तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का अमेरिका दौरा रद्द हो गया है. भारत सरकार ने उन्हें अमेरिका जाने की इजाजत नहीं दी. अब ऐसा कहा जा रहा है कि सीएम रेवंत रेड्डी को अमेरिका जाने के लिए पॉलिटिकल क्लीयरेंस नहीं मिली है. यहां आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर पॉलिटिकल क्लीयरेंस क्या होती है और इसके नियम क्या होते हैं.
पॉलिटिकल क्लीयरेंस का क्या मतलब?
पॉलिटिकल क्लीयरेंस का मतलब होता है विदेश मंत्रालय से विदेश जाने की मंजूरी लेना. कोई भी सरकारी अधिकारी या जनप्रतिनिधि अगर सरकारी या किसी दूसरे काम से विदेश जाता है, तो उसे विदेश मंत्रालय से मंजूरी लेनी पड़ती है.
समझने वाली बात यह है कि विदेश मंत्रालय के पास हर महीने सैकड़ों अर्जियां आती हैं. फिर बात चाहे मंत्रालयों की हो, सचिवों की हो, अधिकारियों की हो या दूसरे सरकारी लोगों की, इन सभी के विदेश जाने के प्रस्ताव इसमें शामिल रहते हैं.
कैसे तय होती है पॉलिटिकल क्लीयरेंस?
अब विदेश मंत्रालय को देखना होता है कि कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि किस काम के लिए विदेश जाना चाहता है. जिस कार्यक्रम में उसे शामिल होना है, वहां दूसरे देशों के कितने लोग शामिल हो रहे हैं, साथ ही यह समझने की कोशिश होती है कि यात्रा का निमंत्रण किसने दिया है. इसके अलावा जिस देश का दौरा करना है, उसके साथ वर्तमान में भारत के रिश्ते कैसे हैं, यह भी देखा जाता है. इन सभी पहलुओं पर मंथन करने के बाद ही पॉलिटिकल क्लीयरेंस दी जाती है.
वैसे, 2016 के बाद से एक बड़ा बदलाव भी हो चुका है. अब कोई भी जनप्रतिनिधि या अधिकारी ऑनलाइन माध्यम से भी अपने विदेशी दौरे के लिए पॉलिटिकल क्लीयरेंस के लिए आवेदन कर सकता है.
अब रेवंत रेड्डी के मामले में क्या हुआ है?
मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को अमेरिका जाने के लिए पॉलिटिकल क्लीयरेंस नहीं मिली है. यहां बात चाहे मुख्यमंत्री की हो या फिर राज्य सरकार के किसी मंत्री की या फिर केंद्र शासित प्रदेश के मंत्री की, उन्हें सबसे पहले अपनी किसी भी विदेश यात्रा की जानकारी कैबिनेट सचिवालय और विदेश मंत्रालय को देनी होती है.
6 मई 2015 को कैबिनेट सचिवालय का एक सर्कुलर भी सामने आया था. उस सर्कुलर के अनुसार पॉलिटिकल क्लीयरेंस और FCRA क्लीयरेंस अनिवार्य होता है. FCRA का मतलब होता है Foreign Contribution Regulation Act.
किन मंत्रालयों से लेनी होती है मंजूरी?
वैसे किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री या राज्य के मंत्री को सिर्फ विदेश मंत्रालय से ही नहीं, बल्कि Department of Economic Affairs यानी DEA से भी मंजूरी लेनी होती है. ऐसे में विदेश यात्रा की एक अर्जी DEA के सचिव को भी दी जाती है. यहां भी एक जरूरी प्रक्रिया है. किसी भी विदेश जाने का प्रस्ताव तभी आगे बढ़ता है, जब विदेश मंत्रालय पहले उसे अपने स्तर पर मंजूरी दे चुका हो.
पहले किसी CM की विदेश यात्रा रद्द हुई है?
पॉलिटिकल क्लीयरेंस की वजह से किसी नेता की विदेश यात्रा रद्द होना कोई नई बात नहीं है. कई ऐसे उदाहरण सामने आते हैं, जब किसी कारण से विदेश यात्रा रोक दी जाती है. यह बात NDA और UPA दोनों सरकारों के दौर की है.
उदाहरण के लिए, 2022 में दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सिंगापुर यात्रा रद्द हुई थी. तब उन्हें सरकार की तरफ से वहां जाने की मंजूरी नहीं मिली थी.
इसी तरह अक्टूबर 2019 में भी अरविंद केजरीवाल को एक सम्मेलन में जाने की मंजूरी नहीं मिली थी. बाद में उन्होंने उस सम्मेलन को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए संबोधित किया.
अगर UPA दौर की बात करें, तो तब भी असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को अमेरिका और इजरायल जाने की मंजूरी नहीं मिली थी. इसके अलावा झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को भी UPA सरकार ने थाईलैंड जाने की इजाजत नहीं दी थी
ऐसे में तेलंगाना के मुख्यमंत्री का अमेरिका दौरा रद्द होना कोई नई बात नहीं है. पहले भी कई नेताओं को इस तरह पॉलिटिकल क्लीयरेंस नहीं दी गई है.
केंद्रीय मंत्रियों को लेकर क्या नियम?
वैसे, अगर किसी केंद्रीय मंत्री को विदेश दौरे पर जाना हो, तो उन्हें भी सबसे पहले विदेश मंत्रालय से पॉलिटिकल क्लीयरेंस लेनी होती है. इसके बाद अंतिम मंजूरी प्रधानमंत्री को देनी होती है.
अगर कोई लोकसभा सांसद विदेश यात्रा पर जा रहा है, तो उसे लोकसभा अध्यक्ष से मंजूरी लेनी पड़ती है. वहीं, अगर कोई राज्यसभा सांसद है, तो उसे राज्यसभा के सभापति यानी भारत के उपराष्ट्रपति से मंजूरी लेनी होती है.
कितने दिन पहले मंजूरी लेनी होती है?
अगर किसी जनप्रतिनिधि को ऐसी विदेशी यात्रा पर जाना है, जिसके लिए Screening Committee of Secretaries और प्रधानमंत्री की मंजूरी जरूरी है, तो प्रस्ताव यात्रा से कम से कम 15 दिन पहले पहुंच जाना चाहिए. हालांकि किसी भी स्थिति में यह प्रस्ताव यात्रा की तारीख से कम से कम 5 दिन पहले संबंधित मंत्रालय तक पहुंचना जरूरी है.
वैसे सांसदों को लेकर कहा जाता है कि अगर वे निजी कारण से विदेश यात्रा करते हैं, तो उन्हें लोकसभा या राज्यसभा सचिवालय को इसकी जानकारी देना अनिवार्य नहीं है.
जजों की विदेश यात्रा को लेकर क्या नियम?
अगर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के कोई जज आधिकारिक विदेश यात्रा पर जाते हैं तो सबसे पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI की मंजूरी लेनी होती है. इसके बाद कानून मंत्रालय के न्याय विभाग से भी मंजूरी लेनी पड़ती है. कुछ मामलों में गृह मंत्रालय की मंजूरी भी जरूरी होती है.
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