क्या आप हावड़ा को जानते हैं? जुड़वां शहर हावड़ा का इतिहास करीब पांच सौ साल पुराना है, जबकि कोलकाता का इतिहास तीन सौ साल पुराना है. कभी इसे देश का 'शेफ़ील्ड' कहा जाता था.हावड़ा छोटे-छोटे उद्योगों का बड़ा केंद्र था. यह इलाका हमेशा से साधारण लेकिन बहुसांस्कृतिक रहा है. आसपास के इलाकों की तुलना में यहां की आबादी भी अधिक थी. औद्योगिक महानगर होने की वजह से अंग्रेज शासक भी इसकी तारीफ करते थे. गंगा के किनारे कई जूट मिलें थीं. बंगाल में एक कहावत प्रचलित है,'गंगार पश्चिम कुल वाराणसी समतुल्य', यानी गंगा का पश्चिमी तट वाराणसी के समान है. आज वही सुंदर, आध्यात्मिक और बहुसांस्कृतिक शहर बंगाल की आपराधिक गतिविधियों का प्रतीक बन गया है.
कुछ महीने बाद पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाला है. ऐसे समय में हावड़ा का औद्योगिक गौरव से अपराधग्रस्त शहर तक का सफर शासन और राजनीतिक जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करता है.
यह परिवर्तन क्यों हुआ? और अभी इस पर चर्चा क्यों?
'हाबड़ा ब्रिज' के नाम से एक मशहूर बॉलीवुड फिल्म बनी थी. हावड़ा ब्रिज, गंगा और कोलकाता से दिखने वाला हावड़ा आज भी कई बॉलीवुड और टॉलीवुड फिल्मों में बहुत रोमांटिक अंदाज में दिखाई देता है. लेकिन हकीकत में वह पुराना हावड़ा जैसे कहीं खो गया है. अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया यह पुल आज भी उपयोग में है. लेकिन वह समृद्ध और सांस्कृतिक हावड़ा, जहां शरत चंद्र चटोपाध्याय रहे थे, अब केवल यादों में है. उनका हावड़ा के उलूबेरिया इलाके में निधन हुआ था. डोमजूर कभी हाबड़ा में हीरा काटने वालों का केंद्र था, जो वहां से मुंबई-दिल्ली जाया करते थे. स्वामी विवेकानंद का बेलूर मठ भी उत्तर हावड़ा में ही स्थित है. बेलूर मठ के पास ही पिलखाना इलाका है, अभी हाल में ही वहां क्या हुआ.

25 फरवरी 2026 की सुबह हावड़ा में क्या हुआ? सुबह करीब सवा चार बजे एक चाय की दुकान के सामने दो लोग एक युवक से बात कर रहे थे. अचानक उनमें से एक ने पीछे से युवक के सिर में गोली मार दी. युवक सड़क पर गिर पड़ा. फिर दोनों ने उसके सीने में कई गोलियां दागीं और वहां से फरार हो गए. यह पूरा घटनाक्रम एक मिनट से भी कम समय में खत्म हो गया. सुबह करीब साढ़े चार बजे सोफिक को हावड़ा जिला अस्पताल ले जाया गया. दोपहर तक उसका शव वापस लाया गया. गोली मारने का आरोप हारुन पर लगा. दोपहर करीब साढ़े 12 बजे उसके घर पर हमला हुआ. लोगों ने शव लेकर पिलखाना क्रॉसिंग पर प्रदर्शन किया. इस दौरान पुलिस और लोगों में झड़प हुई. हारुन के घर पर फिर हमला हुआ.उसके घर में सोफे, वैन और स्कूटर में आग लगा दी गई. मृतक रियल एस्टेट कारोबारी और प्रमोटर था. उसकी हत्या का कारण स्पष्ट नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि हत्या की वजह क्या थी? वह सुबह-सुबह वहां क्यों गया था? हमलावरों से उसका क्या संबंध था? क्या इसका राजनीतिक संबंध है? हथियार किसने उपलब्ध कराए?
हावड़ा में अपराध कितना है
सवाल यह भी है कि क्या हावड़ा में असामाजिक गतिविधियों का इतिहास रहा है? ब्रिटिश दौर में हावड़ा एक समृद्ध औद्योगिक नगर था, लेकिन धीरे-धीरे यह 'कुली टाउन' बन गया. यहां कई झुग्गियां और बड़ा श्रमिक वर्ग था. पिलखाना बस्ती भी खास महत्व रखती है. मशहूर फिल्म 'सिटी ऑफ जॉय' के निर्देशक रोलान्ड जॉफी यहां शूटिंग के लिए आए थे. इस तरह यह इलाका पहले से ही चर्चित रहा है.
