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पोखरण एनीवर्सरी: परमाणु परीक्षण के बावजूद भारत की कूटनीति ने कैसे खुद को ईरान जैसे हालात से बचाया?

परमाणु परीक्षणों के साथ-साथ उसके बाद की घटनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं. केवल परमाणु क्षमता से ही भारत अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सका. इसके लिए उच्च कोटि की निरंतर कूटनीति भी काम आयी.

पोखरण एनीवर्सरी: परमाणु परीक्षण के बावजूद भारत की कूटनीति ने कैसे खुद को ईरान जैसे हालात से बचाया?
  • भारत ने 11 मई 1998 को पोखरण में अंडरग्राउंड परमाणु परीक्षण करके खुद को परमाणु हथियार संपन्न देश घोषित किया था
  • 1974 में भारत ने पहला शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट किया था जिसे 'द लाफिंग बुद्धा' नाम दिया गया था
  • 1998 के परीक्षणों के बाद भारत पर प्रतिबंध लगे लेकिन उसने अपने परमाणु और रक्षा कार्यक्रम को निरंतर विकसित किया
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नई दिल्ली:

11 मई, 1998 को, राजस्थान के थार रेगिस्तान की भीषण गर्मी में, भारत ने एक ऐसा रणनीतिक कदम उठाया, जिसने वैश्विक राजनीति में उसकी स्थिति को हमेशा के लिए बदल दिया. पोखरण में, अंडरग्राउंड न्यूक्लियर डिवाइस का विस्फोट किया गया, जिसे परीक्षण का शक्ति सीरीज के नाम से जाना जाता है. इस कदम के साथ, भारत ने खुद को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र घोषित कर दिया, दशकों से चली आ रही जानबूझकर अस्पष्टता से बाहर निकलकर एक खुले तौर पर परमाणु भविष्य की ओर कदम बढ़ाया. इस विशाल और निर्णायक कदम से, जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी, भारत ने अपनी संप्रभुता को सुरक्षित कर लिया और यह सुनिश्चित कर दिया कि अब से कोई भी वैश्विक शक्ति भारत को दबाव में लाकर झुका नहीं सकती.

यह क्षण ऐतिहासिक था, लेकिन यह अचानक नहीं हुआ. इसकी जड़ें गहरी थीं, जो लगभग एक चौथाई सदी पहले इसी रेगिस्तान की रेत तक फैली हुई थीं. 18 मई, 1974 को, बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर, भारत ने आधिकारिक तौर पर 'शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट' का परीक्षण किया, जिसका कोड नाम 'द लाफिंग बुद्धा' था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसके गैर-सैन्य इस्तेमाल की बात कही था, लेकिन दुनिया को दिया गया संदेश स्पष्ट था. भारत ने परमाणु विस्फोटक तकनीक में महारत हासिल कर ली थी.

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उस एक परीक्षण ने प्रतिबंधों, टेक्नोलॉजी डिनाइल रिलीम और डिप्लोमेटिक आइसोलेशन के एक लंबे युग की शुरुआत कर दी. भारत को परमाणु शक्ति के मामले में हाशिए पर डाल दिया गया, एडवांस इक्विपमेंट से वंचित कर दिया गया, परमाणु सहयोग ठप कर दिया गया, और भारत को परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) द्वारा नियंत्रित वैश्विक परमाणु व्यवस्था से पूरी तरह से बाहर कर दिया गया, जिसे भारत ने भेदभावपूर्ण बताकर अस्वीकार कर दिया था. सालो तक, देश ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का दावा करने के लिए भारी आर्थिक और तकनीकी कीमत चुकाई.

फिर भी, इन्हीं बाधाओं ने भारत की वैज्ञानिक और रणनीतिक यात्रा को आकार दिया. अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन से कटे होने के कारण, भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के पास स्वदेशी इनोवेशन के अलावा कोई विकल्प नहीं था. दशकों के दौरान परमाणु ऊर्जा, मिसाइलों, अंतरिक्ष और उन्नत सामग्रियों को शामिल करते हुए एक विशाल टेक्निकल इकोसिस्टम का चुपचाप निर्माण हुआ.

