- सरकार विशेष सत्र बुलाने पर विचार कर रही है, लेकिन विधेयकों के लिए दो तिहाई बहुमत पर आश्वस्त होना जरूरी है
- संसद का मॉनसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित है, पर तकनीकी रूप से अब भी चल रहा है
- भाजपा को हाल में कई सांसदों का समर्थन मिला है, पर डीएमके और एनसीपी का समर्थन आवश्यक माना जा रहा है
मॉनसून सेशन में मोदी सरकार परिसीमन विधेयक पेश नहीं कर पाई थी. अब इसे लेकर विशेष सत्र बुलाया जा सकता है. फिलहाल सरकार दो तिहाई नंबर जुटाने पर विचार कर रही है. इसके बाद सरकार संविधान संशोधन विधेयकों को पारित करने के लिए दो दिन का सत्र बुलाने पर विचार कर रही है. हालांकि इस बारे में अंतिम निर्णय तभी किया जाएगा, जब सरकार इन विधेयकों को पारित कराने के लिए आवश्यक दो तिहाई बहुमत के प्रति आश्वस्त हो जाए. सूत्रों के अनुसार आवश्यक संख्या बल जुटाने के लिए विपक्ष के कुछ दलों से बातचीत लगातार जारी है.
दरअसल, 13 अगस्त को मॉनसून सत्र समाप्त होने के बाद दोनों सदनों को अनिश्चिकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है. लेकिन अभी तक संसद का सत्रावसान नहीं हुआ है यानी तकनीकी रूप से अब भी मॉनसून सत्र चल रहा है और दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारी जब भी चाहें सदन की बैठक बुला सकते हैं. सरकार के कुछ वरिष्ठ मंत्रियों ने इशारा दिया है कि सरकार ने विशेष सत्र बुलाने का विकल्प खुला रखा है बल्कि मॉनसून सत्र के दौरान ही कुछ सांसदों से कह दिया गया था कि दोनों सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाएंगे, लेकिन सत्रावसान नहीं होगा.
इसी के बाद यह जानकारी सामने आई थी कि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों को पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुला सकती है. सरकार ने बजट सत्र में भी ऐसा ही किया था. तब सत्रावसान करने के बजाय 16 से 18 अप्रैल तीन दिनों के लिए विशेष सत्र बुलाया गया था. यह अलग बात है कि पूरी ताकत लगाने के बावजूद सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को पारित नहीं करा सकी थी. हालांकि तब से लेकर अब हालात काफी बदल चुके हैं. डीएमके और टीएमसी सत्ता से बाहर हो गए. टीएमसी टूट गई और शिवसेना यूबीटी के सात सांसद शिवसेना शिंदे में आ गए.
आम आदमी पार्टी के सात राज्य सभा सांसद अब भाजपा में हैं. बीजेडी के भी कुछ राज्य सभा सांसद इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए. अप्रैल से अब तक एनडीए में 36 से अधिक सांसद जुड़ चुके हैं. हालांकि अब भी यह संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए सरकार को डीएमके और एनसीपी शरद पवार के समर्थन की आवश्यकता है. इसके साथ ही कुछ विपक्षी दलों के सांसद गैरहाजिर रहें, तभी बिल पारित हो सकेंगे. लोक सभा में संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए 360 सांसदों का समर्थन चाहिए. ऐसा लगता है कि सरकार अभी तक नंबर को लेकर आश्वस्त नहीं है.
जानकार कहते हैं कि जिस दिन सरकार दो तिहाई संख्या बल के प्रति आश्वस्त होगी, उसके बाद विशेष सत्र बुलाया जा सकेगा. सत्रावसान इसीलिए नहीं किया गया है क्योंकि समर्थन जुटाने की कवायद अभी जारी है. इसके साथ ही मोदी मंत्रिपरिषद में संभावित फेरबदल को भी इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है क्योंकि नए दलों का समर्थन मिलने पर उन्हें मंत्रिपरिषद में जगह मिलने का मोल-भाव किया जा सकता है. टीएमसी के बागियों, शिवसेना यूबीटी और आम आदमी पार्टी से आए सांसदों को भी मंत्रिपरिषद में जगह लेने की ख्वाहिश होगी.
संख्या बल पूरा होगा, तभी सरकार बुलाएगी दो दिन का सेशन
सरकार 17 सितंबर को उनके जन्म दिन और 8 अक्तूबर को जन सेवा के 25 वर्ष पूरे होने के मौके पर भाजपा एक महीने तक देश भर में कार्यक्रम करेगी. सितंबर के तीसरे सप्ताह में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक होनी है. हालांकि अभी तक पीएम मोदी के वहां जाने का कार्यक्रम नहीं है. वहीं 27 सितंबर से पितृ पक्ष की शुरुआत हो रही जिस दौरान सामान्यत किसी शुभ कार्य को करने से बचा जाता है. इस तरह मोदी मंत्रिपरिषद में फेरबदल और संसद के विशेष सत्र- दोनों की संभावनाएं इन्हीं कार्यक्रमों को ध्यान में रख कर बन सकती है. पर यह पक्का है कि मोदी सरकार विशेष सत्र तभी बुलाएगी जब वह संख्या बल को लेकर आश्वस्त हो अन्यथा किसी भी दिन सत्रावसान कर दिया जाएगा.
एक देश एक चुनाव समेत कई बिल शीत सत्र तक के लिए रुके
सरकार ने परिसीमन बिलों पर कुछ विपक्षी दलों जैसे डीएमके और एनसीपी शरद पवार का साथ लेने के लिए ही मॉनसून सत्र में कई विवादास्पद बिल टाल दिए थे. जैसे एफसीआरए बिल को जेपीसी को सौंप दिया गया. वहीं एक देश एक चुनाव विधेयक, जेल जाने पर पीएम, सीएम और मंत्रियों की कुर्सी जाने वाले विधेयक और विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक पर बनी जेपीसी का कार्यकाल शीतकालीन सत्र के लिए बढ़ा दिया गया है. जानकारों का मानना है कि अगर मोदी सरकार दो तिहाई संख्या जुटा कर परिसीमन संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पारित करा लेती है तो यह उसका मनोबल बढ़ाने में बहुत मददगार होगा. पश्चिम बंगाल और असम की जीत के बाद भाजपा का आत्मविश्वास चरम पर था, लेकिन नीट पेपर लीक और उसके बाद हुए आंदोलन ने सरकार को बचाव की मुद्रा में ला दिया.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद से नरम है सरकार
शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा. तब से सरकार के तेवर ढीले पड़े हुए हैं. इस बीच भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम का गठन हुआ है और पार्टी अगले साल की शुरुआत में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुट गई है. लेकिन जेन जी की नाराजगी और विपक्ष की आक्रामकता अब भी उसके लिए चुनौती बनी हुई है. कांग्रेस की पूरी कोशिश होगी कि सरकार किसी भी सूरत में परिसीमन बिल पारित न करा सके. इसके बावजूद अगर सरकार यह बिल पारित कराने में सफल होती है तो वह विधानसभा चुनावों के लिए अपना मनोबल मजबूत कर सकेगी. लेकिन अगर इस काम में वह अप्रैल की ही तरह असफल होती है, तो विपक्ष और अधिक आक्रामक हो सकता है. यही कारण है कि सरकार विशेष सत्र बुलाने के बारे में कोई भी फैसला बहुत सोच-समझ कर करेगी.
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