- संसद में CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष ने महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी पूरी कर ली है
- महाभियोग नोटिस पर 193 सांसदों ने साइन किए हैं, जिसमें तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल शामिल हैं
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर पक्षपातपूर्ण आचरण और चुनावी धोखाधड़ी में बाधा डालने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं
भारत के इतिहास में यह पहली बार देखने को मिल रहा है, जब मुख्य निर्वाचन अधिकारी ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी हो रही है. विपक्ष ने इसकी पूरी तैयारी कर ली है, मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ महाभियोग नोटिस पर 193 सांसदों के साइन हो चुके हैं. संसद के किसी एक सदन में आज विपक्ष नोटिस दे सकता है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ये प्रस्ताव लेकर आ रही हैं, जिसका कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां समर्थन कर रही हैं. आखिर, ममता बनर्जी क्यों मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ महाभियोग नोटिस ला रही हैं? मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर उन्होंने क्या-क्या आरोप लगाए हैं, आइये जानते हैं.
200 सांसदों ने नोटिस पर किये साइन
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के प्रस्ताव के लिए 200 से अधिक सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं. सूत्र के अनुसार, लोकसभा के 130 सांसदों ने और राज्यसभा के 63 सांसदों से ज्यादा ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं. नोटिस शुक्रवार को संसद के किसी एक सदन में पेश किए जाने की संभावना है. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इसे किस सदन में पेश किया जाएगा. विपक्ष के एक नेता ने बताया कि सांसदों ने नोटिस को लेकर काफी उत्साह दिखाया और आवश्यक संख्या पूरी हो जाने के बाद भी बृहस्पतिवार को कई सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किये
महाभियोग प्रस्ताव लाने का क्या है नियम?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के नियमों के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस पर लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं. एक अन्य सूत्र के अनुसार, इस नोटिस पर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया' के सभी दलों के सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के सांसदों ने भी नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं, हालांकि, पार्टी अब आधिकारिक रूप से इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है.
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ज्ञानेश कुमार खिलाफ ये आरोप
देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए इस तरह का नोटिस दिया गया है. एक सूत्र के अनुसार, नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ ये आरोप लगाए गए हैं.
- मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पद पर रहते हुए पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण.
- चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जानबूझकर बाधा डालना.
- बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करना.
- SIR के जरिये वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की साजिश.
- CEC की केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को लाभ पहुंचाने की कोशिश.
- चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तृणमूल कांग्रेस से दुर्व्यवहार करने का आरोप.
ममता बनर्जी का SIR से दिक्कत?
विपक्षी दलों ने कई मौकों पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की मदद करने का आरोप लगाया है, खासकर मतदाता सूचियों की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर. उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की जा रही है. खास तौर पर पश्चिम बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई गई है. मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाया है.
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क्या है मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया महाभियोग वही है, जो सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए अपनाई जाती है. महाभियोग केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही लगाया जा सकता है. सीईसी को हटाने का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे पारित होने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है. सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत.
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसी तरीके और आधार पर पद से हटाया जा सकता है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को पद से हटाया जा सकता है. न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, यदि संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव की सूचना एक ही दिन दी जाती है, तो दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत होने तक कोई समिति गठित नहीं की जाएगी. दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से एक समिति का गठन किया जाएगा. इस समिति में प्रधान न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय के कोई न्यायाधीश, 25 उच्च न्यायालयों में से किसी एक के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे. समिति की कार्यवाही किसी अदालती कार्यवाही की तरह होती है, जिसमें गवाहों और आरोपियों से जिरह की जाती है. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को भी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा.
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महाभियोग प्रस्ताव अगर आता है, तो नोटिस सदन में पेश करने के 14 दिनों के बाद इस पर सदन में चर्चा होगी. अब देखना ये होगा कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इसी सत्र में यह महाभियोग आ पाता है या नहीं? संसद का मौजूदा बजट सत्र 2 अप्रैल तक है.
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