- इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से 11 लोगों की मौत और 1400 से अधिक लोग बीमार हुए हैं
- दूषित पानी की वजह मुख्य पाइपलाइन में लीकेज से सीवेज पानी का पेयजल में मिलना माना जा रहा है
- अगस्त 2025 में पाइपलाइन बदलने का टेंडर ₹2.40 करोड़ में जारी किया गया था, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ
देश का 'सबसे साफ शहर' कहलाने वाला इंदौर आज एक भयावह सच्चाई से रू-बरू है. भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 11 लोगों की मौत हो चुकी है और 1400 से अधिक लोग बीमार पड़ चुके हैं. जो शुरुआत में एक 'दुर्भाग्यपूर्ण हादसा' बताया जा रहा था, वह अब ठेके की देरी, प्रशासनिक लापरवाही और निगरानी की विफलता का घातक उदाहरण बन चुका है. सूत्रों की मानें तो यह त्रासदी टाली जा सकती थी. यह हादसा नहीं था, यह लापरवाही से हुई मौतें थीं.
पानी में कहां से मिला 'जहर'?
जांच एजेंसियों ने दूषित पानी का स्रोत भागीरथपुरा पुलिस चौकी के पास सार्वजनिक शौचालय के नीचे से गुजर रही मुख्य पाइपलाइन में लीकेज को माना है. आशंका है कि इसी लीकेज से सीवेज का पानी पीने के पानी की लाइन में मिल गया, जिससे पूरे इलाके में संक्रमण फैला.
मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने बुधवार को कहा कि ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी. सीएमएचओ डॉ माधव हसानी ने बताया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज की लैब रिपोर्ट में साफ साबित हुआ है कि भागीरथपुरा के लोग दूषित पानी पीने से बीमार पड़े और उनकी मौत हुई.

सूत्रों के मुताबिक, भागीरथपुरा की पुरानी पाइपलाइन बदलने के लिए अगस्त 2025 में ही ₹2.40 करोड़ का टेंडर जारी किया गया था, जिसमें गंदे और बदबूदार पानी की शिकायतों का जिक्र था.
लेकिन न टेंडर खोला गया, न काम शुरू हुआ, न आपात मरम्मत की गई. लोगों की मौत के बाद जाकर टेंडर आनन-फानन में खोला गया.
क्या लापरवाही के चलते हुई मौतें?
जल संसाधन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा 'यह नाकामी नहीं थी, लापरवाही थी.' AMRUT 2.0 योजना के तहत 2023-24 में इंदौर को लगभग ₹1700 करोड़ की परियोजनाएं मिलीं.
- पैकेज-1 (₹579 करोड़): इंटेक वेल, WTP और पाइपलाइन SPML को मिला
- पैकेज-2 (₹424 करोड़): ग्रेविटी मेन और ट्रंक लाइन अभी टेंडर में
- पैकेज-3 और 4 (₹400 करोड़ प्रत्येक): वितरण नेटवर्क और टंकियां अभी टेंडर में
लेकिन जल संसाधन विभाग के सूत्र मानते हैं कि देरी और कमजोर निगरानी के कारण शहर के कई हिस्सों में सीवेज और पेयजल लाइनें आपस में जुड़ गईं खासकर पुराने इलाकों में जैसे भागीरथपुरा.
लोगों ने शिकायतें भी कीं, लेकिन...
इलाके के लोगों ने इस मामले में पहले शिकायतें भी की थीं. भागीरथपुरा की रहने वाली प्रीति शर्मा कहती हैं कि उन्होंने कई बार बदबूदार पानी की शिकायत स्थानीय पार्षद से की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. ओमप्रकाश ने अपने घर के गंदे पानी के सैंपल दिखाए और कहा, 'ठेके को लेकर अधिकारी और कंपनियां लड़ती रहीं और हमारा पानी सीवेज बनता रहा.'

मानवाधिकार आयोग ने मांगी रिपोर्ट
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले में स्वतः संज्ञान लिया है और मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को दो हफ्ते में विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा है. सरकार ने भी मामले में तीन सदस्यीय जांच समिति बना दी गई है. जांच अतिरिक्त मुख्य सचिव को सौंपी गई है. कुछ निचले स्तर के अधिकारी निलंबित कर दिए गए हैं.
हादसा या विफलता, जवाब मांग रहे लोग
कई सवाल अभी भी जिंदा हैं, टेंडर समय पर क्यों नहीं खोला गया? लीकेज समय रहते क्यों नहीं ठीक किया गया? लोगों की शिकायतों को क्यों अनसुना किया गया? और सिस्टम तब क्यों जागा जब लाशें आने लगीं? इंदौर अपनी सफाई पर गर्व करता है. लेकिन भागीरथपुरा में सफाई के तमगे तब खोखले साबित हो गए जब नलों से पानी नहीं, ज़हर बहा और प्रशासन चुप रहा.
लोगों का कहना है कि यह हादसा नहीं था. यह एक सिस्टम की विफलता थी. और इसकी कीमत लोगों ने अपनी जान देकर चुकाई.
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