- माओवादी भूपति ने 4 दशक बाद 14 अक्टूबर 2025 को गढ़चिरोली में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया
- भूपति ने बताया कि शांति वार्ता और सरकार की इच्छाशक्ति के कारण हिंसा छोड़कर राजनीति में आने का फैसला किया
- माओवादी आंदोलन में कई कानूनों का विरोध करना उनकी गलती थी, जिससे स्थानीय संघर्षों का रास्ता बंद हुआ
एक समय के मोस्ट वांटेट माओवादी मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति ने करीब चार दशक तक हथियारों को हाथों में थामे रखा. लेकिन साथियों को आंखों के सामने मरता देख 14 अक्टूबर 2025 को भूपति ने हथियार हाथों से छोड़ मुख्यधारा में लौटने का ऐतिहासिक फैसला किया. भूपति ने गढ़चिरोली में 60 माओवादी कैडरों और लेटेस्ट हथियारों के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने सरेंडर किया था. इसके बाद करीब 600 कैडर ने जंगलों से बाहर आकर हथियार डाल दिए और देश की मुख्यधारा में शामिल होने की राह चुनी. NDTV से खास बातचीत में भूपति ने बताया कि जंगलों में जिंदगी कैसी थी? क्यों उन्होंने चार दशक बाद हथियार छोड़ मुख्यधारा से जुड़ने का फैसला किया...?
सोनू, अभय, भूपति... आपके कितने नाम हैं क्या आप भी जानते हैं?
बहुत सारे नाम हैं, क्योंकि मुझे साहित्य में रुचि रहता है. मैं कहानियां, कविता, उपन्यास लिखता हूं. वैसे बता दूं कि गढ़चिरौली में मेरा नाम भूपति है. लेकिन साल 2000 के बाद से मेरा नाम सोनू है.
क्या छद्मवेष के लिए इतने नाम जरूरी थे?
हां, ये जरूरी होता है, क्योंकि हमारी पार्टी भूमिगत है. नाम गुप्त रखना पड़ता है. हम अलग नाम से रहते हैं. अलग नाम से काम करते हैं. दरअसल, अगर आपकी पहचान उजागर हो गए, तो काम करना मुश्किल हो जाता है, इसलिए कई नाम रखते हैं.
आपने पिछले साल आत्मसमर्पण किया, क्या यह सोच पहले से थी?
ऐसा कुछ सोचा नहीं था. लेकिन नवंबर 2024 में शांति वार्ता में जाने के लिए पार्टी में चर्चा शुरू हुई थी. चिदंबरम के समय हिंसा छोड़ने की बात शुरू की गई थी. हालांकि, मोदी सरकार ने स्पष्ट रुख के साथ कहा कि हिंसा छोड़नी पड़ेगा. सरकार के साथ शांति वार्ता में जाना है, तो हिंसा नहीं कर सकते. इसलिए तरह सरेंडर की ओर हमारे कदम बढ़े.

दो वर्ष पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि माओवाद का जंगलों से सफाया होगा. उस इच्छाशक्ति को आप जिम्मेदार मानते हैं कि जिसके चलते आपको ये फैसला लेना पड़ा?
सरकार की इच्छाशक्ति बहुत मायने रखती है. सरकार से ऊपर न पावर या बंदूक कुछ भी नहीं है. हम ये बात जानते थे.
माओवाद का मूल विचार कहता है कि शक्ति बंदूक की नली से बहती है, ये बात कितना सही है?
मेरा मानना है कि राजनीति के बिना कोई शक्ति नहीं. बंदूक हो या पावर... उसे राजनीति के अधीन ही रहना पड़ता है. इच्छाशक्ति से ही सारा काम चलता है. इच्छाशक्ति बदली, तो परिस्थितियों में बदलाव आया है. आज की परिस्थिति में हम बंदूक के साथ काम नहीं कर सकते. हमें अब राजनीति में रहकर काम करना पड़ेगा.
आपकी पत्नी तारक्का ने पिछले वर्ष के पहले दिन आत्मसमर्पण किया था. क्या वो भी एक वजह थी? क्या उन्होंने आपको पूछा था और क्या आपने उनसे परामर्श किया था आत्मसमर्पण से पहले?
पार्टी में आत्मसमर्पण के बारे में नहीं बताते हैं. खुद ये लोग भी नहीं सोचते हैं. तारक्का इतनी वरिष्ठ कॉमरेड है. उसने भी आत्मसमर्पण के बारे में नहीं सोचा था. लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं. केवल तारक्का नहीं, बहुत सारे कॉमरेड हैं, जो बीमारियों से जूझ रहे थे. ऐसी स्थिति में हम लोग उनको बचाएं कैसे? सच में बहुत असहाय थे. इन्हीं परिस्थितियों में हमने यह निर्णय लिया.
उसी समय दूसरी घटनाएं भी हो रही थीं, जैसे-PESA कानून आया, वन अधिकार अधिनियम आया... इन्हें कैसे देखते हैं?
हम मीडिया के जरिए से और एक बार मैं केंद्र सरकार और कार्यपालिका से अपील करना चाहता हूं कि तुरंत उसको अमल में लाइए. क्योंकि PESA अभी भी अमल में नहीं आ रहा. वन अधिकार अधिनियम भी अमल में नहीं आ रहा है. अधिनियम बन गया है, लेकिन लागू नहीं हो रहा. इस वजह से परेशान लोग हैं. इसलिए आदिवासी के अनुसूचित क्षेत्रों के हिसाब से PESA गढ़चिरौली के हिसाब से आया है, बाकी प्रदेशों में नहीं आया है. कुछ हद तक हम भी कारण हैं. मैं गढ़चिरौली में था, मेरा कार्यक्षेत्र गढ़चिरौली था, मैंने विरोध नहीं किया. हमने लागू करवाया. वन अधिकार अधिनियम भी लागू कराने की सरकार से मांग की और लागू करवाया है.
तो मानते हैं कि इन कानूनों का विरोध किया, यह माओवादी आंदोलन की कहीं न कहीं गलती हो गई?
हां. यह एक ही कानून नहीं, बहुत सारे विषयों में सरकार के जो कानून हैं, जो स्थानीय संघर्ष हैं, जनता को संगठित करने का जो रास्ता होता है, उसको हमने त्याग दिया था. यह बड़ा कारण है. हमारे इस परिस्थिति में पहुंचने के लिए 3 कारण हैं.
1- जो मैंने बताया कि ये एक गुप्त पार्टी, भूमिगत है.
2- सैन्य रूप से अपनी शक्ति का हमने अधिक आकलन किया.
3- राज्य की शक्ति का गलत आकलन किया.
आपके मुख्यधारा में आने का भारी विरोध भी हुआ. आपको गद्दार भी कहा गया. वे कौन लोग थे?
ये कौन लोग थे, बताना मुश्किल है, क्योंकि मेरे सामने किसी ने 'तुम गद्दार हो' ऐसा नहीं बोला. अगर बोला है, तो मेरे साथ प्रभाकर था- उसने बोला है. क्योंकि हम सितंबर 12 तक साथ में थे. बाहर आने के समय वह मेरे पीछे बहुत प्रचार शुरू किया था. मेरा निर्णय सही था. मेरे पीछे जितने लोग आए, उससे यही साबित हो रहा है कि हमारा निर्णय कितना सही है.
क्या आपको लगता है कि वे सब किसी एक प्रतीकात्मक व्यक्ति के बाहर आने का इंतजार कर रहे थे?
बहुत महत्वपूर्ण सवाल है. अब मुझे गालियां उनसे खाना पड़ रहा है. वो पूछ रहे हैं- जंगल से बाहर आने का फैसला 2 साल पहले क्यों नहीं लिया?
बाहर आने का फैसला पहले क्यों नहीं लिया?
आज जो 'गद्दार' बोल रहे, उन्हें इन लोगों को सुनकर शर्म आना चाहिए.
आपके शांति प्रयासों से आपकी जान को कैडर के भीतर से खतरा था?
अंदर जब था, तो कोई चिंता नहीं थी. बाहर आने के बाद जगन और अभय के नाम से बयान आया था कि पीएलजीए को आदेश दिए थे, मेरे खिलाफ हमला करके मेरे हथियार लेने के लिए.
आपके खिलाफ कैडर को भड़काने में हिड़मा, प्रभाकर की भूमिका भी रही?
हिड़मा मेरा करीबी था. उसका नाम नहीं... प्रभाकर ने यकीनन ऐसा किया होगा. उसके विचार अलग हैं. मेरे बाहर निकलने पर उसने हमले की कोशिश की.
सरेंडर के पहले क्या बात की थी? महाराष्ट्र में क्यों आत्मसमर्पण किया?
मैंने किसी से बात नहीं की, सिर्फ एक बयान दिया था. मेरा कार्यक्षेत्र गढ़चिरौली था, इसलिए यहां पत्र दिया और आत्मसमर्पण कर दिया.
जब आपने आत्मसमर्पण किया, तो सीएम फडणवीस से क्या बात हुई, आप दोनों हंस रहे थे?
हंसना, मेरी एक आदत है. मैं कैसी भी स्थिति में हंसता हूं. उन्होंने पूछा—कैसे हैं दादा? मैं बोला- अच्छा हूं.
सीएम फडणवीस ने आपको संविधान की प्रति भी दी. क्या पढ़ने का समय मिला?
संविधान पर मैं 2016 में कक्षाएं दिया करता था. मैं दंडकारण्य में शिक्षक था.
जंगलों में अब कितने कैडर बचे हैं?
अब जंगलों में 150–200 हो सकते हैं, वे भी लगातार घटते जा रहे हैं. आज भी बहुत लोग आ रहे. मुझसे कहा गया कि ऊषा के लिए संदेश भेजो. मैंने वीडियो मैसेज दिया. इसके दो–तीन दिन बाद ऊषा बाहर आ गई.
