- कावेरी ड्राई इंजन ने रूस में उच्च ऊंचाई और उड़ान परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे किए
- यह ड्राई इंजन डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट द्वारा बनाया गया है
- परीक्षण रूस के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एविएशन मोटर्स और ग्रोमोव फ्लाइट रिसर्च इंस्टीट्यूट में किए गए थे
भारत के स्वदेशी कावेरी इंजन ने बड़ा कारनामा कर दिखाया है. कावेरी ने रूस में वो अग्निपरीक्षा पास की है, जिससे भारत के डिफेंस सेक्टर को मजबूती मिलेगी. हाल ही में भारत में बने कावेरी ड्राई इंजन ने रूस में ज्यादा ऊंचाई और उड़ान के ट्रायल पूरे कर लिए हैं और इसने 48.5 किलोन्यूटन (kN) का पीक ड्राई थ्रस्ट हासिल किया है. यह उस लगभग 46 kN थ्रस्ट से कहीं ज्यादा है, जिसे इसे हासिल करना था. यानी हमारे कावेरी ने अपने टारगेट से भी ज्यादा पावर हासिल कर ली है. कावेरी वही जेट इंजन है जिसे एक समय फेल प्रोजेक्ट माना जा रहा था. लेकिन इस इंजन ने प्रचंड थ्रस्ट देकर पूरी दुनिया में भारत की धाक और मजबूत कर दी है.
कावेरी जेट इंजन को डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) के गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टेब्लिशमेंट (GTRE) ने बनाया है. इसे भारत के प्रस्तावित स्टील्थ अनमैन्ड कॉम्बैट एरियल व्हीकल (UCAV) 'घातक' को पावर देने के लिए बनाया गया है. प्रोपल्शन यानी इंजन की ताकत के मामले में अच्छी खबर का लंबे समय से इंतजार कर रहे इस प्रोग्राम के लिए ये आंकड़े बहुत अहम हैं.
क्या टेस्ट किया गया?
इस इंजन को कावेरी डेरिवेटिव इंजन (KDE) के नाम से जाना जाता है. यह ओरिजिनल कावेरी का नॉन-आफ्टरबर्निंग वर्शन है, जिसे ऐसे एयरक्राफ्ट के लिए बनाया गया है जिन्हें आफ्टरबर्नर से मिलने वाले एक्स्ट्रा किक यानी ज्यादा ताकत की जरूरत नहीं होती. 'ड्राई थ्रस्ट' का मतलब है बिना आफ्टरबर्नर के मिलने वाला थ्रस्ट.
ये ट्रायल रूस के दो संस्थानों में किए गए. पहला है सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एविएशन मोटर्स (CIAM) और दूसरा ग्रोमोव फ्लाइट रिसर्च इंस्टीट्यूट. CIAM में इंजन को ऐसी स्थितियों में टेस्ट किया गया जो ज्यादा ऊंचाई पर उड़ने जैसी थीं, जहां हवा का दबाव और तापमान दोनों तेजी से गिरते हैं.

Il-76 पर हवा में उड़ान
इसके बाद फ्लाइट टेस्ट हुए. इंजीनियरों ने एक मॉडिफाइड इल्यूशिन Il-76 फ्लाइंग टेस्टबेड लिया, उसके स्टैंडर्ड इंजनों में से एक को हटाया और उसकी जगह कावेरी इंजन लगाया. इस तरह का टेस्टबेड किसी खास एयरक्राफ्ट से जुड़े बिना नए इंजन को असल में उड़ान भरने की सुविधा देता है. ट्रायल के दौरान, टीम ने अलग-अलग बाहरी दबाव, मैक नंबर और थ्रस्ट की जरूरतों के हिसाब से इंजन को टेस्ट किया. कुछ काम जमीन पर किया गया और बाकी हवा में.
