- वाडिया गांव की महिलाएं इतिहास से थोपी गई भूमिकाओं से आजाद होने के लिए संघर्ष कर रही हैं.
- बनासकांठा जिले के इस 750 लोगों वाले गांव के पुरुष हर सुबह पालनपुर-थराद हाईवे पर जाते हैं.
- वे हाईवे पर काम की तलाश में नहीं, बल्कि गांव की महिलाओं के लिए ग्राहक बनाने के लिए लाइन में खड़े होते हैं.
बच्ची की 'सगाई' या वेश्यावृत्ति. इस 'वेश्याओं के गांव' की लड़कियों के सामने यही कड़वा विकल्प है. यहां लड़कियों की शादी सात साल की उम्र में ही तय कर दी जाती है ताकि वे उस जाल से बच सकें, जिसमें उनकी मांएं और दादी-नानियां फंस गईं थीं.
गुजरात के बड़े शहर अहमदाबाद से 200 किलोमीटर दूर और जेंडर इक्वालिटी (स्त्री-पुरुष समानता) की चाह रखने वाले भारत से बिल्कुल अलग, वाडिया गांव की महिलाएं इतिहास से थोपी गई भूमिकाओं से आजाद होने के लिए संघर्ष कर रही हैं. पीढ़ियों से, खानाबदोश जनजाति वाले इस गांव की महिलाओं को जबरन देह-व्यापार में धकेला जाता रहा है, जबकि पुरुष उनके एजेंट का काम करते हैं. यह सिलसिला आज भी जारी है.
धीरे-धीरे आ रहा बदलाव
एक परेशान करने वाली रस्म के तहत, बनासकांठा जिले के इस 750 लोगों वाले गांव के पुरुष हर सुबह पालनपुर-थराद हाईवे पर जाते हैं. वे हाईवे पर काम की तलाश में नहीं, बल्कि ट्रक ड्राइवरों, राहगीरों और आस-पास के गांवों व शहरों के पुरुषों को अपने गांव की महिलाओं के लिए ग्राहक बनाने के लिए लाइन में खड़े होते हैं.

अपनी बेटियों की सगाई करवाना यहां एक सुरक्षा-कवच माना जाता है; यह उन्हें देह-व्यापार में धकेले जाने से पहले गांव से बाहर शादी करने का एक मौका देता है. गांव में पली-बढ़ी 19 साल की एक लड़की इस टकराव की मिसाल है. उसकी मां और दादी, दोनों ही सेक्स वर्कर हैं. वह दूर के एक कॉलेज में नर्स बनने की पढ़ाई कर रही है.यह एक ऐसा सपना था, जो कभी नामुमकिन लगता था. उसकी शादी भी हो चुकी है; उसके दूल्हे का चुनाव तब किया गया था जब वह सिर्फ 11 साल की थी.
पीढ़ियों से भोग रहीं ये दंश
समाज सेवकों और कुछ परिवारों की पहल पर, आस-पास के गांवों या रिश्तेदारों की 7 से 12 साल की लड़कियों की सगाई तय की जाती है. गांव वालों ने एक बिना लिखा नियम माना है - जिन लड़कियों की सगाई या शादी हो चुकी है, उन्हें वेश्यावृत्ति में नहीं धकेला जाता. बाहर से आने वालों पर कड़ी नजर रखी जाती है. एक ग्रामीण ने बताया कि जिस्मफरोशी के धंधे में शामिल ज्यादातर औरतें घर के अंदर ही रहती हैं, जबकि परिवार के मर्द या दलाल उनके लिए ग्राहक लाते हैं. गांव के 750 निवासियों में लगभग 350 औरतें हैं.
पिता का पता न होने के कलंक की वजह से, वाडिया की औरतें पीढ़ियों तक कुंवारी ही रहीं.
सरकार ने 1963 में उनके परिवार को खेती की जमीन दी थी, लेकिन गांव में सिंचाई की सुविधाओं की कमी के कारण उन्हें सेक्स वर्क (देह व्यापार) में उतरना पड़ा. चंद्रा ने सेक्स ट्रेड से हुई कमाई से तीन बच्चों - दो बेटों और एक बेटी - की परवरिश की, लेकिन वह पक्का इरादा कर चुकी थीं कि उनके अतीत की परछाई उनके बच्चों, खासकर उनकी बेटी के भविष्य पर न पड़े.
2012 से आया बदलाव
2012 में बदलाव की एक उम्मीद जगी, जब पहला सामूहिक विवाह समारोह आयोजित किया गया. इससे पहले NGO ने कुछ परिवारों को अपनी बेटियों को जिस्मफरोशी के धंधे में न धकेलने के लिए मना लिया था. तब से, वाडिया में हर साल ऐसी शादियां या सगाई होती रही हैं.
NGO 'विचर्ता समुदाय समर्थन मंच' (VSSM) की संस्थापक मित्तल पटेल, जिन्होंने सामूहिक विवाह आयोजित करने की पहल की थी, ने कहा कि इस प्रथा ने कई लड़कियों को जबरदस्ती वेश्यावृत्ति में धकेले जाने से बचाया है.
मित्तल ने PTI को बताया, "एक बार जब लड़कियों की सगाई हो जाती है, तो लड़के का परिवार भी उनकी सुरक्षा करने लगता है. बोरवेल और झीलों को फिर से चालू करने, खेती की जमीन को उपजाऊ बनाने और परिवारों को अपना कारोबार शुरू करने के लिए बिना ब्याज के लोन देने जैसी कोशिशों से यहां रोजगार के दूसरे जरिया बने हैं. हम इसे 12-13 साल की कम उम्र की लड़कियों को वेश्यावृत्ति में धकेले जाने से रोकने के एक तरीके के तौर पर देखते हैं."
पटेल के मुताबिक, कुछ एक्टिविस्ट ने बाल विवाह को बढ़ावा मिलने पर चिंता जताई है, लेकिन वेश्यावृत्ति की तुलना में बच्चे की सगाई बेहतर है, और आखिरकार बिना शादी या सम्मानजनक जिंदगी जीने से तो यह कहीं बेहतर है. कुछ माता-पिता के लिए, यह अपनी बेटी को शिक्षा और बेहतर जिंदगी देने का एक जरिया भी है. जैसे रमेशभाई सारणिया, जिनकी दो बेटियां हैं; एक की सगाई आठ साल की उम्र में और दूसरी की 11 साल की उम्र में हुई थी.
सारणिया समुदाय का इतिहास
लोककथाओं के अनुसार, सारणिया समुदाय एक खानाबदोश जनजाति है जो कभी मेवाड़ के महाराणा प्रताप की सेना के साथ यात्रा करती थी. जहां पुरुष ढाल और तलवार जैसे हथियारों को धार देते थे, वहीं महिलाएं सैनिकों का मनोरंजन करती थीं. कहा जाता है कि जब 1947 में भारत को आजादी मिली, तो सारणिया लोगों का काम छूट गया और कोई दूसरा विकल्प न होने के कारण वे गुजारा करने के लिए वेश्यावृत्ति के धंधे में लौट आए. 'वेश्याओं के गांव' का ठप्पा हटाने के लिए संघर्ष कर रहे वाडिया गांव के लोगों को वर्तमान की लड़ाई और भविष्य की चुनौतियों का सामना करते हुए, अभी भी अपने अतीत से निपटना है.
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