कांग्रेस शासन में जब सिद्धार्थ शंकर रे मुख्यमंत्री थे, तब हाबड़ा में नक्सली गतिविधियां भी होती थीं. उसी दौर में असामाजिक तत्वों का प्रभाव बढ़ा और राजनीति से उनका संबंध गहरा होता गया. ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा की सरकार में भी हावड़ा असामाजिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा.
हावड़ा में अपराध का विस्तार कब हुआ
सिद्धार्थ शंकर रे के कार्यकाल में राजनीति का अपराधीकरण गंभीर रूप ले चुका था. हावड़ा में रंगदारी और गैंगवार आम बात थी. साल 1984 में मेरी पत्रकारिता के करियर की शुरुआत हावड़ा से ही हुई. मैं शिबपुर में पला-बढ़ा. उस समय शिबपुर में दो आपराधिक गैंग सक्रिय थे, एक था गोरा मितिर का और दूसरा दूसरा नाबो बाजा का. दोनों के अपने-अपने इलाके थे. रंगदारी और असामाजिक गतिविधियां चरम पर थीं. पुलिस अधीक्षक सुल्तान सिंह की सख्ती ने दोनों गुटों की कमर तोड़ दी और उनके सरगनाओं की मौत हुई. लेकिन राजनीति और अपराध का गठजोड़ बना रहा.
कुछ अपराधियों ने युवा कांग्रेस के नेता उत्पल भौमिक की गोली मारकर हत्या कर दी थी. बिनोद आनंद बनर्जी उर्फ 'बिल्टू' नाम के एक युवा नेता भी राजनीति में सक्रिय थे.भौमिक और बिल्टू में प्रतिद्वंद्विता थी. उत्पल भौमिक सोमेन मित्रा के करीबी थे. वहीं बिल्टू को प्रियरंजन दासमुंशी का करीबी माना जाता था. बाद में बिल्टू की भी हत्या हो गई. स्थानीय अपराधियों और राजनेताओं के बीच संबंधों की चर्चा होती रही है.
बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री में हावड़ा का अपराध
बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री 'टॉलीवुड' में हाल ही में हावड़ा के अपराध जगत पर 'शिबपुर'नाम से एक फिल्म बनी है. इससे पता चलता है कि अपराध की छाया लंबे समय से हावड़ा पर रही है. 40 साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यह शहर इस दुष्चक्र से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया.ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि हावड़ा अपनी सांस्कृतिक पहचान क्यों खो बैठा?
दुर्भाग्य से हावड़ा नगर निगम में करीब एक दशक तक चुनाव ही नहीं हुए. इससे अवैध निर्माण, कर भ्रष्टाचार और रियल एस्टेट और लाइसेंस से जुड़ी अनियमितताएं तेजी से बढ़ीं. उत्तर हावड़ा के पिलखाना इलाके में कम्युनिस्ट शासन में माकपा नेता लगन देव सिंह का दबदबा था. वो प्रमोटरों और असामाजिक तत्वों को काबू में रखते थे. बाद में वही लगन देव सिंह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. आज वे बुजुर्ग हैं. माकपा के सत्ता से हटते ही कई तथाकथित 'बाहुबली' तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए. ये लोग स्थानीय विधायकों व पार्षदों के संरक्षण में काम करने लगे.हाबड़ा में यह एक तरह का सामाजिक-आर्थिक मॉडल बन गया. जब रोजगार के अवसर नहीं होते हैं तो 'बाहुबली' लोगों को अपनी समानांतर व्यवस्था में लगा देते हैं.
देश के 'शेफ़ील्ड' से तुलना पाने वाला हावड़ा आज अपराध,नागरिक सुविधाओं के अभाव और बाहुबलियों के उभार के लिए जाना जाता है. यह केवल एक शहर की कहानी नहीं है, बल्कि यह शासन व्यवस्था के गहरे संकट की झलक भी देता है. चुनाव में मतदाताओं के लिए इस सवाल को नजरअंदाज कर पाना आसान नहीं होगा.
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