- मणिपुर के नागरिक संगठनों ने 2027 की जनगणना टालकर पहले 1951 के आंकड़ों के आधार पर NRC तैयार करने की मांग की है
- इनका कहना है कि अवैध प्रवासन, आबादी में बदलाव, नागरिकता से जुड़े सवालों का समाधान जनगणना से पहले होना जरूरी है
- विवाद इसलिए अहम है क्योंकि जनगणना के आंकड़ों का असर भविष्य के परिसीमन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है
मणिपुर में 2027 की जनगणना को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. राज्य के 14 नागरिक संगठनों और अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी NRC को अपडेट किया जाए और उसके बाद ही जनगणना कराई जाए. इन संगठनों का कहना है कि जब तक यह साफ नहीं होगा कि राज्य में कौन भारतीय नागरिक है और कौन अवैध तरीके से आया है, तब तक जनगणना के आंकड़े भरोसेमंद नहीं माने जा सकते.
आखिर मांग क्या है?
इन संगठनों की सबसे बड़ी मांग है कि मणिपुर में NRC को 1951 के आंकड़ों को आधार बनाकर अपडेट किया जाए. उनका तर्क है कि 1951 की जनगणना मणिपुर के भारत में विलय के बाद की शुरुआती जनगणना थी और इससे राज्य के मूल निवासियों और बाद में आए लोगों की पहचान में मदद मिल सकती है.
संगठनों का आरोप है कि म्यांमार से लंबे समय से अवैध प्रवासन के कारण राज्य के कुछ इलाकों में आबादी का स्वरूप बदला है. उनका कहना है कि पहले नागरिकता की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए, फिर आबादी की गिनती होनी चाहिए.
Census और NRC में फर्क क्या है?
यही इस पूरे विवाद को समझने की सबसे जरूरी बात है. जनगणना का काम देश या राज्य में रहने वाली आबादी की गिनती करना है. इसमें घर, परिवार, आबादी और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती है. वहीं NRC का मकसद भारतीय नागरिकों का रजिस्टर तैयार करना है.
तो जहां जनगणना में ये देखा जाता है कि कितने लोग और किस तरह की आबादी यहां रह रही है. वहीं NRC में यह देखा जाता है कि जो लोग भारत के किसी इलाके में रह रहे हैं उनमें से कौन भारतीय नागरिक है?
मणिपुर के मांग करने वाले संगठन चाहते हैं कि पहले नागरिकता की पहचान हो और उसके बाद जनगणना हो. उनका डर है कि अगर पहले जनगणना हो गई तो बाद में तैयार होने वाले जनसंख्या आंकड़े भविष्य की राजनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं.
मामला सिर्फ जनगणना तक सीमित क्यों नहीं है?
मणिपुर में यह मुद्दा परिसीमन यानी निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा है. संगठनों का कहना है कि आबादी के आंकड़ों का इस्तेमाल भविष्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय करने में हो सकता है. इसलिए अगर किसी इलाके की आबादी में अवैध प्रवास के कारण बदलाव हुआ है, तो उसका असर आगे की राजनीति और संसाधनों के बंटवारे पर भी पड़ सकता है.
इसके अलावा मणिपुर में 2023 से जारी जातीय संघर्ष के कारण बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं. नागरिक संगठनों का तर्क है कि ऐसे समय में जनगणना कराने पर लोगों की वास्तविक स्थायी आबादी का सही आकलन मुश्किल हो सकता है.
क्या सभी समुदाय NRC की मांग से सहमत हैं?
दरअसल, कुछ मैतेई और नगा संगठनों की ओर से NRC पहले कराने की मांग की जा रही है, लेकिन कुकी-जो काउंसिल ने इसका विरोध किया है. उसका कहना है कि पहले निष्पक्ष जनगणना होनी चाहिए, ताकि राज्य की वास्तविक आबादी का तथ्य सामने आए. उसके बाद NRC जैसे मुद्दे पर विचार किया जा सकता है. ऐसे में यह केवल केंद्र और मणिपुर सरकार के बीच का प्रशासनिक मुद्दा नहीं बल्कि अलग-अलग समुदायों के बीच भी इसे लेकर मतभेद हैं.
अभी जनगणना की स्थिति क्या है?
अंग्रेजी अखबार द ट्रिब्यून की खबर के मुताबिक मणिपुर में 2027 की जनगणना की तैयारियां विरोध के कारण प्रभावित हुई हैं. 17 अगस्त से शुरू होने वाली स्व-गणना की प्रक्रिया और कर्मचारियों के प्रशिक्षण को लेकर भी रुकावट की खबरें सामने आई हैं. घर-घर जाकर मकान सूचीकरण का कार्यक्रम 1 से 30 सितंबर के बीच होना है, लेकिन राज्य में इसे लेकर अभी असमंजस बना हुआ है.
वहीं नॉर्थ ईस्ट नाउ लिखता है कि 14 नागरिक संगठनों का प्रतिनिधिमंडल दिल्ली जाकर केंद्रीय नेताओं और अधिकारियों से मिल चुका है और उसने जनगणना टालने तथा पहले NRC अपडेट करने की मांग दोहराई है.
ऐसे में आगे क्या हो सकता है?
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है. उसे एक तरफ जनगणना की प्रक्रिया को समय पर पूरा करना है, तो दूसरी तरफ मणिपुर में नागरिकता, अवैध प्रवासन, विस्थापन और समुदायों के बीच भरोसे से जुड़े सवालों का समाधान भी करना है.
यहां सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जनगणना को नागरिकता जांच से अलग रखते हुए भी मणिपुर की उन चिंताओं को कैसे दूर किया जाए, जिनका सीधा संबंध राज्य की आबादी, पहचान और भविष्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा है.
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