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विवादित सामग्री तो मंगल ग्रह पर भी... वृंदावन के कथावाचक अनिरुद्धाचार्य से दिल्ली हाई कोर्ट, पढ़ें पूरी बहस

दिल्ली हाई कोर्ट ने धार्मिक वक्ता अनिरुद्धाचार्य को व्यक्तित्व अधिकारों का अंतरिम संरक्षण दिया है और कहा कि आलोचना का अधिकार सभी को है.

विवादित सामग्री तो मंगल ग्रह पर भी... वृंदावन के कथावाचक अनिरुद्धाचार्य से दिल्ली हाई कोर्ट, पढ़ें पूरी बहस
  • दिल्ली हाई कोर्ट ने धार्मिक वक्ता अनिरुद्धाचार्य के व्यक्तित्व अधिकारों को अंतरिम संरक्षण दिया है
  • कोर्ट ने कहा कि अनिरुद्धाचार्य को आलोचना और प्रशंसा दोनों से ऊपर माना जाता है
  • कोर्ट ने कहा- आदि शंकराचार्य ने कभी मानहानि के मुकदमे नहीं दायर किए, वे वाद-विवाद के माध्यम से बात रखते थे
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"आदि शंकराचार्य ने कभी मानहानि के मुकदमे दायर नहीं किए, वे वाद-विवाद करते थे और वाद-विवाद के माध्यम से ही लोगों को गलत साबित करते थे..." दिल्ली हाई कोर्ट ने वृंदावन के कथावाचक अनिल कुमार तिवारी अनिरुद्धाचार्य द्वारा दायर मुकदमे में व्यक्तित्व अधिकारों को अंतरिम संरक्षण देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने अनिरुद्धाचार्य से कहा कि आपको इन सबसे ऊपर माना जाता है. आप आलोचना, प्रशंसा, मान्यता, हर इच्छा से ऊपर हैं. आप अपनी प्रतिष्ठा से जुड़े नहीं हैं, है ना? ऐसा हो ही नहीं सकता. अगर आप जुड़े ,हैं तो यह आपके सिद्धांतों के विपरीत होगा. 

दिल्‍ली हाई कोर्ट ने अनिरुद्धाचार्य से कहा, "सवाल यह है कि आप एक दर्शन का पक्ष रखते हैं, तो हमेशा कोई न कोई ऐसा होगा, जो उससे सहमत नहीं होगा. तकनीकी रूप से व्यक्ति को आपके कथन पर आपत्ति जताने का अधिकार है. आदि शंकराचार्य ने कभी मानहानि के मुकदमे दायर नहीं किए, वे वाद-विवाद करते थे और वाद-विवाद के माध्यम से ही लोगों को गलत साबित करते थे. इसलिए जब तक यह मानहानिकारक या अपमानजनक न हो, तब तक मुकदमा मान्य नहीं है.

दिल्‍ली हाई कोर्ट में दी गई ये दलीलें...

कोर्ट – आप कहां हैं?
अनिरुद्धाचार्य की ओर से पेश वकील – वृंदावन में, माय लॉर्ड, माननीय यह देख सकते हैं कि विवादित सामग्री...

कोर्ट – विवादित सामग्री तो मंगल ग्रह पर भी है, शायद बृहस्पति पर भी. ये वेबसाइटें कहां-कहां से एक्सेस की जा सकती हैं? यहां इन्हें कौन एक्सेस कर रहा है?
वकील – मेरी अधिकांश व्यूअरशिप दिल्ली से है.

कोर्ट – दिल्ली ही क्यों? हमें बताइए कि कहीं और जाना इतनी बड़ी समस्या क्यों है? वहां क्यों नहीं? आपके पास तो पूरी दुनिया का अधिकार क्षेत्र है, टिम्बकटू तक. फिर टिम्बकटू क्यों नहीं? कृपया बताइए. अगर कलकत्ता हाई कोर्ट आदेश देता है, तो क्या गूगल और अन्य उसका पालन नहीं करेंगे? इलाहाबाद या लखनऊ की अदालतें ऐसा नहीं कर सकतीं? क्या वे आदेश का पालन नहीं करेंगी?
वकील – मेरा व्यवसाय यहां है.

कोर्ट – ओह, आपके पास कंपनियां भी हैं?
गूगल की ओर से पेश वकील – यह आश्चर्यजनक है कि यह तर्क दिया जा रहा है कि प्रतिवादी दिल्ली में हैं, जबकि अपलोड करने वालों को पार्टी ही नहीं बनाया गया. जिन प्रकार के लिंक साझा किए गए हैं, उन पर भी हमें आपत्ति है.

