- TMC ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का नोटिस राज्यसभा और लोकसभा सचिवालय को सौंपा है.
- नोटिस में 7 प्वाइंट शामिल हैं, जिनमें बिहार की एसआईआर प्रक्रिया और वोटिंग अधिकारों की हनन की बात कही गई है.
- दोनों सदनों के सभापति के पास 14 दिन हैं, जिसके बाद आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की जाएगी.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का मामला राज्यसभा और लोकसभा सचिवालय को सौंप दिया है. शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस ने 10 पन्नों से ज्यादा की नोटिस में ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने जाने के 7 कारणों का जिक्र किया गया है. इन 7 बिंदुओं में बिहार की SIR प्रक्रिया का ज़िक्र किया गया है. लोगों के वोटिंग के अधिकार को छीनने की बात भी की गई है. साथ ही कुछ राजनीतिक दलों के प्रति पक्षपात करने का आरोप भी लगाया गया है. इसमें सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का जिक्र भी किया गया है.
सभापति के सामने 14 दिनों का समय, फिर गठित होगी समिति
दोनों सदनों के सभापति के सामने अभी 14 दिनों का वक्त है. यदि इन 14 दिनों में तृणमूल कांग्रेस ने अपना आवेदन वापस नहीं लिया और यदि पाया गया कि तृणमूल कांग्रेस का नोटिस सही है तब लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति मिल कर एक समिति का गठन करेंगे और इस समिति के जिम्मे यह होगा कि वो पहले इस महाभियोग के लिए आरोपों की जांच करें और अपनी राय दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का मामला बनता है या नहीं.
1993 का इतिहास, जब लोकसभा में अलग से बना था कठघरा
मुख्य चुनाव आयुक्त या आयुक्तों और जजों को हटाने की प्रक्रिया एक ही है. भारतीय संसद के इतिहास यह भी देखने को मिला जब 1993 में जस्टिस वी रामास्वामी पर महाभियोग चला था और लोकसभा में एक अलग से कठघरा बनाया गया था, जहां से वकील कपिल सिब्बल ने जस्टिस रामास्वामी के पक्ष में दलीलें पेश की थी. मगर बहस खत्म होते ही जस्टिस रामास्वामी ने इस्तीफा दे दिया था.
तीन लोगों की समिति में कौन-कौन लोग होते हैं
नियम ये है कि तीन लोगों की एक समिति बनेगी जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक वरिष्ठ वकील या कानून के जानकार होते हैं. यही प्रक्रिया जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में भी अपनाई गई और यही प्रक्रिया मुख्य चुनाव आयुक्त के महाभियोग के वक्त भी अपनाई जाएगी.

कांग्रेस ने TMC को दिया है लीड करने का फैसला
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस को लीड लेने दिया है. कांग्रेस ने जब लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला लिया, तब तृणमूल कांग्रेस शुरुआत में तैयार नहीं थी, मगर इंडिया गठबंधन की बैठक में यह तय हुआ कि लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का तृणमूल कांग्रेस समर्थन करेगी. मगर उसके बदले मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग पर कांग्रेस उनका साथ दे, इस बात पर कांग्रेस और पूरे विपक्ष की सहमति के बाद ही हस्ताक्षर कराए गए.
जस्टिस यशवंत वर्मा पर भी चल रहा महाभियोग प्रस्ताव
संसद में एक और जज के मामले में महाभियोग का मामला पड़ा हुआ है. जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से मिले जले हुए नोटों के मुद्दे पर लाए गए महाभियोग पर लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय एक समिति बनाई हुई है. इसमें सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्रशेखर और कनार्टक हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील बीवी आचार्य की समिति मीमले को देख रही है.

लोकसभा अध्यक्ष ने यह समिति 25 फरवरी को बनाई थी. उम्मीद की जा रही है कि जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग चलेगा या नहीं इस पर यह समिति मानसून सत्र में अपनी रिपोर्ट देगी यानि यह रिपोर्ट जुलाई-अगस्त तक का वक्त लगेगा.
CEC पर फैसला आने तक बंगाल में बन जाएगी नई सरकार
कहने का मतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का मामला आने में कम से कम पांच महीने तो लगेंगे ही तब तक पश्चिम बंगाल का चुनाव भी खत्म हो जाएगा, नई सरकार भी बन चुकी होगी.
चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग क्यों लाई टीएमसी
फिर सवाल है कि तृणमूल कांग्रेस मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग क्यों ला रही है? तृणमूल कांग्रेस के नेता निजी बातचीत में कहते हैं कि यह राजनैतिक लड़ाई है. यह चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की रणनीति है. तृणमूल कांग्रेस अपने कैडर और वोटरों को यह संदेश देना चाहती है कि चुनाव आयोग गलत है और गलत तरीके के वोटरों के नाम काटे गए.
उनकी नेता इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गई, फिर संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग भी ला रही है. पश्चिम बंगाल के वैसे मतदाता जिनके परिवार में से एक दो नाम वोटर लिस्ट से कटे हैं, वैसे परिवार को भी तृणमूल कांग्रेस संदेश दे रही है कि उनकी लड़ाई पार्टी ने सड़क, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक लड़ी.
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