- गुजरात हाई कोर्ट ने पिता को तीनों बच्चों के लिए हर महीने भरण-पोषण राशि तीन हजार रुपये देने का आदेश दिया है
- पिता दूसरी शादी के बाद भी अपने पहले विवाह के बच्चों की भरण-पोषण जिम्मेदारी से नहीं बच सकता है
- अदालत ने पिता की मासिक आय करीब चौदह हजार छह सौ रुपये और उसके कर्ज और EMI का विवरण भी माना है
गुजरात हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की. हाई कोर्ट ने कहा कि पिता भले अपने लोन या EMI का भुगतान कर रहा हो पर अपने बच्चों के भरण‑पोषण की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता. अदालत ने व्यक्ति को आदेश दिया कि वह अपने तीनों बच्चों को हर महीने 3,000 रुपये दे.जस्टिस गीता गोपी इस मामले की सुनवाई कर रही थीं.पति ने अदालत से उस आदेश को वापस लेने की मांग की थी, जिसमें उसके पहले विवाह से हुए तीन बच्चों के लिए भरण‑पोषण राशि बढ़ाई गई थी.उसने यह भी कहा था कि बच्चों की मां से वित्तीय जानकारी (affidavit) मांगी जाए.
गुजरात की अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में पिता को अपनी पहली पत्नी के लिए भरण‑पोषण देने का आदेश नहीं दिया गया है, लेकिन बच्चों के पालन‑पोषण की जिम्मेदारी किसी भी तरह के कर्ज या EMI से कम नहीं हो सकती. पिता बच्चों के खाना, कपड़ा, रहने की जगह, इलाज और पढ़ाई (ट्यूशन) जैसे बुनियादी खर्चों से मुंह नहीं मोड़ सकता.
मामले की कानूनी कार्यवाही और अदालत के निर्देश
➤ 3 जुलाई 2024 को तीन नाबालिग बच्चों (ट्रिपलेट्स) की ओर से उनकी मां के माध्यम से दाखिल भरण‑पोषण बढ़ाने की याचिका पर आदेश पारित किया गया था.उस समय बच्चों की उम्र करीब 9 वर्ष थी.
➤ गुजरात हाई कोर्ट ने पाया कि पति जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में वाटर बेयरर (जलवाहक) के रूप में कार्यरत है और उसकी मासिक आय करीब 14,800 रुपये है.साथ ही वह अपनी दूसरी पत्नी के लिए लिए गए कर्ज की किस्तें (EMI) भी चुका रहा है.
➤ अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि व्यक्ति ने दूसरी शादी कर ली है और वह एक अस्थायी नौकरी से अतिरिक्त आय भी अर्जित कर रहा है.
➤ तीनों बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने भरण‑पोषण राशि 1,800 रुपये प्रति बच्चे से बढ़ाकर 2,500 रुपये प्रति बच्चे कर दी.
➤ पति के वकील ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार, यदि पत्नी अपनी आर्थिक स्थिति का खुलासा (फाइनेंशियल डिस्क्लोजर) नहीं करती है, तो भरण‑पोषण का आदेश रद्द किया जाना चाहिए.
➤ इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल की.सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मामला फिर से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया (remit back).
➤ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, दोनों पक्षों को अपनी‑अपनी वित्तीय स्थिति के शपथपत्र (affidavits) दाखिल करने के निर्देश दिए गए.
➤ अदालत ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता (मेडिएशन) की भी कोशिश की, लेकिन यह प्रयास असफल रहा.
मां का हलफनामा
गुजरात हाई कोर्ट में पेश किए गए हलफनामे में मां ने बताया कि तीनों बच्चों के रहने का खर्च 4,500 रुपये प्रति माह है, जबकि उनकी स्कूल फीस 9,000 रुपये है.इस तरह सिर्फ इन दोनों मदों पर कुल 13,500 रुपये मासिक खर्च होता है, इसके अलावा अन्य खर्च अलग हैं.
हलफनामे में यह भी बताया गया कि बच्चों के मेडिकल खर्च लगभग 1,500 रुपये प्रति माह हैं. वर्तमान में बच्चे कक्षा 11 में पढ़ रहे हैं, और उनकी ट्यूशन फीस करीब 20,000 रुपये है, हालांकि एक बच्चा ट्यूशन नहीं लेता है. मां ने अपनी आय का भी खुलासा किया और बताया कि वह बालवाटिका में प्राथमिक शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं, जहां उन्हें 88,368 रुपये मासिक वेतन मिलता है.साथ ही उन्होंने बताया कि वह हर महीने 12,779 रुपये लोन EMI,3,488 रुपये अन्य सक्रिय लोन और 2,400 रुपये पेट्रोल खर्च के तौर पर देती हैं. मां ने यह भी बताया कि वह अकेले रहती हैं और उन्होंने दोबारा शादी नहीं की है.
पिता के हलफनामे में क्या?
गुजरात हाई कोर्ट में दिए गए हलफनामे में पिता ने अपनी मासिक खर्च का विवरण पेश किया है.इसके अनुसार:
➔उनके कुल मासिक खर्च 10,000 रुपये हैं
➔उनकी मां को 8,000 रुपये पेंशन मिलती है
➔आश्रित व्यक्ति (dependent) पर 3,500 रुपये खर्च बताए गए हैं
अदालत की ये बातें भी ध्यान देने वालीं
➤ अदालत ने कहा कि तीनों बच्चों की पढ़ाई और इलाज का सारा खर्च मां ही उठा रही है, और वही उनका मुख्य सहारा है.
➤ गुजरात हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता को भले ही पहली पत्नी के लिए कोई भरण‑पोषण देने का आदेश न हो, लेकिन बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी किसी भी EMI या कर्ज के भुगतान से कम नहीं हो सकती.
➤ अदालत ने कहा कि पिता को अपनी आय का अनुपातिक बंटवारा करना होगा जिसमें पहले विवाह से तीन बच्चे (ट्रिपलेट्स),
दूसरी पत्नी और दूसरी पत्नी से हुआ एक बेटा शामिल है. इस प्रकार कुल 6 सदस्यों (यूनिट) के बीच खर्च का संतुलन माना गया.
➤ अदालत ने यह भी कहा कि पिता की मां को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा, क्योंकि वह पेंशन प्राप्त कर रही हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं.
➤ 16 जुलाई 2019 की वेतन अधिसूचना के आधार पर पिता की मासिक आय 14,600 रुपये मानी गई, और हाई कोर्ट ने अपने 5 मई के आदेश में प्रत्येक बच्चे के लिए 1,000 रुपये प्रतिमाह भरण‑पोषण तय किया.
यह भी पढ़ें- जूनागढ़ में दर्दनाक हादसा: विलिंग्डन डैम में डूबे उत्तर प्रदेश के तीन युवक, खुशियां मातम में बदलीं
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं