जम्मू की श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज की मान्यता को एनएमसी ने रद्द कर दिया है. राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस में कई तकनीकी खामियां मिलने पर एमबीबीएस पाठ्यक्रम चलाने की दी गई मंजूरी तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है. आयोग ने यह कार्रवाई कॉलेज में न्यूनतम मानकों के गंभीर उल्लंघन, भारी फैकल्टी कमी और मरीजों की संख्या बहुत कम मिलने के बाद की है.
छात्रों का अब क्या होगा?
एनएमसी ने मौजूदा मेडिकल छात्रों को राहत देते हुए कहा कि यहां अभी जो छात्र एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहें हैं उन्हें दूसरे मेडिकल कॉलेजों में स्थानांतरित किया जाएगा. आयोग के मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (MARB) ने आदेश में स्पष्ट किया है कि शैक्षणिक सत्र 2025–26 के लिए 50 एमबीबीएस सीटों पर दिया अनुमति पत्र (LOP) अब प्रभावी नहीं रहेगा. साथ ही कॉलेज द्वारा जमा कराई गई परफॉर्मेंस बैंक गारंटी भी जब्त की जाएगी.
NMC ने क्यों की मान्यता रद्द?
आयोग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ समय से कॉलेज में पर्याप्त बुनियादी ढ़ांचा नहीं होना, योग्य और पूर्णकालिक शिक्षकों की भारी कमी, रेजिडेंट डॉक्टरों का अभाव और ओपीडी-आईपीडी में मरीजों की संख्या बेहद कम जैसे कई गंभीर आरोप लगाते हुए कई शिकायतें मिलीं. इसकी जांच के लिए एक टीम का गठन किया गया जिसने इसी साल दो जनवरी को बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक कॉलेज पहुंचकर निरीक्षण किया. इसी निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर आयोग ने कॉलेज के खिलाफ यह कड़ी कार्रवाई की है.
यह भी पढ़ें- श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज की मान्यता रद्द, 50 में से 42 मुस्लिम छात्रों के एडमिशन पर हुआ था विवाद
रिपोर्ट में क्या निकला?
आयोग की टीम के निरीक्षण में सामने आए तथ्यों ने मेडिकल कॉलेज की बुनियादी तैयारियों पर कई गंभीर और बड़े सवाल खड़े किए. टीम को कॉलेज के फैकल्टी सदस्यों में 39% की कमी मिली, ट्यूटर, डेमॉन्स्ट्रेटर और सीनियर रेजिडेंट के 65 फीसदी पद भरे ही नहीं गए हैं. वहीं, ओपीडी में दोपहर 1 बजे तक केवल 182 मरीज मिले जबकि न्यूनतम मानक 400 है. इसी तरह कॉलेज से संबंधित अस्पताल की जांच करने पर पाया कि केवल 45 फीसदी बिस्तरों पर मरीज भर्ती थे जबकि कॉलेज की मान्यता बढ़ाने के लिए मानक 80 प्रतिशत बिस्तरों पर मरीजों का भर्ती रहना अनिवार्य है. इतना ही नहीं, आईसीयू में औसतन 50 प्रतिशत बिस्तर ही भरे मिले और औसतन 25 प्रसूति प्रति माह यहां हो रही हैं जिसे आयोग ने गंभीर रूप से अपर्याप्त मानते हुए यह भी पाया कि कई विभागों में छात्र प्रैक्टिकल लैब और शोध प्रयोगशाला उपलब्ध नहीं है. कॉलेज की लाइब्रेरी में 1500 की जगह सिर्फ 744 किताबें और 15 की जगह केवल 2 जर्नल ही पाए गए. इसके साथ साथ एआरटी सेंटर और एमडीआर-टीबी के इलाज की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है. टीम ने जब ऑपरेशन थिएटर की जांच की तो पाया कि पांच की जरूरत के मुकाबले केवल दो ही चालू थे. पुरुष और महिला मरीजों के लिए अलग-अलग वार्ड की व्यवस्था तक नहीं है. आयोग ने इन सभी कमियों को स्नातक चिकित्सा शिक्षा न्यूनतम मानक नियम 2023 का सीधा उल्लंघन माना है.
यह भी पढ़ें- जम्मू-कश्मीर में बचे हैं 52 विदेशी आतंकवादी, ये हैं मोस्ट वांटेड 10
नियमों के तहत हुई कार्रवाई
मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड ने मेडिकल संस्थानों की स्थापना, मूल्यांकन और रेटिंग नियम–2023 के तहत कहा है कि इस तरह की गैर-पालना दंडनीय अपराध है. इसी आधार पर एनएमसी अध्यक्ष की मंजूरी से कॉलेज की एमबीबीएस पाठ्यक्रम की अनुमति वापस लेने का निर्णय लिया गया है.
छात्रों का भविष्य नहीं होगा बर्बाद
एनएमसी के आदेश में कहा गया है कि शैक्षणिक सत्र 2025–26 में जिन छात्रों का दाखिला हो चुका है, उन्हें जम्मू-कश्मीर के अन्य मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में अधिशेष सीटों पर समायोजित किया जाएगा. इससे किसी भी छात्र की एमबीबीएस सीट नहीं जाएगी. इसकी जिम्मेदारी केंद्र शासित प्रदेश की सक्षम काउंसलिंग अथॉरिटी की होगी.
कागज नहीं, जमीन पर तैयारी जरूरी
जानकारों का मानना है कि एनएमसी की यह कार्रवाई साफ संदेश देती है कि अब केवल नाम या प्रतिष्ठा के आधार पर मेडिकल कॉलेज नहीं चल पाएंगे. संकाय सदस्य, मरीज, संसाधन और बुनियादी ढांचे में वास्तविक मजबूती दिखानी होगी नहीं तो एक्शन तय है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं