइन किया था, इससे पहले वे असम के जोरहाट में सेवाएं दे चुके थे, लेकिन 27 फरवरी 2026 को उन्हें एक साल से भी कम समय में फिर से नॉर्थ-ईस्ट, तेजपुर एयरफोर्स स्टेशन ट्रांसफर कर दिया गया. इसके विरोध में दीपक सिंधु हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी.
नियम के खिलाफ ट्रांसफर बताया
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास बालिया और अधिवक्ता कैलाश जांगिड़ ने कोर्ट को बताया कि यह तबादला वायुसेना की तय नीति के खिलाफ है, जिसमें सामान्यतः 2 से 4 साल का कार्यकाल और न्यूनतम 3 साल की स्थिरता का प्रावधान है. साथ ही अधिकारी के परिवार की गंभीर मेडिकल परिस्थितियों का भी हवाला दिया गया. पिता की किडनी सर्जरी हो चुकी है, और मां 50 प्रतिशत बर्न सर्वाइवर हैं, जिनका इलाज अंबाला और चंडीगढ़ में चल रहा है.
सॉलिसिटर जनरल के तर्क को किया खारिज
भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल भारत व्यास ने तर्क दिया कि संगठनात्मक आवश्यकताएं व्यक्तिगत कारणों से ऊपर होती है, और तेजपुर में अधिकारियों की कमी के चलते यह ट्रांसफर किया गया. हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सरकार कोई ठोस डेटा पेश नहीं कर सकी, जिससे इस प्रशासनिक आवश्यकता को सही ठहराया जा सके.
17 मार्च को अपील को खारिज कर दिया गया था
कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा 2 मार्च को की गई अपील को 17 मार्च को बिना ठोस कारण बताए औपचारिक रूप से खारिज कर दिया गया, जो प्रशासनिक हठधर्मिता का उदाहरण है. अपने फैसले में जस्टिस फरजंद अली ने भारतीय न्याय परंपरा का उल्लेख करते हुए महाभारत के शांतिपर्व के एक श्लोक का भी संदर्भ दिया. न्याय में संवेदनशीलता और विवेक की आवश्यकता पर जोर दिया.
पूरे मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने 27 फरवरी 2026 के ट्रांसफर आदेश को रद्द कर दिया. हालांकि, यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में वास्तविक प्रशासनिक आवश्यकता हो, तो नियमों, नीति और संबंधित अधिकारी की परिस्थितियों का समुचित मूल्यांकन कर नया आदेश पारित किया जा सकता है.
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