कोर्ट – हम केवल यह समझना चाहते हैं कि दिल्ली के प्रति यह प्रेम क्यों है? पूरे देश के हाई कोर्ट और जिला अदालतें उपलब्ध हैं, फिर हमारे ऊपर यह असाधारण क्षेत्राधिकार क्यों थोपा जा रहा है. ऐसा कोई सिविल कोर्ट नहीं है जो समान आदेश पारित न कर सके.
न्यायमूर्ति गेडेला – (रिकॉर्ड से हटकर बोलते हुए) आपसे तो अपेक्षा की जाती है कि आप इन सब बातों से ऊपर हों. आप आलोचना, प्रशंसा, मान‑सम्मान, हर इच्छा से ऊपर माने जाते हैं. आप अपनी प्रतिष्ठा से जुड़े नहीं हैं, है न? होना भी नहीं चाहिए. अगर हैं, तो यह आपकी प्रचारित विचारधारा के बिल्कुल विपरीत होगा.
अनिरुद्धाचार्य की ओर से वकील श्री महेंद्रू – जो कुछ प्रसारित हो रहा है, उसके कारण मुझे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा.

कोर्ट – सवाल यह है कि आप एक दर्शन का प्रचार करते हैं, और हमेशा कोई न कोई होगा जो उससे असहमत होगा. किसी व्यक्ति को तकनीकी रूप से आपके कथनों पर सवाल उठाने का अधिकार है. आदि शंकराचार्य कभी मानहानि के मुकदमे नहीं दायर करते थे, वे बहस करते थे और तर्क से बताते थे कि दूसरा गलत है. इसलिए, जब तक कुछ मानहानिकारक या अपमानजनक न हो.
वकील – (कोर्ट को 'गुरुजी एडिक्ट्स' नामक सोशल मीडिया हैंडल से की गई टिप्पणियां दिखाते हुए) मुझे सट्टेबाजी और गेमिंग वेबसाइट पर दिखाया जा रहा है. मेरी सामग्री इन चैनलों पर प्रकाशित की जा रही है. कुछ सामग्री आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा बनाई गई है और ऐसा दिखाया गया है मानो मैं यह सब कह रहा हूं, जो कि कार्रवाई योग्य है.
गूगल – यूट्यूब के संदर्भ में, यदि सामग्री जनरेटेड है, तो उसे हटाया जाना चाहिए. यूट्यूब के तहत तीन कैटेगरी हैं, हालांकि वास्तव में दो ही हैं. सात यूआरएल ऐसे हैं जो फैन पेज हैं, जहां उन्होंने महिलाओं, विज्ञान आदि पर आपत्तिजनक बातें कही होने का आरोप लगाया है. वह एक ‘वोक' व्यक्ति माने जाते हैं, जो जनता को प्रभावित करते हैं. कोई उन्हें इसके लिए चुनौती दे रहा है.

कोर्ट – हम यह कह सकते हैं कि फिलहाल हम केवल इन्हीं प्रार्थनाओं तक इसे सीमित कर रहे हैं कि यह यूट्यूब का हिस्सा न रहे.
कोर्ट (वादी से) – आपको भी बहुत सी बातें समझनी होंगी. जब आप इस तरह की बातों का प्रचार करते हैं, तो आप किसी फिल्म अभिनेता की तरह शख्सियत नहीं हैं. उनके लिए तो यह और ज़्यादा लोकप्रिय होने का एक तरीका भी हो सकता है.
वकील – यह न तो मुद्रीकरण है और न ही व्यावसायिक शोषण. मेरी प्रतिष्ठा ऐसी है कि अगर एक भी अनुयायी का विश्वास डगमगाए.

कोर्ट – इसका मतलब यह हुआ कि विश्वास कमज़ोर है, और यह आपकी छवि का प्रतिबिंब नहीं है.
वकील – इसे इस तरह दिखाया जा रहा है कि मैं यह सब कह रहा हूं. डीपफेक इसे और बदतर बना देते हैं.

कोर्ट – यह बात सही है. ठीक है, हम आदेश पारित करेंगे.

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आलोचना और मानहानि के बीच अंतर

अदालत ने यह भी कहा कि आलोचना और मानहानि के बीच स्पष्ट अंतर है. केवल असहमति या तीखी आलोचना को मानहानि के दायरे में नहीं रखा जा सकता, जब तक वह अपमानजनक या प्रतिष्ठा को अनुचित रूप से ठेस पहुंचाने वाली न हो. हालांकि, अदालत ने अनिरुद्धाचार्य को अंतरिम संरक्षण दिया है, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों को आलोचना और असहमति के प्रति अधिक सहिष्णु होना होगा. यह टिप्पणी व्यक्तित्व अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संवाद के संतुलन को लेकर भविष्य के मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मार्गदर्शन मानी जा रही है.

क्‍या है पूरा मामला

कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने दिल्‍ली कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि इंटरनेट पर उनकी छवि को खराब करने की कोशिश की जा रही है. कोर्ट ने कथावाचक अनिरुद्धाचार्य की ओर से कुछ यूट्यूब लिंक और पोस्‍ट भी पेश किये गए. अनिरुद्धाचार्य का कहना है कि इनसे उनके व्‍यक्तित्‍व को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. इसलिए ऐसे सभी यूट्यूब लिंक्‍स और पोस्‍ट को हटवाया जाए. इस याचिका में अनिरुद्धाचार्य ने यूट्यूब, फेसबुक, गूगल कटघरे में खींचा है.

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