- कांग्रेस ने तमिलनाडु में डीएमके से अलग होकर विजय की पार्टी टीवीके को समर्थन देने का फैसला लिया
- कांग्रेस ने टीवीके को समर्थन की शर्त रखी है कि गठबंधन में सांप्रदायिक ताकतों को शामिल न किया जाए
- कांग्रेस ने विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा चुनाव टीवीके के साथ लड़ने का ऐलान किया है
कांग्रेस ने तमिलनाडु में डीएमके गठबंधन से अलग हो कर विजय की पार्टी टीवीके को समर्थन देने का ऐलान किया है. कांग्रेस ने कहा कि टीवीके को समर्थन की शर्त यह है कि इस गठबंधन से सांप्रदायिक ताकतों को बाहर रखा जाए जो संविधान में यकीन नहीं करते. कांग्रेस ने यह भी एलान किया है कि आने वाले स्थानीय चुनाव से लेकर लोकसभा और राज्यसभा चुनाव टीवीके के साथ लड़ेगी. कांग्रेस के इस फैसले को डीएमके पहले ही विश्वासघात करार दे चुकी है. कांग्रेस की दलील है कि वो जनादेश के साथ है और बीजेपी को तमिलनाडु से दूर रखने के लिए उसने यह कदम उठाया है.
लेकिन यह फैसला अचानक नहीं हुआ. इसकी भूमिका बीते कुछ महीने से बन रही थी. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में अभिनेता से नेता बने विजय की महज दो साल पुरानी पार्टी टीवीके की जबरदस्त जीत ने भले ही सब हैरान हुए लेकिन प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेताओं को इस सुनामी का एहसास काफी पहले हो गया था.
कांग्रेस को पहले से था विजय की जीत का अंदाजा
राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले सांसद मणिकम टैगोर और प्रोफेशनल कांग्रेस के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती जैसे नेताओं ने अंदरखाने पूरी कोशिश की कि कांग्रेस डीएमके की बजाय टीवीके के साथ मिलकर चुनाव लड़े. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने सियासी रिस्क लेने की इच्छाशक्ति दिखाने की बजाय डीएमके के साथ सौदेबाजी शुरू कर दी.
कांग्रेस ने डीएमके के साथ क्यों किया गठबंधन?
कांग्रेस ने मांग रखी कि उसे विधानसभा की करीब 40 सीटें दी जाएं और डीएमके सरकार में उसे हिस्सेदारी यानी मंत्रिपद मिले. सरकार में हिस्सेदारी और पिछली बार से 15 ज्यादा सीटों की डिमांड को डीएमके ने खारिज कर दिया. दूसरी तरफ टीवीके कांग्रेस को करीब साठ सीटों के साथ सरकार में शामिल करने के लिए राजी थी. टीम राहुल डीएमके के सामने झुकने के मूड नहीं थी लेकिन आखिरी समय में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे और पी चिदंबरम ने लचीला रुख अपनाया और विधानसभा की 28 सीट के साथ राज्यसभा की एक सीट पर कांग्रेस राजी हो गई. कांग्रेस और डीएमके साथ चुनाव तो लड़े लेकिन पूरे प्रचार अभियान में राहुल गांधी ने सीएम स्टालिन के साथ मंच साझा नहीं किया. दोनों शीर्ष नेताओं के बीच की दरार साफ जाहिर हो रही थी.
नतीजों के दिन जैसे ही डीएमके सत्ता से बाहर गई राहुल गांधी ने फोन पर विजय को बधाई दी और कहा कि कांग्रेस उनके साथ है. हालांकि कांग्रेस को टीवीके के समर्थन के औपचारिक एलान से पहले दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे, राहुल गांधी और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने मंथन किया और तय किया कि तमिलनाडु कांग्रेस के नेताओं की आपात बैठक बुला कर इस फैसले पर मुहर लगाई जाए.
खरगे DMK को छोड़ने के पक्ष में नहीं थे
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष खरगे डीएमके को छोड़ने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन चुनाव नतीजे के बाद राहुल गांधी की इच्छा के मुताबिक उन्होंने हामी भर दी. कांग्रेस आलाकमान ने इस बात का जरूर ख्याल रखा कि राष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि कांग्रेस ने हार के बाद पुराने साथी को छोड़ दिया. इसके अलावा संसद में डीएमके विपक्ष का एक अहम घटक है जिसके बिना मोदी सरकार को घेरना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा. दिल्ली में दरवादा खुला रखने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने अपना फैसला चेन्नई में करवाया.
टीवीके की पैरवी कर रहे कांग्रेस के नेता ने चुनाव से पहले अनौपचारिक बातचीत में अफसोस जताते हुए कहा कि विजय और राहुल गांधी की जोड़ी पूरे तमिलनाडु में दो सौ सीट जीत सकती थी. बहरहाल विजय ने अकेले ही बहुमत के लगभग करीब पहुंच कर कांग्रेस को अपने दो दशक पुराने सहयोगी डीएमके को छोड़ टीवीके के साथ हाथ मिलाने के लिए विवश कर दिया है. तमिलनाडु की 234 सीटों की विधानसभा में बहुमत के लिए विजय को करीब दस सीटों की जरूरत है. कांग्रेस के पास 5 विधायक हैं. कांग्रेस यह संदेश देने का प्रयास कर रही है कि गठबंधन का निवेदन टीवीके ने किया.
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टीवीके के साथ कांग्रेस क्यों कर रही गठबंधन?
टीवीके के साथ कांग्रेस के गठबंधन की एक सीधी वजह तो यही है कि उसे करीब साठ सालों के बाद सरकार में शामिल होने और साथ ही साथ प्रदेश में अपने संगठन को मजबूत बनाने का मौका मिलेगा. लेकिन बात इतनी सी नहीं है. विजय काफी पहले से कांग्रेस के करीब रहे हैं. राहुल गांधी ने 2009 में उन्हें मिलने बुलाया था. टीवीके के मुख्यालय में तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता रहे के कामराज की मूर्ति लगी है. टीवीके नई पार्टी है और उसके पास ना ठोस संगठन है ना ही सरकार चलाने का अनुभव. ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि टीवीके उसके साथ सम्मान का व्यवहार करेगी जिसकी कमी उसे डीएमके के साथ महसूस होती थी.
राहुल गांधी और विजय की असली परीक्षा तीन साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में होगी. क्या राहुल गांधी विजय जैसा करिश्मा राष्ट्रीय स्तर पर दोहरा पाएंगे? लेकिन असली कसौटी तो तमिलनाडु-पुडुचेरी की चालीस लोकसभा सीटें होंगी जिसे बीते दो लोकसभा चुनावों से डीएमके-कांग्रेस गठबंधन क्लीन स्वीप कर था. अगले चुनाव में कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए डीएमके कोई कसर नहीं छोड़ेगी.
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