सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल आरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जनरल या ओपन कैटेगरी सबके लिए खुली हुई है. इस श्रेणी में चयनित होने से किसी को इस आधार पर नहीं रोका जा सकता है कि वह आरक्षित श्रेणी का है. अदालत ने कहा कि इस तरह से आरक्षित श्रेणी के किसी अभ्यर्थी को ओपन कैटेगरी में चयनित होने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत दी गई समानता की गारंटी का उल्लंघन होगा. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही देश में एक बार फिर आरक्षण पर बहस शुरू हो गई है. आइए हम आपको बताते हैं कि आरक्षण क्या है और यह किस वर्ग को कितना मिलता है.
संविधान के किस अनुच्छेद के तहत मिलता है आरक्षण
भारत के संविधान का अनुच्छेद 15(4) और 15(5) राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नागरिकों (अनुसूचित जातियों, जनजातियों और ओबीसी) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्लूएस) के लिए विशेष प्रावधान (आरक्षण) की इजाजत देता है. यह इन वर्गों के लिए शिक्षा और सार्वजनिक नियुक्तियों में उनके उन्नति के लिए सकारात्मक पहल की वकालत करता है. संविधान के 103वें संशोधन (2019) के जरिए आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्लूएस) के लिए भी 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया. इस आरक्षण को वर्टिकल आरक्षण भी कहा जाता है.
आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की ओर से जारी एक एफएक्यू के मुताबिक केंद्र सरकार की अखिल भारतीय स्तर पर होने वाली सीधी भर्ती में अनुसूचित जाति को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति को साढ़ें सात फीसदी और अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण दिया जाता है. वहीं ओपेन कैटेगरी की भर्तियों में एससी को 16.66, एसटी को साढ़े सात और ओबीसी को 25.84 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. संविधान के 103वें संशोधन (2019) के बाद से आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्लूएस) को भी 10 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है. ईडब्लूएस को आरक्षण जनरल कैटेगरी के तहत ही दिया जाता है. महिलाओं, दिव्यांगों, पूर्व सैनिकों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों को भी आरक्षण दिया जाता है. इसे हॉरिजॉन्टल या क्षैतिज आरक्षण कहा जाता है. केंद्र सरकार की नौकरियों में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आश्रितों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है. लेकिन कई राज्य सरकारें यह आरक्षण देती हैं.
इस आरक्षण के बाद जो 50 फीसदी सीटें बचती हैं, उसे ओपन या जनरल कैटेगरी कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने इसी ओपेन कैटेगरी को लेकर फैसला सुनाया है. कार्मिक मंत्रालय की ओर से 1 जुलाई 1998 को जारी एक पत्र में इस कैटेगरी में एससी-एसटी वर्ग को शामिल करने को लेकर स्थिति साफ की गई थी. इसमें कहा गया था कि अगर एससी-एसटी वर्ग का कोई अभ्यर्थी आयु, अनुभव, परीक्षा में शामिल होने के मौके आदि को लाभ लिए बिना जनरल कैटेगरी से अधिक या बराबर नंबर लाता है तो उसे जनरल कैटेगरी में ही शामिल किया जाएगा. लेकिन अगर वह किसी छूट का लाभ लाकर जनरल कैटेगरी के बराबर नंबर लाता है तो उसे उसकी आरक्षित श्रेणी में ही शामिल किया जाए.

इसके अलावा इन वर्गों को आयु सीमा में भी छूट दी जाती है. केंद्र सरकार के मुताबिक सीधी भर्ती में एससी और एसटी को अधिकतम आयु सीमा में पांच साल की छूट प्रदान की जाती है. इसके अलावा उन्होंने फीस में भी छूट दी जाती है. इसमें उनसे या तो सामान्य कैटेगरी के उम्मीदवारों से कम फीस ली जाती है या फीस को शून्य कर दिया जाता है. इसी तरह से अन्य पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों को अधिकतम आयु में तीन साल की छूट दी जाती है. आरक्षित वर्गों को यह आरक्षण सरकारी नौकरी और शैक्षणिक संस्थानों में दिया जाता है.
आरक्षण की सीमा क्या है
सुप्रीम कोर्ट ने 16 नवंबर 1992 को सुनाए अपने एक फैसले में अधिकतम आरक्षण की सीमा तय कर दी थी. नौ जजों की संविधान पीठ ने इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में दिए अपने फैसले में कहा कि किसी भी हालत में आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए. इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को मिलने वाले आरक्षण को वैध बताया था. इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा था कि अनुच्छेद 16(4) पदोन्नति में आरक्षण प्रदान नहीं करता है, क्योंकि यह केवल नियुक्तियों में आरक्षण से संबंधित है. हालांकि अदालत ने फैसले की तारीख के पांच साल बाद तक पदोन्नति में आरक्षण जारी रखने की इजाजत दी थी.
सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए 50 फीसदी आरक्षण के कैप को दरकिनार करने की कोशिशें महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों ने की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें रद्द कर दिया. राजस्थान ने गुर्जर और महाराष्ट्र ने मराठा को आरक्षण देने का प्रयास किया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके आरक्षण को असंवैधानिक बता दिया. केवल तमिलनाडु ही आरक्षण की सीमा को बढ़ा पाने में कामयाब रहा है. तमिलनाडु में कुल आरक्षण 69 फीसदी है. दरअसल तमिलनाडु की आरक्षण व्यवस्था को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया है. इस अनुसूची में शामिल राज्य और केंद्र सरकार के कानूनों की न्यायिक समीक्षा संभव नहीं है. इस वजह से भारत में सबसे अधिक आरक्षण तमिलनाडु में दिया जाता है.
क्या आरक्षण मौलिक अधिकार है
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 24 अप्रैल, 1973 को दिए केशवानंद भारती मामले में फैसले के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किसी भी कानून की न्यायिक समीक्षा हो सकती है. इस फैसले में अदालत ने कहा था कि नौवीं अनुसूची के तहत कोई भी कानून यदि मौलिक अधिकारों या संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है तो उसकी न्यायिक समीक्षा हो सकती है. तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों में ओबीसी आरक्षण से जुड़े एक मामले की जून 2020 में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है. अदालत की इस टिप्पणी के बाद से आरक्षण से जुड़े सभी कानूनों को नौवीं अनुसूची में रखने की मांग की जा रही है. मौलिक अधिकार वे बुनियादी मानवाधिकार हैं जो नागरिकों के गरिमापूर्ण जीवन, स्वतंत्रता और सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी हैं. मौलिक अधिकार संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12-35) में वर्णित हैं.
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