विज्ञापन

Success Story: नौकरी छोड़ी, छोटे भाई का कॉलेज छुड़ाया, मेरठ की गलियों से जुनेजा बंधुओं ने जीरो से बनाई 1 लाख करोड़ की कंपनी

Mankind Pharma Success Story: ट्रंप प्रशासन ने फार्मा कंपनियों पर 200% टैरिफ लगाने का ऐलान किया है. ऐसे में भारतीय कंपनियों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा. जीरो से हीरो की इस कड़ी में आज बात कर रहे हैं मैनकाइंड फार्मा और उसके संघर्ष की. कैसे दो भाइयों ने इस कंपनी को अपने दम पर खड़ा किया.

Success Story: नौकरी छोड़ी, छोटे भाई का कॉलेज छुड़ाया, मेरठ की गलियों से जुनेजा बंधुओं ने जीरो से बनाई 1 लाख करोड़ की कंपनी
Mankind Pharma Ramesh and Rajeev Juneja Success Story

Mankind Pharma Success Story: जरा सोचिए... आप बाजार जाते हैं. आपने मैनफोर्स कंडोम का नाम तो सुना ही होगा? या फिर अनवांटेड 72? और घर में खुशखबरी की मुहर लगाने वाला प्रेगा न्यूज़? या फिर रात को पेट में गैस बन जाए तो तुरंत राहत देने वाला 'गैसो फास्ट'? ये सारे नाम आज हमारे और आपके घरों का हिस्सा बन चुके हैं. पर क्या आपने कभी सोचा है कि इन शानदार प्रोडक्ट्स के पीछे आखिर दिमाग किसका है? कोई विदेशी कंपनी? जी नहीं, यह 100% शुद्ध देसी हिंदुस्तानी कंपनी है-  मैनकाइंड फार्मा.

आज जो कंपनी करीब एक लाख करोड़ रुपये की हैसियत रखती है, क्या आप यकीन करेंगे कि उसकी शुरुआत एक मामूली सी नौकरी करने वाले शख्स ने की थी? 1995 में जिस कंपनी का टर्नओवर सिर्फ 5 करोड़ था, 2016 में वो 5000 करोड़ हो गया और आज करीब 12 हजार करोड़ के पार है. इस रॉकेट की रफ्तार के पीछे हैं 'जुनेजा बंधु' यानी रमेश जुनेजा और राजीव जुनेजा.  

Mankind Pharma Success Story: How the Juneja Brothers Built a ₹1 Lakh Crore Empire from Zero


कहानी की शुरुआत: एक दर्द जिसने विजन बदल दिया

बात है 1980 की. बड़े भाई रमेश जुनेजा ल्यूपिन फार्मा में एक एमआर (मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव) थे. डॉक्टरों के चक्कर काटना, दवाइयां बेचना, यही उनकी आम जिंदगी थी. एक दिन वो एक केमिस्ट की दुकान पर बैठे थे. तभी वहां एक गरीब आदमी आया. उसके हाथ में चांदी के कुछ पुराने गहने थे. उसने कांपती आवाज में कहा, "साहब, मेरे पास पैसे नहीं हैं, क्या इन गहनों के बदले दवा मिल जाएगी?"

इस एक घटना ने आरसी जुनेजा को अंदर तक झकझोर दिया. उनका दिल पसीज गया. उन्हें लगा कि यार, हम कैसी दवाइयां बेच रहे हैं जो इतनी महंगी हैं कि एक आम हिंदुस्तानी तो इलाज के बिना ही दम तोड़ देगा. बस, यहीं से बीज बोया गया एक नई सोच का- "एक रुपये की दवा, आम आदमी को 50 पैसे में कैसे दी जाए?"

नौकरी छोड़ी, छोटा भाई बन गया हनुमान 

उन्होंने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ दी. 1984 में अपनी सारी जमा-पूंजी और परिवार को साथ लेकर 'बेस्टोकेम' नाम की कंपनी खोली. काम चल पड़ा, लेकिन कहते हैं न कि व्यापार में साझीदारी कभी-कभी भारी पड़ जाती है. पार्टनर्स के साथ विवाद हो गया और बनी-बनाई कंपनी छोड़नी पड़ी. उनके हिस्से में आए सिर्फ 50 लाख रुपये.

इसके बाद रमेश ने अपने कॉलेज पढ़ रहे छोटे भाई राजीव जुनेजा से कहा- "भाई, पढ़ाई छोड़, मैदान में उतर. अब हम अपना साम्राज्य खुद बनाएंगे." और ऐसे जन्म हुआ 'मैनकाइंड फार्मा' का. सिर्फ 20 कर्मचारियों के साथ, यूपी के मेरठ शहर से. राजीव जुनेजा एक पॉडकास्ट में बताते हैं, "मैं 19 साल का था तो इस प्रोफेशन में आया. बड़े भाई ने मेरे सामने दो शर्तें रखीं. पहली- महीने में 30 दिन काम करना है. मतलब संडे को भी. मैंने कहा कि मैं 28 दिन काम करूंगा. दूसरी शर्त थी-  सुबह साढ़े आठ बजे के बाद घर पर नजर मत आना और रात 10 बजे से पहले घर मत लौटना." राजीव बताते हैं कि उन्होंने नौ साल लगातार भाई की शर्तों पर काम किया. 
 

