करूणा की प्रतिमूर्ति और आवारा पशुओं की साथी – दिव्या पुरी

दिल्ली की न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में पेशे से ऑडिटर और जानवरों को बचाने वाली 36 साल की दिव्या पुरी रहती हैं. साल 2012 से ही वह आवारा पशुओं को खाना खिला रही हैं.

नई दिल्ली :

दिल्ली की न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में पेशे से ऑडिटर और जानवरों को बचाने वाली 36 साल की दिव्या पुरी रहती हैं. साल 2012 से ही वह आवारा पशुओं को खाना खिला रही हैं. कोरोना के समय भी जब लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकल रहे थे  तब भी वह आवारा पशुओं को खाना खिला रही थी.

दिव्या हमें बताती हैं कि पिता की दुखद मृत्यु के बाद यह कैसे शुरू हुआ. वो कहती हैं,” दुर्भाग्य से लगभग 9 साल पहले कैंसर से मेरे पिता की मृत्यु हो गई थी. उसके बाद उनके द्वारा छोड़े गए शून्य से बाहर निकलने के लिए हमने और अधिक जानवरों को खिलाना शुरू कर दिए. मेरी मां अवसाद में चली गई और यही वो तरीका था जिसके जरिए वो दुःख से निपट सकती थीं.”

इसके बाद उन्होंने अपने पिता के नाम पर करण पुरी फाउंडेशन की स्थापना की. "फाउंडेशन मेरी माँ की एक कोशिश थी क्योंकि वह मेरे पिता की प्राथमिक देखभाल करने वाली थीं और उनके निधन के बाद वह जीवन में एक कठिन दौर से गुज़री. आवारा पशुओं को खिलाना ही एक तरीका था जिससे वो अपने दुखों से निपट पाती थी. हमने धीरे-धीरे भोजन कराने की अपनी क्षमता में वृद्धि की."

लेकिन त्रासदी ने दिव्या को दूसरी बार झटका दिया. कोरोना की घातक दूसरी लहर की चपेट में दिव्या और उनकी मां दोनों आ गई थीं. दो अलग-अलग अस्पतालों में दोनों को भर्ती कराया गया. 13 दिनों तक आईसीयू में कोविड-19 से जूझने के बाद दिव्या की मां चल बसीं.

"अस्पताल के बिस्तर पर भी वो पूछती रही - खाना दिया कुत्तों को?  बस स्टाफ को बुलाओ और जा कर देको कि खाना पकाया जा रहा है या नहीं. उनकी हालत बिगड़ने लगी और अंत तक वह इसलिए ही चिंतित रहीं कि कुत्तों को खिलाना जारी रहना चाहिए," दिव्या ने कहा.

आज की तारीख में करण पुरी फाउंडेशन 75 किलोग्राम चावल और 45 किलोग्राम चिकन तैयार करता है और हर दिन कम से कम 400 आवारा पशुओं को खिलाता है. फाउंडेशन ये सुनिश्चित करता है कि 5 किमी के दायरे में कोई भी आवारा कुत्ता भूखा न रहे.

ऐसे समय में जब पूरा देश लॉकडाउन के दौर से गुजर रहा था तो दिव्या और उनकी मां ने आवारा जानवरों को बचाने और उन्हें खिलाने के लिए दिल्ली से दूर-दूर तक की यात्रा की. यह वह करुणा है जिसे दिव्या आज अपनी माँ के बारे में सोचते हुए याद करती है – मेरी मां एक दयालु आत्मा थी जिसने उन जानवरों के जीवन और अधिकारों की परवाह की जिनके पास कहीं जाने के लिए कोई जगह नहीं है.”

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दिव्या ने अपने माता-पिता को खो दिया.  एक को कैंसर हो गया तो दूसरे को कोरोना. लेकिन उन्होंने दयालुता की अपनी विरासत को आगे बढ़ाने का फैसला किया. आवारा जानवरों की देखभाल की औऱ उन्हें खिलाया भी. निस्संदेह, दिव्या जैसी नायिका समाज के लिए एक उदाहरण हैं कि जब आपके पास कुछ भी नहीं है तब भी समाज को वापस देने के लिए आपके पास कुछ न कुछ तो है ही.