भारत डिफेंस सेक्टर में लगातार मजबूत हो रहा है. भारतीय वायुसेना के पास राफेल, सुखोई-30MKI और तेजस जैसे खतरनाक फाइटर जेट हैं. इतना ही नहीं भारत तेजी से 5th जेनरेशन फाइटर जेट AMCA पर भी काम कर रहा है. लेकिन भविष्य के लिए इतना काफी नहीं होगा. इसलिए भारत ने अभी से भविष्य की पूरी तैयारी कर ली है. भारत फ्रांस के साथ मिलकर अब 6th जेनरेशन फाइटर जेट डेवलेप करने की दिशा में भी काम कर रहा है.
हाल ही में संसद में पेश एक रिपोर्ट के अनुसार रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस के नेतृत्व वाले फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) कार्यक्रम में शामिल होने की कोशिशें शुरू कर दी हैं. इस तकनीक के दम पर भारतीय वायुसेना और ज्यादा ताकतवर हो जाएगी. आखिर ये 6th जेनरेशन फाइटर जेट क्या है और भारत के लिए यह क्यों जरूरी है? आइए बताते हैं.
आखिर क्या होता है 6th जेनरेशन फाइटर?
भारत के पास फिलहाल जो राफेल विमान हैं, वह 4.5 जेनरेशन के हैं. भारत पहले से ही 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट पर काम कर रहा है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि 6th का फाइटर जेट सिर्फ ज्यादा तेज या ज्यादा स्टेल्थ विमान नहीं होगा. यह एक उड़ता हुआ कमांड सेंटर होगा जो AI, एडवांस्ड सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और ड्रोन नेटवर्क से लैस रहेगा.
यानी यह विमान बिना पायलट के भी उड़ान भर पाएंगे. इन्हें AI या रोबोट के जरिए खतरनाक मिशनों पर भेजा जा सकेगा. इसके अलावा इन विमानों का अपना एक 'कॉम्बैट क्लाउड' नेटवर्क होगा. दुश्मन चाहकर भी इनके कम्यूनिकेशन को हैक या जाम नहीं कर पाएगा. वहीं ये विमान पारंपरिक मिसाइलों के साथ-साथ लेजर बीम छोड़ सकेंगे जो पलक झपकते ही दुश्मन की मिसाइल या जेट को हवा में ही पिघला देगी.
भारत को अभी से क्यों करनी पड़ रही तैयारी?
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन का तेजी से बढ़ता एयर पावर है. चीनी वायुसेना पहले ही बड़ी संख्या में J-20 जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर तैनात कर चुकी है और अब वह अगली पीढ़ी की तकनीकों पर भी काम कर रही है. दूसरी तरफ भारतीय वायुसेना के पास अभी कोई ऑपरेशनल पांचवीं पीढ़ी का फाइटर नहीं है. AMCA आने में अभी कई साल लग सकते हैं. ऐसे में डिफेंस एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारत अगर अभी से 6th जेनरेशन तकनीकों पर काम नहीं करेगा तो भविष्य में तकनीकी अंतर और बढ़ सकता है.
वहीं भारत के लिए 6th जेनरेशन की तकनीकों जैसे एडैप्टिव इंजन और क्वांटम सेंसर को अकेले डेवलेप करना आसान नहीं है. इसमें दशकों का समयऔर खरबों रुपये लगेंगे. इसलिए भारत फ्रांस के साथ जुड़कर इस तकनीक को विकसित करने पर फोकस कर रहा है.
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