अब कितने लोग बाकी हैं? क्या देवू जी महासचिव हैं?
हालत खराब है, देवूजी बचा है. झारखंड में भी कोई है.
शहरी माओवाद के बारे में आपकी क्या राय है?
शहरी या ग्रामीण नहीं, माओवाद एक ही है. परिस्थितियों के हिसाब से काम करता है, वही माओवाद है.
क्या माओवादियों को पीयूसीएल जैसे संगठन सुरक्षा देते हैं?
आपातकाल के बाद मानवाधिकार संगठन काम कर रहे हैं. तेलंगाना में कुछ लोग सशस्त्र क्रांति का झंडा उठा रहे, उनसे हमारा कोई लेना-देना नहीं है.
साल 2013 में झीरम घाटी हमले के बारे में कुछ बताइए?
जानबूझकर नहीं किया. जानबूझकर घात नहीं था. हर ग्रीष्म में हम टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन (TCOC) लेते हैं. उन्होंने दूसरी तरफ से जाने का था. अचानक रास्ता बदला. क्यों बदला पता नहीं. नेताओं में महेंद्र कर्मा, शुक्ला जी हैं, ऐसी जानकारी नहीं थी. हालांकि, इतने लोगों की जान गई, ऐसा नहीं होना चाहिए था.
अंदर से राजनीतिक संकेत?
कुछ नहीं. घात कैसे होता है मैं जानता हूं. बाद में घायल हुए... महेंद्र कर्मा को टारगेट किया. कर्मा तो टारगेट था ही, लेकिन बाकी लोग मरने नहीं चाहिए थे.
साल 2010 चिंतलनार हमला, उसकी रणनीति किसने बनाई?
हम टीसीओसी में पूरी तैयारी के साथ रहते हैं. नई टुकड़ी का गठन किया थे. उन्हीं लोगों ने इस हमले को अंजाम दिया था.
किशन जी आपके बड़े भाई थे, शुरुआत में...?
जो बुद्धिजीवी रहते हैं, वो इस ओर आते ही हैं.
आपकी जिंदगी में सबसे निराशा का पल क्या रहा?
कोई नहीं... 25 साल में जो माओवादी नहीं बनते, वो मूर्ख... बाद में अलग लगता है.
एक माओवादी के लिए जंगलों का जीवन कैसा होता है?
मैं 71 साल का बुजुर्ग हूं, लेकिन शारीरिक रूप से बिल्कुल बेहतर हूं. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमने कैसा जीवन जिया है.
कैडर में महिलाओं के शोषण की भी बातें सामने आती रहती हैं, इनमें कितनी सच्चाई है?
आप महिलाओं से बात कीजिए. कोई भी यह बात नहीं मानेगी. ये सब अफवाह है.
आपको अत्याधुनिक हथियार कैसे मिले?
हमने पुलिस से लूटे थे. नयागढ़, कोरापुट में 300 राइफल लूटी थीं.
क्या माओवादियों को विदेशी सहायता भी मिलती है?
नहीं कोई विदेशी सहायता नहीं मिलती है, अगर ऐसा होता, तो मैं यहां नहीं बैठा होता.
कहा जाता है कि कुछ माओवादी नेता अपने बच्चों को बाहर पढ़ाते हैं?
कोई बाहर नहीं जाते. कोई बाहर नहीं पढ़ते. हम लोग वैसे ही कर लेते हैं.
आपने ‘रागो' उपन्यास लिखा, आज आदिवासी महिलाएं ट्रक चलाती हैं?
एक समय महिलाओं को केरवे बोलते थे, ये हमारी पार्टी का श्रेय है. महिलाओं की स्थिति अब पहले से कहीं बेहतर है.
आदिवासी युवा तकनीक सीख रहे हैं, गढ़चिरौली में मोबाइल टावर भी बढ़े हैं.
इसका स्वागत करना चाहिए, आदिवासी प्रोत्साहित हो रहे हैं. टेक्नोलॉजी को रोकना मूर्खता है. भाप इंजन को कौन रोक सका.
आपने कहा जाति सबसे हिंसक हथियार है, आज शहरों में लोग साथ रहते, खाते-पीते हैं आपको क्या उम्मीद?
शादी के समय लोग जाति पूछते हैं. हालांकि, अंतर जातीय विवाह बढ़ रहे हैं. ऐसे में लगता है कि बदलाव आएगा.
आप अपने भविष्य के बारे में क्या कहेंगे, राजनीति करेंगे?
राजनीति छोड़ी कब थी? लोगों के बीच जाना है. संविधान हाथ में दिया है, उसे बताना है. सब साथ में आएंगे तो चुनाव लड़ने के बारे में भी सोचेंगे.
जंगल से बाहर आकर समय कैसा बीत रहा है, खाली समय में क्या करते हैं?
यहां पुलिस वाले साथ में रहते हैं, बास्केटबॉल मैदान दिया है. यहां खेलते हैं, सब अच्छा है. बाहर आकर जनता के बीच रहने पर पहले अजीब-सा लगता है. अब इससे बाहर आना है.
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