टारगेट से बेहतर प्रदर्शन
थ्रस्ट का मुद्दा सालों से कावेरी प्रोग्राम के लिए एक चुनौती रहा है. लगभग 46 kN के टारगेट के मुकाबले 48.5 kN की रीडिंग से पता चलता है कि इंजन में अब कुछ एक्स्ट्रा पावर है.
इस टेस्टिंग के बाद क्या?
रूसी चरण पूरा हो गया है. अब काम वापस देश में सर्टिफिकेशन और इंटीग्रेशन के लिए आगे बढ़ेगा. रक्षा सूत्रों ने बताया कि 'सेंटर फॉर मिलिट्री एयरवर्दीनेस एंड सर्टिफिकेशन' (CEMILAC) एयरवर्दीनेस मंजूरी देने से पहले टेस्ट डेटा और अन्य पैमानों की जांच करेगा.
इसका मतलब यह नहीं है कि इंजन बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तैयार है. ऑपरेशनल इस्तेमाल के बारे में बात करने से पहले इसे अभी सर्टिफिकेशन पास करना होगा और प्लेटफॉर्म के साथ इंटीग्रेट करना होगा.

तेजस से घातक तक
कावेरी की कहानी लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (LCA) तेजस के साथ शुरू हुई थी. इस प्रोजेक्ट को ₹382.21 करोड़ के शुरुआती बजट के साथ मंजूरी दी गई थी, लेकिन फिर इसमें एक के बाद एक तकनीकी समस्याएं आईं, खासकर जरूरी थ्रस्ट हासिल करने और अहम इंजन टेक्नोलॉजी विकसित करने में. आखिरकार, ओरिजिनल कावेरी इंजन कभी तेजस में नहीं लगाया गया. लेकिन यह कोशिश बेकार नहीं गई. इससे भारत को गैस टरबाइन टेक्नोलॉजी में व्यावहारिक विशेषज्ञता मिली और बाद में बने डेरिवेटिव्स के लिए आधार तैयार हुआ, जिसमें 'घातक' के लिए तैयार किया जा रहा ड्राई वैरिएंट भी शामिल है.
टेस्टिंग के लिए रूस ही क्यों?
भारत के पास ऊंचाई वाली स्थितियों को दोहराने के लिए जरूरी विशेष हाई-एल्टीट्यूड टेस्ट सुविधाएं नहीं हैं, इसलिए प्रोटोटाइप इंजनों को टेस्टिंग के लिए विदेश भेजना पड़ा. इसीलिए यह दौर रूस में हुआ.
आगे क्या होगा?
अगर सर्टिफिकेशन और इंटीग्रेशन सफल हो जाते हैं, तो कावेरी डेरिवेटिव 'घातक' और भविष्य में संभवतः अन्य अनमैन्ड प्लेटफॉर्म यानी बिना पायलट वाले विमानों के लिए एक मजबूत स्वदेशी इंजन विकल्प बन सकता है. भारत के सैन्य विमानन क्षेत्र के लिए, यह देश में ही एडवांस्ड जेट इंजन बनाने की दशकों पुरानी कोशिश में एक और कदम होगा.
बेहद रोचक है कावेरी का इतिहास
कावेरी इंजन प्रोजेक्ट की कहानी शुरू हुई थी 80 के दशक में. मार्च 1989 में यह प्रोजेक्ट शुरू किया था. इसे तेजस जैसे विमानों के लिए बनाया जा रहा था. लेकिन थ्रस्ट और थर्मल लोड के कारण कावेरी शुरुआत में उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतर सका. तेजस के लिए कावेरी इंजन के 9 प्रोटोटाइप बनाए गए और 3200 घंटे से ज्यादा की टेस्टिंग हुई. इतनी कोशिशों के बाद भी यह इंजन सफल नहीं हो पाए. नतीजा यह रहा कि 2008 में कावेरी इंजन को ऑफिशियली तेजस प्रोग्राम से अलग कर दिया गया. लेकिन एक बार फिर DRDO ने कमान संभाली और कावेरी इंजन प्रोजेक्ट को फिर से शुरू किया गया.
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