बाजार में कैसे गाड़े झंडे?

अब सबसे बड़ा सवाल यह था कि बड़ी-बड़ी दिग्गज फार्मा कंपनियों के सामने ये नई और छोटी सी कंपनी टिकेगी कैसे? बड़े शहरों के नामी डॉक्टर तो इन्हें घास तक नहीं डालते थे. यहीं पर जुनेजा ब्रदर्स ने खेला अपना पहला मास्टरस्ट्रोक. उन्होंने बड़े शहरों और बड़े डॉक्टरों का मोह छोड़ दिया. वो रुख कर गए गांव-कस्बों की तरफ. उन छोटे क्लिनिक वाले डॉक्टरों के पास, जिन्हें कोई बड़ी कंपनी पूछती तक नहीं थी. जुनेजा ब्रदर्स ने उन्हें सम्मान दिया, उन्हें बताया कि हमारी दवा सस्ती भी है और असरदार भी. नतीजा? गांव-गांव में मैनकाइंड का डंका बजने लगा.

दूसरा मास्टरस्ट्रोक

मेडिकल स्टोर वालों को उन्होंने ऐसी स्कीम दी जो उस वक्त किसी ने नहीं सोची थी. साबुन-सर्फ वाली तर्ज पर- "10 डिब्बे लो, 1 पत्ता फ्री पाओ." दुकानदार खुश, डॉक्टर खुश और आम जनता को सस्ती दवा मिल रही थी तो वो भी खुश. देखते ही देखते, 2002 तक ये कंपनी पूरे भारत में फैल गई. और जब जड़ें मजबूत हो गईं, तो इन्होंने बड़े शहरों के बड़े डॉक्टरों के दरबार में वापसी की. आज 3 लाख से ज्यादा डॉक्टर इनकी दवाइयां लिखते हैं. 

मार्केटिंग ऐसी कि टीवी देखकर शरमा गए थे लोग

कहानी का असली क्लाइमैक्स तो अभी बाकी है. पर्चे वाली दवाइयों के तो ये बेताज बादशाह बन गए थे, पर आम जनता के दिमाग में कैसे छपें? आदमी दवाई का पत्ता देखकर ये थोड़ी पूछता है कि कौन सी कंपनी ने बनाई है. इन्होंने वो किया जो उस दौर के 'संस्कारी' भारतीय बाजार में कोई सोच भी नहीं सकता था. 2007 में इन्होंने लॉन्च किया 'मैनफोर्स कंडोम' और ब्रांड एंबेसडर बनाया सनी लियोनी को. टीवी पर ऐड आया और पूरा देश हैरान. परिवार के साथ बैठे लोग नजरें चुराने लगे, एक अजीब सी हलचल मच गई. लेकिन मार्केटिंग का तीर निशाने पर लग चुका था. आज भारत में बिकने वाला हर तीसरा कंडोम मैनफोर्स का होता है.

इसके बाद इन्होंने 'प्रेगा न्यूज़' लॉन्च किया. बड़े शहरों की महिलाओं तक पहुंचने के लिए शिल्पा शेट्टी, अनुष्का शर्मा और करीना कपूर जैसी सुपरस्टार्स को लिया, वो भी तब जब वे खुद प्रेग्नेंट थीं. वहीं गांव-देहात के लिए आशा वर्कर्स और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को जमीन पर उतार दिया.  आज भारत में अपना परचम लहराने के बाद, मैनकाइंड फार्मा दुनिया के सबसे मुश्किल बाजार अमेरिका में भी अपनी दवाइयां बेच रही है. उनका अगला लक्ष्य अब अंतरराष्ट्रीय बाजार पर कब्जा जमाना है. यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन ने जेनेरिक दवाओं पर 200% तक इम्पोर्ट ड्यूटी लगाने का ऐलान किया है. इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय मार्केट को होगा.

(ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका आने वाली जेनेरिक दवाओं पर 200% तक इम्पोर्ट ड्यूटी लगाने का ऐलान कर दिया है. इसका सबसे बड़ा असर भारत की फार्मा इंडस्ट्रीज को होने वाला है. क्योंकि दुनिया में सबसे ज्यादा जेनेरिक दवाएं भारत ही प्रोड्यूस करता है. बीते दशक में कई भारतीय फार्मा कंपनियों ने अपने झंडे गाड़े हैं. जीरो से हीरो सीरीज में आज की कहानी मैनकाइंड फार्मा की.)

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Mankind Pharma Ltd, Rajeev Juneja, Success Story  NDTV, Prega News In Pregnancy, Mankind Pharma
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com