ये कहानी है एक ऐसे ब्रांड की, जिसकी शुरुआत कानपुर की तंग गलियों से बहुत ही साधारण तरीके से हुई थी, और आज वो देश के घर-घर का जाना-माना नाम बन चुका है. आज हम बात कर रहे हैं 'गोल्डी मसाले' की. यूपी और बिहार में शायद ही कोई ऐसा घर हो, जहां इस मसाले की महक न पहुंची हो. आज इस 'जीरो से हीरो' बनने में दो दोस्तों की कहानी. जिनका एक ब्रांड देश की धड़कन बन गया.
जब मसालों में मिलाया गया नया नजरिया
बात है 1980 की. कानपुर में दो दोस्त, सोम प्रकाश गोयनका और सुरेंद्र गुप्ता ने खड़े मसालों का व्यापार शुरू किया. धीरे-धीरे काम बढ़ा, लेकिन जल्द ही इन दोनों दोस्तों को समझ आ गया कि सिर्फ खड़े मसाले बेचने से बाजार पर राज नहीं किया जा सकता. यहीं से एक विचार ने जन्म लिया- क्यों न मसालों को पीसकर और अच्छी तरह पैक करके बेचा जाए? बस, यहीं से गोल्डी मसाले ने अपनी पहली बड़ी छलांग लगाई. 2002 आते-आते, यूपी और बिहार में इनका डंका बजने लगा और पुराने वफादार कर्मचारियों की मेहनत से कंपनी का सालाना टर्नओवर 60 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.

इसे भारत का ब्रांड बना दो... बाप ने लंदन से बुलाया बेटा
कहते हैं न कि एक ठहराव के बाद ऊंची उड़ान भरने के लिए बिजनेस में नया खून और नया नजरिया चाहिए होता है. 2002 में सोम प्रकाश गोयनका ने लंदन में एमबीए और नौकरी कर रहे अपने बेटे आकाश गोयनका को वापस कानपुर बुला लिया. पिता का विजन साफ था- "हमें इस ब्रांड को 10-20 साल बाद भारत का सबसे बड़ा ब्रांड बनाना है."
सब कुछ राम भरोसे... बेटे के माथा ठनका
लंदन की चकाचौंध से लौटकर आकाश ने जब फैमिली बिजनेस देखा, तो उनका माथा ठनका. सब कुछ राम-भरोसे चल रहा था. कोई सिस्टम नहीं, कोई टेक्नोलॉजी नहीं. उन्होंने तय किया कि कंपनी में 'ईआरपी' (ERP) यानी एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग सिस्टम लाया जाएगा. अब सबसे बड़ी चुनौती ये थी कि जो स्टाफ सालों से पुरानी शैली में काम कर रहा था, उनके लिए कंप्यूटर और टेक्नोलॉजी किसी एलियन से कम नहीं थे. लेकिन आकाश ने हार नहीं मानी. पूरे चार साल लग गए सिस्टम को पटरी पर लाने में, लेकिन जब पहिया घूमा, तो कंपनी ने रफ्तार पकड़ ली.

आकाश गोयनका, सुदीप गोयनका और शुभम गुप्ता
600 करोड़ का आंकड़ा
2006 आते-आते आकाश के छोटे भाई सुदीप गोयनका और सुरेंद्र गुप्ता के बेटे सुमित गुप्ता भी कंपनी से जुड़ गए. अब कंपनी के पास एक युवा त्रिमूर्ति थी, जिनकी आंखों में आसमान छूने का सपना था. नतीजा? 2012 तक टर्नओवर 260 करोड़ पहुंच गया और 2018 तक 18 राज्यों में फैलकर ये आंकड़ा लगभग 590 करोड़ रुपये को छू गया.
जब मुंबई ने दिखाया आईना और 'भाईजान' की एंट्री
बिजनेस का सफर कभी सीधी सड़क नहीं होता. 2016 से 2018 के बीच कंपनी की ग्रोथ एक जगह आकर रुक गई. सेल्स आगे बढ़ ही नहीं रही थी. तभी आकाश को 2010 का एक वाकया याद आया. मुंबई के एक बड़े सुपरमार्केट ने उनके मसालों को यह कहकर रिजेक्ट कर दिया था कि "आप तो सिर्फ एक रीजनल ब्रांड हैं, कल रहेंगे या नहीं, क्या पता."
यह बात उनके दिल में तीर की तरह चुभी थी. उन्हें समझ आ गया कि 18 राज्यों में माल तो जा रहा है, लेकिन ब्रांड का कोई चेहरा नहीं है. फिर 2019 में गोल्डी मसाले ने खेला अपना सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक. उन्होंने बॉलीवुड स्टार सलमान खान को अपना ब्रांड एंबेसडर बना लिया. ये कोई छोटा-मोटा कदम नहीं था. हर पैकेट पर सलमान खान की तस्वीर छपने लगी. नतीजा देखकर बाजार के पंडित भी हैरान रह गए. जो टर्नओवर 600 करोड़ पर अटका था, वो अगले ही साल यानी 2020 में दोगुना होकर 1350 करोड़ रुपये पहुंच गया.
रुकना मना है: कोविड से लेकर आज तक
2020 में जब कोरोना ने दुनिया को रोका, तो गोल्डी मसाले रुके नहीं. उन्होंने बाजार की नब्ज पकड़ी और 'वन-वन' नाम से नूडल्स और पास्ता लॉन्च कर दिए. आज गोल्डी मसाला सिर्फ मसालों का ब्रांड नहीं है. ये सॉस, नूडल्स और पूजा के सामान का एक पूरा साम्राज्य है. आज कंपनी का टर्नओवर 2500 से 3000 करोड़ रुपये के बीच है और सबसे खास बात, 2016 से ही ये कंपनी पूरी तरह से कर्ज-मुक्त है.
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