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रस्सी के सहारे हेलीकॉप्टर से नीचे उतरे K9 वॉरियर्स, देखिए सेना के डॉग्स का स्लिथरिंग अभ्यास

सेना के स्पीयर कोर के तहत रेड शील्ड डिवीजन के के‑9 वॉरियर्स ने मणिपुर के लीमाखोंग मिलिट्री स्टेशन में विशेष स्लिथरिंग अभ्यास किया. इस अभ्यास में सेना के पांच प्रशिक्षित डॉग्स—कुरी, शक्ति, मिन्टी, कामना और हूड—ने अपने हैंडलर्स के साथ हिस्सा लिया. इस अभ्यास का उद्देश्य कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में हेलीकॉप्टर के ज़रिए सेना की तेज़ तैनाती क्षमता को और मज़बूत करना था.

रस्सी के सहारे हेलीकॉप्टर से नीचे उतरे K9 वॉरियर्स, देखिए सेना के डॉग्स का स्लिथरिंग अभ्यास
नई दिल्ली:

कुरी, शक्ति, मिन्टी, कामना और हूड- ये किसी गुप्त सैन्य ऑपरेशन के नाम नहीं, बल्कि भारतीय सेना के खास तौर पर प्रशिक्षित डॉग्स हैं, जो जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ऑपरेशनों में तैनात रहते हैं. अब ये डॉग्स एक नई और चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं. अपने हैंडलर्स के साथ ये हेलीकॉप्टर से रस्सी के सहारे नीचे उतरना सीख रहे हैं. यह कोई आसान काम नहीं है. सेना के ध्रुव हेलीकॉप्टर से ये डॉग्स 10 से 15 मीटर की ऊंचाई से सफलतापूर्वक स्लिथरिंग कर रहे हैं, यानी जरूरत पड़ने पर हेलीकॉप्टर से रस्सी के सहारे उतरकर तुरंत कार्रवाई कर सकते हैं.

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सेना के स्पीयर कोर के तहत रेड शील्ड डिवीजन के के‑9 वॉरियर्स ने मणिपुर के लीमाखोंग मिलिट्री स्टेशन में विशेष स्लिथरिंग अभ्यास किया. इस अभ्यास में सेना के पांच प्रशिक्षित डॉग्स—कुरी, शक्ति, मिन्टी, कामना और हूड—ने अपने हैंडलर्स के साथ हिस्सा लिया. इस अभ्यास का उद्देश्य कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में हेलीकॉप्टर के ज़रिए सेना की तेज़ तैनाती क्षमता को और मज़बूत करना था.

इसके साथ‑साथ सैनिकों और डॉग स्क्वॉड के बीच तालमेल, ऑपरेशनल तैयारी और टीमवर्क को बेहतर बनाना भी इस अभ्यास का मकसद था. अभ्यास के दौरान सेना के डॉग्स और उनके हैंडलर्स ने शानदार तालमेल और आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया. कठिन हालात में उनकी फुर्ती, अनुशासन और तेज़ प्रतिक्रिया देखने लायक रही. सेना के मुताबिक, ऐसे अभ्यास भविष्य के अभियानों के लिए बेहद अहम होते हैं.

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ये के‑9 वॉरियर्स सेना के कई महत्वपूर्ण मिशनों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इनमें विस्फोटकों का पता लगाना, आतंकियों की खोज, सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन और आपदा राहत कार्य शामिल हैं. संवेदनशील इलाकों में ये डॉग्स जवानों की सुरक्षा बढ़ाते हैं और कई बार अपनी जान की बाज़ी लगाकर देश के लिए शहीद भी हो जाते हैं.

भारतीय सेना के मिलिट्री वर्किंग डॉग्स को मेरठ स्थित रिमाउंट वेटरनरी कॉर्प्स सेंटर एंड कॉलेज में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है. ज़िम्मेदारियों के अनुसार इन डॉग्स को 12 से 36 हफ्तों तक कठिन प्रशिक्षण से गुज़ारा जाता है. इस दौरान उनके हैंडलर्स को भी विशेष ट्रेनिंग दी जाती है. इन डॉग्स को असॉल्ट मिशन, बम और बारूदी सुरंग की पहचान, ट्रैकिंग, गार्ड ड्यूटी, पैदल गश्त, सर्च एंड रेस्क्यू और हिमस्खलन बचाव अभियानों के लिए तैयार किया जाता है.

भारतीय सेना मुख्य रूप से जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर रिट्रीवर और बेल्जियन मेलिनोइस नस्ल के डॉग्स का इस्तेमाल करती है. ये नस्लें तेज़ सूंघने की क्षमता, फुर्ती और सहनशक्ति के लिए जानी जाती हैं. इसके अलावा सेना अब देशी नस्लों जैसे मुदहोल हाउंड और चिप्पीपराई को भी शामिल कर रही है, जो भारतीय मौसम और कठिन इलाकों में बेहतर प्रदर्शन करने में सक्षम मानी जाती हैं. फिलहाल मणिपुर में तैनात थ्री आर्मी डॉग यूनिट के ये के‑9 वॉरियर्स आंतरिक सुरक्षा अभियानों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

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लेखक के बारे में
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राजीव रंजन
Senior Editor - Defence & Political Affairs
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