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उस यात्रा का चरमोत्कर्ष मई 1998 में आया. शक्ति परमाणु परीक्षण प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में किए गए. परीक्षणों के तुरंत बाद विश्व नेताओं को लिखे एक पत्र में, वाजपेयी ने घोषणा की कि भारत अब एक परमाणु हथियार संपन्न देश है, और इस बात पर जोर दिया कि यह निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं और बिगड़ते क्षेत्रीय वातावरण के कारण लिया गया है. उन्होंने संयम और जिम्मेदार व्यवहार के प्रति भारत की निरंतर प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया.

इसका ग्लोबल रिस्पांस त्वरित और दंडात्मक था. अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने मई 1998 में भारत द्वारा किए गए परमाणु परीक्षणों की संभावित प्रतिक्रिया के बारे में प्रसिद्ध रूप से कहा था, "हम उन पर टूट पड़ेंगे." प्रतिबंध फिर से लगाए गए, वित्तीय सहायता में कटौती की गई, और भारत के अलगाव की भविष्यवाणी करने वाली आवाजें और तेज हो गईं, लेकिन कुछ मौलिक रूप से बदल गया था. भारत एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया था जहां से वापसी संभव नहीं थी. सामरिक प्रतिरोध, जो कभी केवल अप्रत्यक्ष था, अब सामने आ गया था.

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यहीं पर इतिहास पश्चिम एशिया की वर्तमान घटनाओं के साथ एक विरोधाभास पेश करता है. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दुनिया भर में तनाव बढ़ता जा रहा है, परमाणु फैसिलिटी पर और अधिक सैन्य हमले और बंकर-रोधी बमों से हमले की धमकियां दी जा रही हैं, साथ ही समृद्ध यूरेनियम सौंपने की भी आशंका है. ऐसे में कई भारतीय विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि यदि भारत ने 1974 और 1998 में कड़े फैसले न लिए होते, तो उसे भी ईरान जैसे ही दबाव का सामना करना पड़ सकता था. इराक और लीबिया का भी ऐसा ही या इससे भी बुरा हाल देखा जा चुका है. उत्तर कोरिया भी इस तरह की कठोर सैन्य कार्रवाई से बच गया है, शायद इसलिए क्योंकि उसने परमाणु हथियार का विस्फोट किया था.

परिणाम लगभग वही होते- संदेह, प्रतिबंध, तोड़फोड़ और अंततः हमले की धमकी. एक पल के लिए कल्पना कीजिए कि यदि भारत हमेशा असुरक्षित बना रहता, उसकी परमाणु सुविधाएं बाहरी हस्तक्षेप के लिए खुली रहतीं. भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC), इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) या अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान परमाणु प्रसार को रोकने के बहाने निशाना बन जाते. विशेषज्ञों का तर्क है कि 1998 में भारत द्वारा रणनीतिक क्षमता का प्रदर्शन करने से वह परिदृश्य निर्णायक रूप से समाप्त हो गया था.
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परमाणु परीक्षणों के साथ-साथ उसके बाद की घटनाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण थीं. केवल परमाणु क्षमता से ही भारत अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सका. इसके लिए उच्च कोटि की निरंतर कूटनीति की आवश्यकता थी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यह बात सबसे स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हुई, जब भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका ने ऐतिहासिक भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौते पर बातचीत की.

यह वार्ता लंबी, राजनीतिक रूप से तनावपूर्ण और कूटनीतिक रूप से जटिल थी. इसका समापन तथाकथित 123 समझौते पर हस्ताक्षर के साथ हुआ, जिसका नाम अमेरिकी कानून की संबंधित धारा के नाम पर रखा गया है, और इसके परिणामस्वरूप 2008 में भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनपीटी) से छूट मिल गई. 1974 के बाद पहली बार, भारत को परमाणु हथियार रहित राज्य के रूप में एनपीटी में शामिल हुए बिना वैश्विक परमाणु व्यापार में शामिल होने की अनुमति मिली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शांति अधिनियम के तहत अब पश्चिमी परमाणु ऊर्जा कंपनियों के लिए भारत में परमाणु संयंत्र स्थापित करने के द्वार खुल रहे हैं.

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बार-बार इस बात पर जोर दिया था कि यह समझौता भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता देता है, जिसका परमाणु अप्रसार का रिकॉर्ड बेदाग है. उन्होंने तर्क दिया कि इससे भारत परमाणु शक्ति के मुख्यधारा में वापस आ गया, साथ ही उसके रणनीतिक कार्यक्रम की पूरी तरह से सुरक्षा भी सुनिश्चित हुई. यह समझौता केवल ईंधन और रिएक्टरों के बारे में नहीं था, बल्कि वैधता, विश्वास और स्वीकृति के बारे में भी था.

भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच विकसित हो रहे संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण थे. शीत युद्ध के दौरान अलगाव और आपसी संदेह से उबरते हुए, दोनों लोकतंत्र रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़े. परमाणु सुलह एक व्यापक कन्वर्जेंस की आधारशिला बन गई, जो अब रक्षा, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और भू-राजनीति तक फैला हुआ है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि स्वदेशी क्षमताओं पर विश्वास भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति का आधार है. अपने कई भाषणों में मोदी ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत की ताकत तकनीकी क्षमता और कूटनीतिक सक्रियता दोनों में निहित है.

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विडंबना यह है कि प्रौद्योगिकी प्रतिबंध लगाने वाली जिन व्यवस्थाओं ने भारत की प्रगति को रोकने का प्रयास किया, उन्होंने अंततः इसे और तेज कर दिया. उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकी तक पहुंच से वंचित होने के बावजूद, भारत ने अपने तीन चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया और जटिल ब्रीडर रिएक्टर प्रौद्योगिकी में महारत हासिल की, जिसे विकसित करने में कई उन्नत देशों को भी कठिनाई हुई. फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों का विकास भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा दृष्टिकोण का केंद्र बन गया, विशेष रूप से अपने विशाल थोरियम भंडार का उपयोग करने के लिए.

अंतरिक्ष क्षेत्र में, क्रायोजेनिक इंजन प्रौद्योगिकी से वंचित होने के कारण भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो को अपना स्वयं का इंजन विकसित करना पड़ा. इसका परिणाम आज विश्वसनीय हेवी लिफ्ट लॉन्च वाहनों में दिखाई देता है जो वैश्विक लागत के मुकाबले एक छोटे हिस्से पर उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करते हैं. मिसाइलों के क्षेत्र में, प्रतिबंधों ने भारत को अग्नि सीरीज विकसित करने से नहीं रोका, जिसमें लंबी दूरी की प्रणालियां भी शामिल हैं, जो विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता की रीढ़ हैं. इसमें 8 मई, 2026 को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेड री-एंट्री व्हीकल (एमआईआरवी) सिस्टम से लैस एडवांस्ड अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण भी शामिल है. इस मिसाइल का परीक्षण कई पेलोड के साथ किया गया, जिसका लक्ष्य हिंद महासागर क्षेत्र के विशाल भौगोलिक क्षेत्र में फैले विभिन्न टारगेट पर था. आज अमेरिका को छोड़कर भारत दुनिया के अधिकांश हिस्से को निशाना बना सकता है.

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इतिहास के इस घटनाक्रम से तकनीकी कूटनीति का एक सशक्त सबक मिलता है. केवल विज्ञान ही पर्याप्त नहीं था, केवल कूटनीति भी काम नहीं आती. वैज्ञानिक दृढ़ संकल्प, राजनीतिक इच्छाशक्ति और धैर्यपूर्ण बातचीत के मेल ने ही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा की.

पोखरण की वर्षगांठ पर, इन विकल्पों की प्रासंगिकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है. जब वैश्विक शक्तियां अन्यत्र रेड लाइन और सैन्य विकल्पों पर बहस कर रही हैं, तब भारत संयोग से नहीं, बल्कि दशकों से लिए गए सचेत निर्णयों के कारण सुरक्षित खड़ा है. भारत अपने उन परमाणु वैज्ञानिकों का ऋणी है जिन्होंने एकांत में रहकर काम किया, उन राजनयिकों का जिन्होंने वैश्विक राजधानियों में कठिन संघर्षों का सामना किया, और उन प्रधानमंत्रियों का जिन्होंने विवादास्पद निर्णयों के राजनीतिक जोखिम उठाए.

यदि भारत ने सुरक्षा को टाल दिया होता, संकोच किया होता, या इसे किसी और को सौंप दिया होता, तो इतिहास शायद इतना कठोर प्रतिशोध लेता. इसके उलट, अपनी क्षमता और फिर जिम्मेदारी का प्रदर्शन करके, भारत ने यह सुनिश्चित किया कि ईरान जैसे अन्य देशों में घटित हो रहा भाग्य भारत के साथ न हो.

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