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सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता: सबरीमाला मामले पर सुप्रीम कोर्ट 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट के लिए सबसे मुश्किल काम यह हो सकता है कि वह कैसे यह घोषित करे कि लाखों लोगों की मान्यता गलत या त्रुटिपूर्ण है. इसी तरह, जस्टिस एम एम सुंदरेश ने पूछा कि क्या कोर्ट लाखों लोगों के प्रतिनिधित्व को सुने बिना ऐसे सवालों पर फैसला कर सकते हैं?

सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता: सबरीमाला मामले पर सुप्रीम कोर्ट 
सबरीमाला मंदिर में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई
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  • SC ने सबरीमाला मामले में कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म की मूल पहचान को खोखला नहीं किया जा सकता
  • कोर्ट ने माना कि लाखों लोगों की धार्मिक मान्यताओं को गलत या त्रुटिपूर्ण घोषित करना कठिन कार्य है
  • कोर्ट ने कहा कि धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार संविधान द्वारा सुरक्षित है
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नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले को लेकर एक बड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा है कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता है. साथ ही कोर्ट ने कहा कि लाखों लोगों की मान्यताओं को  त्रुटिपूर्ण घोषित करना अदालत के लिए मुश्किल काम है. CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ की ओर से सबरीमाला रेफरेंस मामले की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणी की है. पीठ के समक्ष सबरीमाला मामले से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों पर सुनवाई चल रही है, जिसमें धर्म की स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन को लेकर बहस चल रही है.

बुधवार को सुनवाई में धार्मिक मामलों में जनहित याचिका की मेंटेनेबिलिटी पर दलीलों का जवाब देते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट के लिए सबसे मुश्किल काम यह हो सकता है कि वह कैसे यह घोषित करे कि लाखों लोगों की मान्यता गलत या त्रुटिपूर्ण है. इसी तरह, जस्टिस एम एम सुंदरेश ने पूछा कि क्या कोर्ट लाखों लोगों के प्रतिनिधित्व को सुने बिना ऐसे सवालों पर फैसला कर सकते हैं?

जस्टिस BV नागरत्ना ने भी ऐसी ही चिंता जताई और कहा कि ऐसी जनहित याचिका पर तब ध्यान नहीं देना चाहिए जब याचिका सिर्फ़ एक दखल देने वाला हो. उन्होंने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर किसी धर्म को उसके मूल से नहीं हटाया जा सकता. ⁠जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हम समाजिक कल्याण या सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते. पीठ के समक्ष त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील  अभिषेक मनु सिंघवी ने संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) और अनुच्छेद 26(बी) के बीच संबंध को समझाते हुए कहा कि दोनों को संतुलित तरीके से पढ़ा जाना चाहिए.

अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है. वहीं अनुच्छेद 25(2)(बी) सरकार को सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाने और सभी वर्गों को धार्मिक स्थलों में प्रवेश की अनुमति देने का अधिकार देता है. सभी हिंदू वर्ग मंदिरों में प्रवेश की मांग कर सकते हैं, लेकिन किसी धार्मिक संस्था को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने अंदरूनी धार्मिक रीति रिवाजों को कैसे संचालित करें. कानून बनाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि धर्म की मूल पहचान को नुकसान न पहुंचे. 

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि क्या इसका मतलब यह है कि धर्म की जरूरी प्रथाओं को कानून के जरिए नहीं बदला जा सकता. इस पर सिंघवी ने कहा कि अदालत को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन सी धार्मिक प्रथा जरूरी है और कौन सी नहीं. वहीं जस्टिस एमएम सुन्दरेश ने यह सवाल उठाया कि अनुच्छेद 25(2)(बी) में सामाजिक सुधार शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया है. इस पर सिंघवी ने कहा कि कुछ सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए यह जरूरी था और ऐसे कानूनों को सामाजिक सुधार माना जा सकता है. सुनवाई गुरुवार  को भी जारी रहेगी. 

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