लद्दाख में बढ़ते जल संकट और तेजी से सिकुड़ते ग्लेशियरों के बीच अब एक नई पहल शुरू की गई है-‘प्रोजेक्ट हिम सरोवर'. इसके तहत गांवों में जलाशय बनाकर बर्फ और ग्लेशियर के पिघले पानी को पूरे साल के लिए संरक्षित करने की कोशिश की जा रही है. ऊंचाई पर बसे इस ठंडे रेगिस्तान में पानी गर्मियों में अचानक आता है और उतनी ही तेजी से बहकर निकल जाता है. अब तक यह पानी गांवों से बहकर नीचे चला जाता था और उपयोग नहीं हो पाता था, जिससे साल के अधिकांश समय पानी की कमी बनी रहती है. दरअसल, यहां समस्या सिर्फ पानी की कमी की नहीं, बल्कि उसके गलत समय पर उपलब्ध होने की भी है.

100 जलाशयों का लक्ष्य, 50 पर काम शुरू
10 अप्रैल 2026 को शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के तहत एक साल में 100 जलाशय बनाने का लक्ष्य रखा गया है. पहले चरण में 50 जलाशयों पर काम शुरू हो चुका है, जिनमें 30 लेह और 20 कारगिल में हैं. प्रत्येक जलाशय का आकार लगभग 40x30 मीटर और गहराई करीब 2 मीटर रखी गई है, ताकि बारिश, बर्फ और ग्लेशियर का पानी इकट्ठा किया जा सके, जो अभी तक बहकर बेकार चला जाता था. इन जलाशयों को वैज्ञानिक डिजाइन और पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों के संयोजन से तैयार किया जा रहा है, और इन्हें कम लागत में स्थानीय संसाधनों के उपयोग से विकसित किया जा रहा है.
3 हफ्तों में तैयार पहला जलाशय, 35 लाख लीटर क्षमता
लेह के पास स्टोक गांव में इस प्रोजेक्ट के तहत पहला जलाशय तैयार कर लिया गया है. 26 मार्च को साइट विजिट के बाद महज तीन हफ्तों में इसका निर्माण पूरा हुआ और 17 अप्रैल को इसमें ग्लेशियर का पानी भरा गया. यह जलाशय करीब 1,824 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला है और इसमें लगभग 35 लाख लीटर पानी संग्रहित किया जा सकता है, जिससे करीब 150 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई संभव है. यह जलाशय एक पुराने, गाद से भरे प्राकृतिक गड्ढे को साफ कर, उसकी खुदाई कर, पत्थरों से मजबूत बनाकर तैयार किया गया है. इसके निर्माण में कई विभागों के साथ स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी रही.
कई जगहों पर एक साथ काम जारी
इस परियोजना के तहत कई स्थानों पर एक साथ काम चल रहा है. लेह के स्पितुक फार्का में 10 अप्रैल से चार जलाशयों का निर्माण शुरू हो चुका है, जबकि माथो गांव में सफाई, खुदाई और रिटेनिंग वॉल बनाने का काम जारी है. यह दिखाता है कि अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय के साथ तेजी से काम आगे बढ़ाया जा रहा है.
सेना से लेकर स्थानीय समुदाय तक, सबकी भागीदारी
यह प्रोजेक्ट उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना की अगुवाई में लागू किया जा रहा है, जिसमें सेना, आईटीबीपी, बीआरओ, स्थानीय समुदाय और धार्मिक नेताओं की भागीदारी है. इस तरह यह सिर्फ सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामुदायिक सहयोग से चलने वाला एक व्यापक प्रयास बन गया है.
पुरानी समस्या, अब और गंभीर
लद्दाख में पानी की कमी कोई नई समस्या नहीं है. यहां बेहद कम बारिश होती है और पानी के लिए ग्लेशियर और बर्फ पर निर्भरता रहती है. लेकिन हाल के वर्षों में बर्फबारी का पैटर्न अनियमित हुआ है और ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं. इसके चलते पानी कब उपलब्ध होता है और कब उसकी जरूरत होती है, इस बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है, जिसका सीधा असर खेती, बुवाई के समय और फसल उत्पादन पर पड़ रहा है.
पहले भी कोशिशें, अब बड़े पैमाने पर पहल
हालांकि लद्दाख में पहले भी आइस स्तूप और कृत्रिम ग्लेशियर जैसे प्रयोग किए गए हैं, लेकिन वे सीमित स्तर तक ही प्रभावी रहे. ‘हिम सरोवर' की खास बात इसका बड़ा पैमाना और तेज गति है, जहां एक साल के भीतर 100 जलाशय बनाने की योजना है. पहले के छोटे प्रयोगों के मुकाबले यह पहली बार इतने बड़े स्तर पर जल भंडारण की कोशिश है.
सबसे बड़ा सवाल
बढ़ते जलवायु दबाव और सिकुड़ते ग्लेशियरों के बीच अब चुनौती सिर्फ पानी की उपलब्धता की नहीं, बल्कि उसे सही समय तक सहेजकर रखने की है. ऐसे में यह देखना अहम होगा कि ‘हिम सरोवर' योजना मौसमी पानी को पूरे साल के लिए एक भरोसेमंद स्रोत में बदल पाती है या नहीं.
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